(एकमात्र संकल्‍प ध्‍यान मे-मिथिला राज्‍य हो संविधान मे) अप्पन गाम घरक ढंग ,अप्पन रहन - सहन के संग,अप्पन गाम घर में अपनेक सब के स्वागत अछि!अपन गाम -अपन घर अप्पन ज्ञान आ अप्पन संस्कारक सँग किछु कहबाक एकटा छोटछिन प्रयास अछि! हरेक मिथिला वाशी ईहा कहैत अछि... छी मैथिल मिथिला करे शंतान, जत्य रही ओ छी मिथिले धाम, याद रखु बस अप्पन गाम ,अप्पन मान " जय मैथिल जय मिथिला धाम" "स्वर्ग सं सुन्दर अपन गाम" E-mail: madankumarthakur@gmail.com mo-9312460150

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

रचनाक नक़ल नहि हेबाक चाही - मनीष झा "बौआभाई"





पाठकगण,


हमरा लोकनिक समक्ष एक-दू टा एहेन रचना एहि चर्चित ब्लॉग पर प्रकाशित भेल अछि, जे कि स्पष्ट रूप स' नक़ल कयल गेल अछि आ ओहि रचनाक शीर्षक एहि प्रकारे अछि-

पहिल-  तरुवाक पंच तिलकोर - रचनाकार (मुकेश मिश्रा)
दोसर-  आमक झगरा -रचनाकार (मुकेश मिश्रा)

ई प्रसंग हम एहि दुआरे नहि उठा रहल छी, जे हमरा रचनाकार (मुकेश मिश्रा) स' कोनो तरहक आपसी द्वेष वा ईर्ष्या अछि (जहां तक हमरा लोकनि एक-दोसर स' अपरिचित छी), मुदा ई प्रसंग हुनका पक्ष में उठायब अत्यधिक उचित बुझना जा रहल अछि, जे एकर मूल रचनाकार छथि आ इन्टरनेट के दुनिया स' दूर एहि प्रकारक जानकारी स' शायद अनभिज्ञ हेताह I
ई बहुत दुःखक बात अछि जे मूल रचनाकार के श्रेय त' दूर हुनक नामों वा सौजन्य के चर्चा तक कतहु नई देखना जा रहल अछि I हम एहि रचना पर टिप्पणी दैत रही मुदा अकस्मात् रचना देखल सन बुझना गेल, हम ठमकि गेलहुँ आ ओहि दिन स' ओहि पुस्तकक खोज में लागि गेलहुँ अंततः सफलता भेटल अर्थात साक्ष्य भेटल, तैं अपनें लोकनिक समक्ष एहि प्रसंग के रखबा में बिलम्ब सेहो भेल क्षमा चाहै छी I

पोथीक जानकारी :
पोथीक नाम- संगम सुधा
(पन्ना सं.-६ आ पन्ना सं.-२४)
लेखक- महेन्द्र कुमार पाठक "अमर"
पेशा स'- मधुबनी कोर्ट में वकील
मैथिल भाषा में एतेक बेसी समर्पणता जे अपन लिखल एहि पोथी के स्वयं ट्रेन में घूमि-घूमि क' एकर प्रचार-प्रसार व्यावसायिक दृष्टिकोण स' नहि, अपितु भाषक उत्थान हेतु करैत रहलाह अछि हुनक एहि असाध मेहनति के बिसरि कियो अपना नाम स' वाहवाही ल' रहल छी ई युक्तिसंगत नहि, नकले करक छल त' ओहि विषय के ल' क' अपन शब्द सजबितौं आ परसितौं I
हमरा एखन जिंदगी के कोनो प्रकारक अनुभव नहि अछि तथापि एकटा निवेदन रचनाकार लोकनि स' ज़रूर करब जे, हमर मिथिलाक माटि ककरो स' ज़रूर बेसी समृद्ध अछि ओ चाहे धन में होय, बल में होय वा बुद्धि में होय, ककरो स' दस डेग आगुए रहैत छी तैं अपन ह्रदय स' निकलल, अपन बुद्धि स' उपजल जे रचना होय ओएह टा प्रकाशित कराबी जाहि स' अपन आत्मसंतुष्टि सेहो भेटत संगहि लोकक अपार स्नेह आ प्रतिष्ठा I खास क' एहेन तरहक चर्चित ब्लॉग पर त' कथमपि नहि राखी जकरा लग रोज़ के लाखो पाठक अछि I हम आशा करै छी जे रचनाकार अपन मूल रचनाक संग समय-समय पर उपस्थित होइत रहताह आ एहेन तरहक क्रियाकलाप स' बचताह I

स्नेहाभिलाषी :
मनीष झा "बौआभाई"
Mailto: manishjhaonline@gmail.com
Blog: http://manishjha1.blogspot.com/

अपन गाम घर:- पहिल- तरुवाक पंच तिलकोर आ दोसर- आमक झगरा
एहि जालवृत्तसँ हटा देल गेल अछि आ मुकेश मिश्रा जीसँ आग्रह जे एहि प्रकारक रचनाक प्रस्तुति प्रविष्टिकर्ता वा आन रूपमे अपना नामसँ नहि करथि


जेना कि बौआभाइ ठीके लिखै छथि-
"हमर मिथिलाक माटि ककरो स' ज़रूर बेसी समृद्ध अछि ओ चाहे धन में होय, बल में होय वा बुद्धि में होय, ककरो स' दस डेग आगुए रहैत छी तैं अपन ह्रदय स' निकलल, अपन बुद्धि स' उपजल जे रचना होय ओएह टा प्रकाशित कराबी जाहि स' अपन आत्मसंतुष्टि सेहो भेटत संगहि लोकक अपार स्नेह आ प्रतिष्ठा I खास क' एहेन तरहक चर्चित ब्लॉग पर त' कथमपि नहि राखी जकरा लग रोज़ के लाखो पाठक अछि I हम आशा करै छी जे रचनाकार अपन मूल रचनाक संग समय-समय पर उपस्थित होइत रहताह आ एहेन तरहक क्रियाकलाप स' बचताह I" 

1 टिप्पणी:

  1. अजीत-मैसूर।

    धन्यवाद बौआ भाई,
    अपनेँक सजगता मा मैथिलीकेँ शक्ति प्रदान करतनि, अशेष शुभकामना।
    पूर्वक रचनाकेँ आदर्श बनाए तँ नब रचना अदौसँ होइत आएल अछि, मुदा दोसरक रचनाकेँ अपन कहि प्रकाशित कराएब घोर पाप थिक। तेँ एहन कर्मसँ बचि सर्वथा नव साहित्यक रचना कए प्रतिष्ठा प्राप्त कएल जाए सकैत अछि।
    अजीत-मैसूर।

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