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रविवार, 20 जून 2010

एक नकपिची लरकी ....


लेखक - मुकेश मिश्रा एक नकपिची लरकी .... 9990379449


एक नकपिची लरकी थी ,एक लरके पे मरती थी
चोरी -चोरी छत पे आ कर,रोज मिला करती थी
मिलते -मिलते फस गई ,उसको वो लरका पट गयी
एक नकपिची लरकी थी...............

किसी न किसी बहाने रोज हमसे लरती थी
छोटी सी नन्ही सी नादान सा वो दिखती थी
लरते- लरते, रोते -रोते बाहोंमे शमा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............

मुझे देखने रोज सबेरे ही उठ जाती थी
देख के नको पे अंगुली की इसारा करती थी
हेलो टाटा बाय-बाय कह के सासों में शमा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............

मेरे घर में एक दिन टीबी देखने आयी थी
मेरे बहो में बैठ कर मेरे गालो को चूमी थी
सादी करुगी तुझी से हसते-हसते कह गयी
एक नकपिची लरकी थी...............

एक दिन छत पे खेलने वो आयी थी
मुझे देख वहा कोई जनत ही पायी थी
खेलना छोर पीछे से मेरे कन्धो पे लटक गई
एक नकपिची लरकी थी...............

मेरे मुबायल पे किसी अजनबी लरकी की फोन आयी थी
पीछे से आकर अपने कान को मेरे फोन में सटायी थी
गुसे से फोन छीन कर निचे फेक गई
एक नकपिची लरकी थी...............

एक सहेली शालू थी पर वो बहुत चालू थी
दोनों ने मिलकर एक दिन मुझे बनाया भालू थी
आय लब यु कह दो शालू ने बता गई
एक नकपिची लरकी थी...............

दुसरे ही दिन माय ने आय लब यु कह दिया
शर्म के मरे उनका बुरा हाल हो गया
हस्ते मुस्कुराते आख मर के वो वहा से चली गई
एक नकपिची लरकी थी...............

अचानक स्कूल में आ गई गर्मी की छुटी
वो चली गई दीदी के पास बांध के दो जुटी
जाते जाते फोन करुगी मुझे वो बता गई
एक नकपिची लरकी थी...............
सुबह-सुबह मिसकॉल आया माय समझा मेहमान आया
माय ने इधर से फोन लगाया रूह में मेरे जान आया
रखती हु दीदी आयी ,फोन को वो काट गयी
एक नकपिची लरकी थी...............

दुसरे दिन फोन पे कहि एक लरका मुझे देखता है
माय ने कहा देखनेदो;कुछ करता तो नही
मार ही दंगी फोन पे गुनगुना गयी
एक नकपिची लरकी थी...............

किसी बहाने माय ने उसे वहा से बुला लिया
देख कर माय उसे दिल में लगी आग बुझा लिया
बच के रहना हम से गुसे में बता गयी
एक नकपिची लरकी थी...............

रूठ गयी वो हमसे कैसे उसे मनावू
भाभी से पुछा कैसे उसे पावू
भाभी ने हम दोनों को आपस में मिला गयी
एक नकपिची लरकी थी...............

स्टेसन तक छोरने हम भी साथ गये थे
उसकी खामोसी देख सरमा हम गये थे
गारी में बैठ के हमे अकेला छोर गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
गाव जाने से पहले अपनी सहेली संगीता को कुछ बता गयी
कह देना तुम उन्हें माय सदी उसी से करूंगी
दिल की अरमा जुवा पे ला गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
गाव जा कर उसकी ममी ने एक चाल चल दी
फोन कर के बिटु माँ को हमे बदनाम कर दी
दिल में लगा चोट नींद भी भाग गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
सबेरे ही फोन पे उसने हम से पुछा किया हुवा
मई ने कहा हम से अच्छा लरका तुम्हे मिलेगा
चार कैमरा तुम्हारे सदी में ले जवुगा
धूम -धाम से तुम्हारी सदी की लडू भी खाऊगा
उसने बोली और किया देखोगे ..
माय ने कहा ..तुम्हारी सादी देखूगा उसने बोली..मेरी मरी हुयी मुह देखोगे
यू कह के फोन को वो काट गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
मुझे लगा मुझसे बहुत प्यार करती है वो
मेरे बगैर जिन्दा ना रह सकती है वो
माय भी बेसुमार प्यार उसे करने लगा
खुवाबो में रोज उसे देखने लगा
दिल में हलचल मचा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............

चोरी चोरी मै उसका तस्बीर खीचने लगा
पूरी तस्बीर खीच के तोफा में उसे दे आया
धन्यबाद कह के हस के वो चिली गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
यु ही समाय बीतने लगा हम दोनों प्यार में डूबते गये
एक दुसरे को दखने में ही समाय बीतते गये
हवा की डोर ने हम दोनों को बांध गयी
एक नकपिची लरकी थी...............

किसी लायला मजनू से कम नही मेरा ये मुहब्त
उसे देखने में ही समय बीत गया मिली नही फुर्सत
आखो में झिलमिल सी रोशनी वो दे गयी
एक नकपिची लरकी थी...............

उसके प्यार में माय इस कदर डूब गया
उसे छोर कहि जाने का मन नही किया
प्यार की एक जोत दिल में जगा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............

उसके माँ पापा दादा दादी सब को माय भा गया
सादी होगा मेरा इससे माय सरमा गया
दिल में इंतजार का ललक छोर गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
गाव से मेरे दादा जी मेरे पास आये थे
अपने प्यार की दस्ता उन्हें सुनाये थे
करलेना उसी से सादी ये बात कह गये
एक नकपिची लरकी थी...............

सब को अच्छा लगा पर उसे अच्छा ना लगा
मेरे सिबा एक और लरका उसे चाहने लगा
मुझे पसंद नही ये लरका मेरे बारे में बता गयी
एक नकपिची लरकी थी...............

पता लगाया आखिर ये लरका है कौन
पता चला उसी के साथ पढ़ती है टीयुसन
मुझे छोर उस लरका में समा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............

घर के गेट लगा कर सामने वो बैठती थी
पढाय के बहाने उससे प्यार की बाते करती थी
मेरा हाथ छोर उसका हाथ पकर गयी
एक नकपिची लरकी थी...............

मेरा प्यार भुलाकर उससे वो प्यार करने लगी
बचपन की इस डोर को पल में वो तोर गयी
कैसे जीयु उसके बिन कुछ ना बता गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
वो तो मुझे भूल गयी पर माय कैसे भूल पौउगा
जब तक जिन्दा रहूँगा उसी को माय चाहुगा
मेरे दिए तोफा भी फेक गयी
एक नकपिची लरकी थी...............


खत्म कर दी सारी जज्बात की कहानी
कैसे कहू माय यारो थी वो मेरी सपना रानी
तीर मार के वो मुझे कब्र पे सुला गयी
एक नकपिची लरकी थी...............

प्यार तो इस्वर का दिया बरदान होता है
जो ना इसे समझा वो नदान होता है
मेरे यादो को छोर उसकी यादो में समा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............

मेरे दिल को छोर उस के दिल में घर बसा गयी
दुवा करुगा उसे वो मिल जय जिसमे वो रमा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............

गुल को गुलाब बना देता गुलाब को कमल बना देता
आपकी ऐक मुस्कान पे कितना गजल लिख देता
सपना जी आप मेरा साथ छोरती नही तो आपके
नाम से बिहार में भी ऐक ताजमहल बना देता,
(कुछ बाते)
१.प्यार इस्वर का बरदान होता है
२.तरप प्यार का पहचान होता है
३.पार्थना ,तपसिया,पूजा ,खोना को प्यार कहते है
४.दो दिलो का मीलन प्यार का रूप है
५.प्यार एक से होता है
६.कृष्ण ने राधा से सादी नही की ,पर दुनिया उनके प्यार को पूजता है
७.प्यार में रोवो मत हिमत रखो
८.अपने प्यार पे भरोसा रखो
mukesh.mishra@rediffmail.com
९९९०३७९४४९,






8 टिप्‍पणियां:

  1. हमरा नकपिची लरकी बर निक लागल
    मुकेश जी के चंदन के तरफ से बहूत बहूत धन्यबाद

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  2. mukesh jee aap jo likhte ho hme bhut hi achha
    lga. mere trf se thanku

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  3. अहिना लिखेत रहू मुकेश जी हमरा बर निक लागल

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  4. जान में जान आबी गेल
    आहा स पहचान बनी गेल ,
    रहितौ हमरा ओरा
    ल लैतव हम कोरा,
    शालू (कोठिया)

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