(एकमात्र संकल्‍प ध्‍यान मे-मिथिला राज्‍य हो संविधान मे) अप्पन गाम घरक ढंग ,अप्पन रहन - सहन के संग,अप्पन गाम घर में अपनेक सब के स्वागत अछि!अपन गाम -अपन घर अप्पन ज्ञान आ अप्पन संस्कारक सँग किछु कहबाक एकटा छोटछिन प्रयास अछि! हरेक मिथिला वाशी ईहा कहैत अछि... छी मैथिल मिथिला करे शंतान, जत्य रही ओ छी मिथिले धाम, याद रखु बस अप्पन गाम ,अप्पन मान " जय मैथिल जय मिथिला धाम" "स्वर्ग सं सुन्दर अपन गाम" E-mail: madankumarthakur@gmail.com mo-9312460150

बुधवार, 21 मार्च 2018

चैतावर

|| चैतावर || 

चैतक        चमकल       इजोरिया 
बलमू   मोरा    मन   तरसाबै    रे | 
रहि -   रहि     कुहकै    कोयलिया  
बलमु     मोरा     मन  तरसाबै  रे || 
            चैतक  --- बलमु --
फुलवन में भँवरा ,करै रंगरेलिया  |
लायल      वसन्तो      बहुरिया   ||
बलमू       मोरा    मन  तरसाबै   रे
                  चैतक  --- बलमु --

पियु -पियु पपिहा ,करै अधिरतिया |
लिखल       सनेहक         पतिया  | |
बलमू      मोरा      मन   तरसाबै   रे
                       चैतक  --- बलमु --
नेमुआँ  फुलायल , अमुआँ  मजरल |
फ़ुलल         जूही          चमेलिया   ||
बलमू       मोरा       मन   तरसाबै   रे
                        चैतक  --- बलमु --
"रमण " पथिक ,पथ प्राण पियासल |
गोड़ियाक    छलकल     गगाड़िया  ||
बलमू       मोरा      मन  तरसाबै   रे
  चैतक  --- बलमु --
लेखक -
रेवती रमण  झा "रमण "




सोमवार, 12 मार्च 2018

"गौरवशाली इतिहास आओर पिछड़ल वर्तमान"

"गौरवशाली इतिहास आओर पिछड़ल वर्तमान"
        गौरवशाली इतिहास आओर पिछड़ल वर्तमान एहि दू शब्दसँ, मिथिलाक परिचय देल जा सकैत अछि । इतिहाससँ वर्तमानक दूरि तय करबाक क्रममे जाहि दू परस्पर विरोधी शब्दक प्रयोग करबाक लेल बाध्य भेलौं अछि, एहिके वेदना बुझल जेबाक चाही, नञि कि पटकथाके रोमांच करबाक प्रयास ।

     प्राचीन कालहिंसँ मिथिला अपन विशिष्टताके संग अलग जगह बनौने अछि । आन सभ्यता-संस्कृतियों एकर स्वीकारोक्ति करैत छथि, किन्तु योग्यतानुरूप मिथिलाके यथोचित प्रशस्ति देबामे कंजुसी सेहो करैत छथि ।
          मिथिलाक उल्लेख रामायण कथामे सेहो अबैत अछि । भगवान श्रीरामके सासुर व माता जानकीक नैहरके रूपमे मिथिलाक परिचय देल गेल अछि, जे कि तथ्यक एक पहलु मात्र अछि । वस्तुतः ई मिथिलाक पावन भूमिके श्रेष्ठताक प्रमाण अछि कि स्वयं जगतजननी जानकी एहि पवित्र माइटसँ जन्म लेलनि । माँ मैथिलीक महानता व मिथिलाक बेटीक पवित्रता तS देखल जाऊ कि जाहि शिव धनुषके पैघ सँ पैघ बलशाली राजा हिला-डोला नञि सकलाह, ओहि शिव धनुषकें सीता बामा हाथसँ उठाके नित्य अड़िपन लगाबैत छलीह ।
          भगवान श्रीरामकें मर्यादा पुरूषोत्तम कहल गेल छनि । परन्तु विचारणीय अछि कि - 'मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम' बनेबामे भगवती सीता मैय्याके कतेक योगदान छलन्हि ? हमरा बुझने ई मिथिलापुत्री जानकी केर पवित्रता, सहनशीलता, धर्मपरायणता एवं पतिव्रता छलन्हि जे हिनक पतिक प्रत्येक निर्णयके, बिना किछु स्वयंके विषयमे सोचने कार्यान्वित कयलनि ।
           मिथिलाक बेटीक त्याग व एक पत्नीके रूपमे देल गेल स्वयं केर बलिदानके इतिहास गौण कS देलक आओर श्री राम, मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम भS गेलथि । ई मिथिलाक माटिक उर्वरता अछि जे अपन बेटीमे पवित्रता, धर्मपरायणता व आदर्शकें बीजारोपण करैत आबि रहल अछि । दुनिया आइ नारीवादके संकल्पना कS रहल अछि मुदा हमरा लोकनिक सदातनीसँ "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता" केर सम्पोषक रहलौं अछि । कोनो प्रकारक उत्सव-महोत्सवक सुअवसर पर आयोजनक शुभारम्भ गोसाऊनिक गीत "जय-जय भैरवि असुर भयाउनि" सँ करैत छी । भारती, मंडन मिश्रजीक पत्नी जे शंकराचार्यके शास्त्रार्थमे हरौलनि, एक उदाहरण छथि मिथिलाक नारी शक्ति आओर सम्मानके ।
             वर्तमान समयमे इंटरनेटके सुलभ संसारमे विवाह संबंधी "मेट्रोमोनियल साइट्स" केर अवधारणा आयल । जाहिसँ समाज लाभान्वित होइत आबि रहल अछि । परन्तु मिथिलाक लेल गौरवक विषय थिक जे मिथिलामे एहि प्रकारक व्यवस्था सैकड़ों वर्षसँ चलि आबि रहल अछि । उदाहरण स्वरूप मैथिल ब्राह्मणक विवाहक ऐतिहासिक विवाह-स्थली सौराठक चर्चा करब । सौराठमे प्रत्येक वर्ष सुधक समय विवाह योग्य पुरूषके सभा आयोजित कयल जाइत अछि । आई आनुवंशकीय प्रोद्यौगिकीमे समजातीय, वंश-परम्पराक कुलक जिन्ससँ उत्कृष्ट संततिके प्राप्त कयल जाइत अछि जकरा मिथिलाक पंजी व्यवस्थामे पंजीकार एहि तकनीककें कार्यान्वित करैत छथि एवं सिद्धान्त लिखबासँ पूर्व वर एवं कन्या पक्षक सात-सात पीढ़ीक मूल-गोत्रक अन्वेषण करैत छथि ।
          मध्यकालीन भारतमे जखन लगभग सम्पूर्ण भारत मुस्लिम प्रभावसँ प्रभावित छल एवं संस्कृत साहित्य संकटमे छल, ताहि समय मिथिलाक भूमिका ब्राह्मण संस्कृत साहित्य आओर संस्कारकें संरक्षित करैत संरक्षण व संवहन कयलक जे कि आधुनिक काल धरि चलि आबि रहल अछि । स्वo गंगानाथ झाजीके साहित्यिक योगदानक लेल ब्रिटिश सरकार हिनका "सर" उपाधिसँ विभूषित कयलक ।
          आजादीक बादक दशकमे मिथिला अपन गौरवशाली विरासतकें आगाँ बढ़ेवामे पिछड़ैत गेल । विद्वता, ज्ञान-विज्ञान, कला-साहित्य व संस्कृतिक लेल शिखरस्थ पर आरूढ़ मिथिला, वर्तमान समयमे गरीबी, अशिक्षा, दहेज प्रथा आदि अनेकों प्रकारक सामाजिक दोषसँ ग्रसित अछि । हमरा लोकनिक आयोजन-उत्सवक विशेष अवसर पर किंवा ओन्हायतहुँ गाबि लैत छी "स्वर्गसँ सुन्दर मिथिलाधाम......" किन्तु एहि स्वर्गमे एतेक दोष कतS सँ आबि गेल तथा एहि दोष सभसँ कोन प्रकारें मुक्त भेल जेबाक चाही से बेशी महत्वपूर्ण अछि ।
           एक बहुसंख्यक आबादी पृथक मिथिला राज्यक निर्माणकें सभ समस्याक समाधान मानैत छथि आओर कऐक वर्षसँ एहि दिशामे प्रयासरत् सेहो छथि । प्रबुद्ध पाठकगणकें जानकारी हेतैन जे भाषायी आधार पर राज्यक निर्माण हेतु १९५६ ई. मे "राज्य पुनर्गठन आयोग" केर स्थापना भेल । मैथिली भाषाके आधार पर मिथिला राज्य निर्माण हेतु ज्ञापण देल गेल, परन्तु अत्यधिक वेदनाक संग लिखS पड़ि रहल अछि जे "राज्य पुनर्गठन आयोग" मिथिला राज्य हेतु अनुशंसा तS दूर, एहि पर विचार तक नञि कयलक ।
         मैथिली आन्दोलन शक्तिविहीन अछि एहि यथार्थकें स्वीकार करहिं पड़त । बहुवर्गीय विशाल जनसमुदाय रहलाक बावजुदो मैथिली आन्दोलन तथाकथित स्वयंभू ब्राह्मण व कर्ण कायस्थसँ पृथक वर्गके अपनामे नञि जोड़ि पाबि सकला अछि । हलाँकि मिथिलाक विद्या-विभूतिसँ सजल विद्वतजन् द्वारा कयल गेल साहित्यिक कार्यक बलें, मैथिलीके एक भाषाक रूपमे सम्मान भेटल अछि । १९६५ ई.मे साहित्य अकादमीमे सम्मिलित भेनाई एवं २००३ ई.मे संविधानक अष्टम् अनुसूचिमे सम्मिलित भेनाई पैघ उपलब्धि अछि किन्तु एहिसँ आगाँ मिथिला-मैथिलीक लेल किछु नञि भS सकल अछि । एहिसँ बेशीक कल्पना, कल्पने धरि सीमित रहत, जावत् धरि सभ वर्गक सामुहिक सहभागिता नियोजित नञि होयत ।
           जहिना मिथिलाके ब्राह्मण केवल मैथिल ब्राह्मणक रूपमे परिचित होइत छथि, तहिना आनो वर्ग यथा यादव 'मैथिल यादव', कोयरी 'मैथिल कोयरी', दुसाध 'मैथिल दुसाध', चमार 'मैथिल चमार' वा मुस्लिम 'मैथिल मुस्लिम' आदि केर रूपमे अनिवार्यतः जानल जेबाक चाही संगहि एहि परिचयसँ गर्वक अनुभव करथि, तखनहिं मिथिला व मैथिलीक व्यापक लक्ष्य प्राप्त करायल जा सकैत अछि ।
         एकटा आओर समस्या अछि । जेनां कि मैथिलजन बहुतायत रूपसँ प्रायः महत्वाकांक्षी होइत छथि संगहि अहंकारी सेहो । आपसी संबंधमे मेल-मिलाप नञि रहबाक कारणें, बहुधा देखल जा रहल अछि जे देश भरिमे हजारों मैथिल संगठन भेलाक बावजुदहुँ, सामुहिक प्रयासक बलें मिथिलाक सर्वांगीण विकासक अवधारणा स्वप्नवते अछि । आवश्यकता आकांक्षित अछि किछु निःस्वार्थ व वियोगी व्यक्तिक नेतृत्वक ।
           महत्वपूर्ण तथ्यके अपने लोकनिक समक्ष प्रस्तुत करैत निवेदन करब जे मिथिला, एक प्रदेश, एक संस्कृति, एक विरासत केर रूपमे भलेहि पिछड़ि रहल अछि मुदा मैथिलजन लाखोंक संख्यामे अपन व्यक्तिगत क्षमतामे बहुत विद्वान, गुणवान, धनवान एवं सभ प्रकारक सामर्थ्यसँ सामर्थ्यवान छथि । जँ सभ कियो आपसी मतान्तरकें बिसरि एकत्रित भS जाइथ, रंचमात्रहुँ संदेह नञि जे मिथिलाक भाग्योदय निश्चित रूपें होयत ।
            मिथिला व मैथिलीक विषय एतेक व्यापक अछि जे लिखनाई कठिन अछि । समय व स्थान कम्म पड़ि जायत । सारांशतः इएह कहब जे जतय साँझ पड़ितहिं घर-आँगनमे दीया-बाती होइत भगवतीक गीत "जगदम्बा घरमे दीयरा बारि एलौं हे ....." सँ नभ गुंजयमान भS जाइत छल, आई एक शांत अन्हारक अन्हरगुप्पीसँ ग्रसित अछि । दिया-बाती तS एखनहुँ होइत अछि मुदा टेमीक लौ मद्धिम भS गेल अछि जकर स्वरूप अन्हार, कारी, घनघोर स्याह रूपमे परिवर्तित भयावह रूप लक्षित भS रहल अछि । राति बढ़ल जा रहल अछि बस एक उम्मीद अछि राति जतेक बढ़ैत अछि, भोर ततबे लSग भेल जा रहल अछि । इत्यलम् । जय श्री हरि ।



श्री राज कुमार झा जीक कलम सँ
सौजन्यसं 
संजीब झा.
मधुबनी मिथिला.
१२-०३-२०१८.

गुरुवार, 8 मार्च 2018

MITHILAKSHAR ABHIYAN



http://www.maithilifonts.in/suryalakshmi-maithili-font.html

अहि लिंक में मैथिलि फ़ॉन्ट अच्छी डोनलोड  करू  

सिखू  आ  लिखू और दोसरो  के बताओ ,
जेना हिंदी फ़ॉन्ट कुर्ती देव ०१० अच्छी , ओहिना इहो अच्छी , 

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जय मैथिल, जय मिथिला 



बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

होली में चलते गोली रंगरसिया

               || होली में चलते गोली रंगरसिया ||
                           

होली में चली गेले गोली रंगरसिया
होली में------------------------------

बहलै   पछवा     ठीके   दुपहरिया
निकसलि  घर  सँ  वसंती  बहुरिया

   होली के हुड़दंग में सर  र  र र  र र र
     फाटि गेलै गोरिया के चोली रंगरसिया
                    होली में.............

भंग   तरंग   अंग   अछि    जागल
बुढ़बो  फागुन    में  देवरा   लागल

डम्फा   ताल   पे    गाबै   जोगीरा
अंगना  में चले  टिटौली  रंगरसिया
                      होली में-------------

सतरंगी   भरी  -  भरी   पिचकारी
होली     खेलथि     कृष्ण    मुरारी

भेद   भाव   नई    रंग   महल।  में
" रमण" बनल हम जोली रंगरसिया
  होली   में   चली   गेलै   गोली  ।।
                
रचयिता
रेवती रमण झा"रमण"
mo-9997313751 


सोमवार, 22 जनवरी 2018

सरस्वति पूजा मोहत्सव

विद्यापति  गौरव मंच  युवा कार्य कर्ता के तत्वाधान में  सम्पन्य भेल सरस्वति पूजा एक नजर देखल जाओ 

रविवार, 14 जनवरी 2018

मकर संक्रान्ति - तिला संक्राइत - मिथिला लेल तिल-चाउर

मकर संक्रान्ति - तिला संक्राइत - मिथिला लेल तिल-चाउर बहब!

मकर संक्रान्तिके शुभ अवसरपर समस्त जनमानस लेल शुभकामना!
      
मकर संक्रान्ति के त्योहार मोक्ष लेल प्रतिबद्धता हेतु होइछ - निःस्वार्थ सेवा - निष्काम कर्म करैत मुक्ति पाबैक लेल शपथ-ग्रहण - संकल्प हेतु एहि पावनिक महत्त्व छैक।

     जेना माय के हाथ तिल-चाउर खाइत हम सभ मैथिल माय के ई पुछला पर जे ‘तिल-चाउर बहमें ने..?’ हम सभ इ कहैत गछैत छी जे ‘हाँ माय! बहबौ!’ आ इ क्रम तीन बेर दोहराबैत छी - एकर बहुत पैघ महत्त्व होइछ। पृथ्वीपर तिनू दृश्य स्वरूप जल, थल ओ नभ जे प्रत्यक्ष अछि, एहि तिनूमें हम सभ अपन माय के वचन दैत तिल-चाउर ग्रहण करैत छी। एक-एक तिल आ एक-एक चाउरके कणमें हमरा लोकनिक इ शपथ-प्रण युगों-युगोंतक हमरा लोकनिक आत्म-रूपके संग रहैछ। बेसी जीवन आ बेसी दार्शनिक बात छोड़ू... कम से कम एहि जीवनमें माय के समक्ष जे प्रण लेलहुँ तेकरा कम से कम पूरा करी, पूरा करय लेल जरुर प्रतिबद्ध बनी।

आउ, एहि शुभ दिनक किछु आध्यात्मिक महत्त्वपर मनन करी:  

१. मकर संक्रान्ति मानव जीवन के असल उद्देश्य के पुनर्स्मरण हेतु होइछ जाहि सँ मानव लेल समुचित मार्गपर अग्रसर होयबाक प्रेरणा के पुनर्संचरण हेतु सेहो होइछ। धर्म, अर्थ, काम आ मोक्ष के पुरुषार्थ कहल गेल अछि - जे जीवन केर आधारभूत मौलिक माँग या आवश्यकता केर द्योतक होइछ। एहि सभमें मोक्ष या मुक्ति सर्वोच्च पुरुषार्थ होइछ। श्रीकृष्ण गीताके ८.२४ आ ८.२५ में दू मुख्य मार्गकेर चर्चा केने छथि - उत्तरायण मार्ग आ दक्षिणायण मार्ग। एहि दू मार्गकेँ क्रमशः ईशकेर मार्ग आ पितरकेर मार्ग सेहो कहल गेल छैक। अन्य नाम अर्चिरादि मार्ग आ धुम्रादि मार्ग अर्थात्‌ प्रकाशगामिनी आ अंधकारगामिनी मार्ग क्रमशः सेहो कहल जैछ।

उत्तरायण मार्ग ओहि आत्माके गमन लेल कहल गेल छैक जे निष्काम कर्म करैत अपन शरीर केर उपयोग कयने रहैछ। तहिना जे काम्य-कर्म में अपन शरीरकेँ लगबैछ, ताहि आत्माकेँ शरीर परित्याग उपरान्त दक्षिणायण मार्ग सऽ गमनकेर माहात्म्य छैक। उत्तरायण मार्गमे गमन केँ मतलब ईश्वर-परमात्मामे विलीन होयब, जखन कि दक्षिणायणमे गमन केँ मतलब कर्म-बन्धनकेर चलते पुनः जीवनमे प्रविष्टि सँ होइछ। मकर संक्रान्ति एहि मुक्तिक मार्ग जे श्रीकृष्ण द्वारा गीतामे व्याख्या कैल गेल अछि ताहि केँ पुनर्स्मरण कराबय लेल होइछ।  

२. सूर्यक उत्तरगामी होयब शुरु करयवाला दिन - जेकरा उत्तरायण कहल जैछ। अन्य लोकक लेल ६ महीना उत्तरायण आ बाकीक ६ महीना दक्षिणायण कहैछ।

३. पुराण के मुताबिक, एहि दिन सूर्य अपन पुत्र शनिदेवकेर घर प्रवेश करैत छथि, जे मकर राशिक स्वामी छथि। चूँकि पिता आ पुत्र केँ अन्य समय ढंग सऽ भेंटघांट नहि भऽ सकल रहैत छन्हि, तैं पिता सूर्य औझका दिन विशेष रूप सऽ अपन पुत्र शनिदेव सऽ भेटय लेल निर्धारित केने छथि। ओ वास्तवमें एक मास के लेल पुत्र शनिदेवके गृह में प्रवेश करैत छथि। अतः यैह दिन विशेष रूप सऽ स्मरण कैल जैछ पिता-पुत्रके मिलन लेल।

माहात्म्य: सूर्यदेव कर्म केर परिचायक आधिदेवता छथि, तऽ शनिदेव कर्मफल केर परिचायक आधिदेवता! मकर संक्रान्ति एहेन दिवसकेर रूपमे होइछ जहिया हम सभ निर्णय करैत छी हमरा सभकेँ कोन मार्ग पर चलबाक अछि - सूर्य-देव द्वारा प्रतिनिधित्व कैल निष्काम-कर्म (प्रकाशगामिनी) या फेर शनि-देव द्वारा प्रतिनिधित्व कैल काम्य-कर्म (अन्धकारगामिनी)।

४. यैह दिन भगवान्‌ विष्णु सदाक लेल असुरक बढल त्रासकेँ ओकरा सभकेँ मारिकय खत्म कयलाह आ सभक मुण्डकेँ मंदार पर्वतमे गाड़ि देलाह।

माहात्म्य: नकारात्मकताक अन्त हेतु एहि दिनकेर विशेष महत्त्व होइछ आ तदोपरान्त सकारात्मकताक संग जीवनक प्रतिवर्ष एक नव शुरुआत देबाक दिवस थीक मकर संक्रान्ति।

५. महाराज भागिरथ यैह दिन अत्यन्त कठोर तपसँ गंगाजीकेँ पृथ्वीपर अवतरित करैत अपन पुरखा ६०,००० महाराज सगरक पुत्र जिनका कपिल मुनिक आश्रमपर श्रापक चलतबे भस्म कय देल गेल छलन्हि - तिनकर शापविमोचन एवं मोक्ष हेतु मकर-संक्रान्तिक दिन गंगाजल सँ आजुक गंगासागर जतय अछि ताहि ठामपर तर्पण केने छलाह आ हिनक तपस्याकेँ फलित कयलाक बाद गंगाजी सागरमें समाहित भऽ गेल छलीह। गंगाजी पाताललोक तक भागिरथकेर तपस्याक फलस्वरूप हुनकर पुरुखाकेँ तृप्तिक लेल जाइत अन्ततः सागरमें समाहित भेल छलीह। आइयो एहि जगह गंगासागरमे आजुक दिन विशाल मेला लगैछ, जाहिठाम गंगाजी सागरमे विलीन होइत छथि, हजारों हिन्दू पवित्र सागरमे डुबकी लगाबैछ आ अपन पुरुखाकेँ तृप्ति-मुक्ति हेतु तर्पण करैछ।
       माहात्म्य: भागिरथ केर प्रयास आध्यात्मिक संघर्षक द्योतक अछि। गंगा ज्ञानक धाराक द्योतक छथि। नहि ज्ञानेन सदृशम्‌ पवित्रमिह उद्यते! पुरुखाक पीढी-दर-पीढी मुक्ति पबैत छथि जखन एक व्यक्ति अथक प्रयास, आध्यात्मिक चेतना एवं तपस्या सऽ ज्ञान प्राप्त करैछ।

६. आजुक दिनकेर एक आरो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सन्दर्भ भेटैछ जखन महाभारतक सुप्रतिष्ठित भीष्म पितामह एहि दिवस अपन इच्छा-मृत्युक वरदान पूरा करय लेल इच्छा व्यक्त कयलाह। हुनक पिता हुनका इच्छामृत्युकेर वरदान देने छलखिन, ओ एहि पुण्य दिवस तक स्वयंकेँ तीरकेर शय्यापर रखलाह आ मकर संक्रान्तिकेँ आगमनपर अपन पार्थिव शरीर छोड़ि स्वर्गारोहण कयलाह। कहल जैछ जे उत्तरायणमें शरीर त्याग करैछ ओ पुनर्जन्मकेर बंधन सँ मुक्ति पबैछ। अतः आजुक दिन विशेष मानल जैछ अन्य दुनिया-गमन करबाक लेल।

माहात्म्य: मृत्यु उत्तरायणके राह अंगीकार कयलापर होयबाक चाही - मुक्ति मार्गमें। ओहि सऽ पहिले नहि! आत्माकेर स्वतंत्रता लेल ई जरुरी अछि। एहिठाम उत्तरायणक तात्पर्य अन्तर्ज्योतिक जागरण सऽ अछि - प्रकाशगामिनी होयबाक सऽ अछि।

एहि शुभ दिनक अनेको तरहक आन-आन माहात्म्य सब अछि आ एहि लेल विशेष रुचि राखनिहार लेल स्वाध्याय समान महत्त्वपूर्ण साधन सेहो यैह संसारमे एखनहु उपलब्ध अछि। केवल शुभकामना - लाइ-मुरही-चुल्लौड़-तिलवा आ तदोपरान्त खिच्चैड़-चोखा-घी-अचाड़-पापड़-दही-तरुआ-बघरुआक भौतिकवादी दुनिया मे डुबकी लगबैत रहब तऽ मिथिलाक महत्ता अवश्य दिन-प्रति-दिन घटैत जायत आ पुनः दोसर मदनोपाध्याय या लक्ष्मीनाथ गोसाईंक पदार्पण संभव नहि भऽ सकत।

अतः हे मैथिल, आजुक एहि पुण्य तिथिपर किऐक नहि हम सभ एक संकल्प ली जे मिथिलाकेँ उत्तरायणमे प्रवेश हेतु हम सभ एकजूट बनब आ अवश्य निष्काम कर्म सऽ मिथिला-मायकेर तिल-चाउरकेँ भार-वहन करबे टा करब। जेना श्री कृष्ण अर्जुन संग कौरवकेर अहं समाप्त करय लेल धर्मयुद्ध वास्ते प्रेरणा देलाह, तहिना मिथिलाक सुन्दर इतिहास, साहित्य, संगीत, शैली, भाषा, विद्वता एवं हर ओ सकारात्मकता जेकरा बदौलत मिथिला कहियो आनो-आनो लेल शिक्षाक गढ छल तेकरा विपन्न होइ सऽ जोगाबी। जीवन भेटल अछि, खेबो करू... मुदा खेलाके बाद बहबो करियौक। मातृभूमि आ मातृभाषाक लेल रक्षक बनू। मिथिला मायकेर तरफ सँ तिल-चाउर हमहुँ खा रहल छी, जा धरि जीवन रहत ता धरि बहब, फेरो जन्म लेबय पड़त सेहो मंजूर - आ फेरो बहब तऽ मिथिलाक लेल बही यैह शुभकामनाक संग, मकर संक्रान्ति सँग जे नव वर्षक शुरुआत आइ भेल अछि ताहि अवसर पर फेर समस्त मैथिल एवं मानव समुदाय लेल मंगलकेर कामना करैत छी।
  जय मैथिली! जय मिथिला!
ॐ तत्सत्‌!
  









प्रवीण चौधरी ‘किशोर’

शनिवार, 6 जनवरी 2018



बीस गो रुपैया ,सुइद बयाजक संग ई चुटकुला मुसाय बाबाक सन्दर्भसँ लेल गेल अछि ! ओना तs बाबाक समाजक प्रति अनेको उपकार छन्हि ताहिमे एक - दोसराक प्रति परोपकार सेहो बही - खातामे लिखल गेल छनि ! मुसाय बाबाक १ अगस्त २००३ कs देहवासन भs गेलन्हि मुदा हुनकर कृति एखनो धरी समाजमे व्याप्त अछि ! बाबाकेँ धन - सम्पति अपार छलनि ताहिसँ समाजमे मान-मर्जादा बहुत निक भेटैत छलनि ! दस बीस कोससँ लोक सभ मुसाय बाबासँ सुईद (व्याज) पर पाई लैक लेल आबैत छल ! कतेको ठिकेदार कतेको महाजन सभ हुनक दालानपर बैसल रहैत छलनि ! एक बेर मुसहरबा भाइ सेहो अपन विवाहक लेल मुसाय बाबासँ बीस (२०)गो टका लेने छल ! मुसहरबा भाइ बाबाक खास नोकर छलाह तs ओकरा मुसाय बाबा कहलखिन हे मुसहरबा भाइ हम जे तोरा २०गो टका देलियो से हमरा कहिया देबह? मुसहरबा भाइ बाबासँ कहलकनि जे मालिक हम तँ बीस गो टका सुईद (व्याजक) साथ दऽ देने छी ! अहि बातपर दुनू आदमीकेँ आपसमे बहस चलय लगलनि, बहुत हद तक झगड़ा आगू बढ़ि गेल ! ताबे मे किम्हरोसँ कारी बाबु एलथि. कहलखिन- " यौ। अहाँ दुनू आदमीक आपसमे किएक झगड़ा भs रहल अछि "! मुसाय बाबा सभ बात कारी बाबुकेँ कहलखिन आर मुसहरबा भाइ सेहो सभ बात कारी बाबुकेँ सुनेलखिन्ह ! तखन कारी बाबु कहलखिन- " हे मुसहरबा भाइ । अहाँ हिनका कखन - कखन आर कोना पाइ देलियनि से हमरा कहू ........ मुसहरबा भाइ बजलाह – " सुनू कारी बाबु, आ मुसाय बाबू अहूँ ध्यान राखब हमर कतय गलती अछि ? हमरा लग अपनेक टका छल बीस (२०) आहाँ आँखी गुरारीकेँ तकलहुँ हमरा दिस एक टका तखने देलहुँ ......... टका बचल उनैस (१९) अहाँ कहलहुँ अही ठाम बैस एक टका तखने देलहुँ ......टका बचल अठारह (१८) आहाँ लागलहुँ हमरा जोर सँ धखारह एक टका तखने देलहुँ ...... टका बचल सतरह (१७) आहाँ लागलहुँ हमरा जखन तखन तंग करह एक टका तखने देलहुँ .....टका बचल सोलह (१६) आहाँ लागलहुँ हमर पोल खोलह एक टका तखने देलहुँ ..... टका बचल पंद्रह (१५) आहाँ लागलहुँ हमरा टांग गरैरकऽ पकरह एक टका तखने देलहुँ .....टका बचल चौदह (१४) आहाँ लागलहुँ हमरा घर पर पहुँचह एक टका तखने देलहुँ ..... टका बचल तेरह (१३) आहाँ लागलहुँ हमर रस्ता घेरह एक टका तखने देलहुँ .....टका बचल बारह (१२) आहाँ लागलहुँ हमरा लाठीसँ मारह एक टका तखने देलहुँ ..... टका बचल एगारह (११) आहाँ लागलो हमर कुर्ता फारह एक टका तखने देलहुँ ...... टका बचल दस (१०) अहाँ कहलहुँ हमरा जमीन पर बस एक टका तखने देलहुँ ...... टका बचल नौउह (९) आहाँ कहलहुँ हमरा ओहिठाम नोकर बनिरह एक टका तखने देलहुँ ..... टका बचल आठ (८) आहाँ घोरैत छलहुँ खाट एक टका तखने देलहुँ .... टका बचल सात (७) आहाँ खाइत छलहुँ नून भात एक टका तखने देलहुँ ..... टका बचल छः (६) आहाँ उपारैत छलहुँ जौ एक टका तखने देलहुँ ....टका बचल पॉँच (५) आहाँ देखैत छलहुँ चौकी तोर नाच एक टका तखने देलहुँ...... टका बचल चारि (४) आहाँक सभ भाई मे बाझल मारि एक टका तखने देलहुँ .....टका बचल तीन (३) आहाँ सभ भाई भेलहुँ भीन एक टका तखने देलहुँ ..... टका बचल दू (२) आहाँ कहलहुँ महादेवक पिड़ी छू एक टका तखने देलहुँ ......टका बचल एक (१) आहाँ के बाबूजीक बरखी मे दक्षिणा देल एक टका तखने देलहुँ ...... बाँकी के बचल सुईद आर व्याज | ओहिमे देलहुँ ढाई मोन प्याज ॥" जय मैथिली, जय मिथिला मदन कुमार ठाकुर, कोठिया पट्टीटोला झंझारपुर (मधुबनी) बिहार - ८४७४०४, मोबाईल +919312460150 , ईमेल - madankumarthakur@gmail.com

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

जे छल सपना

||  जे छल सपना  || 

सुन - सुन  उगना  , 
कंठ सुखल मोर  जलक बिना  | 
सुन - सुन  उगना  ||  
                    कंठ  सुखल -----
नञि  अच्छी घर कतौ  !
नञि अंगना 
नञि  अछि  पोखैर कतौ 
नञि  झरना  | 
सुन - सुन  उगना  ||
                   कंठ  सुखल -----
अतबे  सुनैत  जे 
चलल   उगना  
झट दय  जटा  सँ 
लेलक  झरना  | 
सुन - सुन  उगना  ||
                   कंठ  सुखल -----
निर्मल  जल सरि  के  
केलनि  वर्णा  |
 कह - कह  कतय सँ 
लय   लें  उगना  || 
सुन - सुन  उगना  ||
             कंठ  सुखल -- 
अतबे  सुनैत  फँसी  गेल  उगना 
"रमण " दिगम्बर  जे 
छल सपना | 
सुन - सुन  उगना  ||
                   कंठ  सुखल -----





शनिवार, 9 दिसंबर 2017

हमर मिथिला



|| हमर  मिथिला || 



हम  त  मैथिल  छी , मिथिला लय जान दैत  छी  | 
एहि   अन्हरिया   में  , पूनम   के  चान  दैत   छी || 
जागू - जागू  यौ   मैथिल  भोर  भय गेल 
 हमर मिथिला केहन अछि  शोर भय गेल 
सूतल      संध्या   के    जागल   विहान     दैत   छी |
हम   त  मैथिल  छी , मिथिला लय  जान दैत  छी  ||
एहि बातक  गुमान , हमर मिथिला  धाम
जतय  के  बेटी  सीता , लेने  अयली  राम
मिथिला    नव     जाग्रति   अभियान   दैत      छी  |
हम   त  मैथिल  छी , मिथिला लय  जान दैत  छी  ||
जतय   सीनूर   पीठारे     ढोरल  अड़िपन
गीत गाओल  गोसाउनिक  मुदित भेल मन
शुभ     मंडप       में     पागे    चुमान    दैत       छी  |
हम   त  मैथिल  छी , मिथिला  लय  जान दैत  छी  ||
कवि  कोकिल  विद्यापति  चंदा झा छलैथ
गार्गी   मंडन   लखिमा    अनेको       भेलैथ
"रमण  " पग  - पग पर  पाने  मखान  दैत  छी  |
हम   त  मैथिल  छी , मिथिला लय  जान दैत  छी  ||
रचनाकार -
रेवती रमन झा "रमण "
मो -  9997313751 





बुधवार, 29 नवंबर 2017

विद्यापति के गाम बौआ ।

       ।। विद्यापति के गाम बौआ ।।

        

                    इहय  ग्राम  विसपी,   विद्यापति  के  गाम  बौआ ।
                 एहि माटि के तिलक करु,छूबि क प्रणाम बौआ ।।
                   एहि   ठाम गीतक  त्रिवेणीक  धारा
                   सम्पत्ति मध्य मात्र बाँसक पिटारा
                   हिनकहि  चरण जे छूबि लेली गंगा
                 अतय  शम्भू- उगना  बनल   छथि  गुलाम  बौआ।
                   इहय  ग्राम  विसपी,  विद्यापति  के  गाम  बौआ ।।
                 एहि पूण्य माटि सँ  सीया बहरयली
                 राजा  जनक केर   कन्या कहयली
                 इहय पवित्र भूमि, इ थीक मिथिला
           एहिठाम   दशरथ   के    पुत्र   एला  राम   बौआ ।
               इहय  ग्राम  विसपी,  विद्यापति  के  गाम बौआ ।।
                 बिना याचना   केर अयाचीक  जीवन
                    अतय छली लखिमा,अतय छला मंडन
                 अपूर्ण पाँच बर्षहि में पूर्ण भेला शंकर
             कविवर   चन्दाक  देखू   पूण्य -  धाम   बौआ ।
               इहय ग्राम विसपी,  विद्यापति के गाम बौआ ।।
                 साँझ  में  संझा , आ  प्रात  पराती
                  माटिक  पातिल  में , चौमुख  बाती
                  मंगल  कलश  पर  आमक  पल्लव
         गोवर  सँ  नीपल  आ  अडिपन  ललाम बौआ ।
            इहय  ग्राम विसपी, विद्यापति  के गाम बौआ ।।
                               
                               " रचनाकार "
                             रेवती रमण झा " रमण "
                             09997313751
                               








शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

मउहक गीत

|| मउहक  गीत || 
                                              रचित - रेवती रमण झा "रमण "

 खीर   खैयौ  , नञि  दूल्हा लजैयौ  ऐना  | 
सारि छथि सोंझा , सरहोजि नव साजलि 
वर      विधकरी     आगाँ   में     बैसलि  
चहुँ     नव  - नव लोक    भरल  अंगना | 
   खीर   खैयौ  , नञि  दूल्हा  लजैयौ  ऐना  ||   
 एकटा    हमर   बात   मानू   यौ    रघुवर  
आजुक    खीर , नञि   करियौ   अनादर 
पुनि   मउहक   के  थारी होयत  सपना | 
 खीर   खैयौ  , नञि  दूल्हा लजैयौ  ऐना  || 
" रमण " सासुर केर  मान  आइ  रखियौ 
सासुरक  सौरभ  ई  खीर  आइ  चखियौ 
बाजू - बाजू    यौ  दुहा  मनाबू  कोना  | 
 खीर   खैयौ  , नञि  दूल्हा लजैयौ  ऐना  | 
:-

मउहक  गीत - 2
 खैयौ ,  खैयौ   खीर   यौ   पाहुन  
 की   छी  गारि  सुनैलय  बैसल  |  
सोझ  करैलय   हमर  धिया  यौ 
अहाँक     घर       में      पैसल || 
                  खैयौ ,  खैयौ  ------
  सभ्य ग्राम  केर  उत्तम कुल सँ 
निकहि        बापक          बेटा 
जे - जे     मंगलौ  , देलौ  सबटा 
बेचि     कय       थारी     लोटा  
मान - मनौती  अतिसय कयलौं 
तनिक    विवेक  नञि जागल  || 
                 खैयौ ,  खैयौ  -----
सुभग  नैन   नक्स  वर  ओझा   
कीय     मति     के      बकलोल  
सबटा  ब्यंजन   छोरी -छोरी कय 
माय         खुऔलथि         ओल  
   सब   कियो  घर में सान्त स्वरूपहि 
कियक    अहाँ     छी      चंचल  || 
                      खैयौ ,  खैयौ  ------
जानू  "रमण " खीर  केर  महिमा 
ई      मिथिला        केर        रीत 
सुमधुर गीत  गाबथि   मिथिलानी 
पावन           परम            पुनीत 
तिरहुत    देश     हमर  ई     देखु , 
आइ        हँसैया      खल - खल 
                   खैयौ ,  खैयौ   -----

लेखक : -
रेवती रमण झा ''रमण "
मो - 91  9997313751




मैथिली संस्कृति अथवा मिथिलामक अवयव

                                                                डॉ. कैलाश कुमार मिश्र

मैथिली संस्कृति अथवा मिथिलामक अवयव  

      मैथिली संस्कृतिकेँ समग्रतामे मिथिलाम कहल जा सकैत अछि। कुनो सांस्कृतिक क्षेत्र अपन किछु विशेष खानपान, विध बेबहार, गीत संगीत आदिक कारणे विशेष स्थान आ पहिचान रखैत अछि। मैथिली संस्कृति अथवा मिथिलामक सेहो अपन विलक्षण विशेषता छैक। कनिक ओहि विलक्षणता पर विचार करी।
मिथिलाम संक्षिप्त रूपसँ 6 भाग में देखल जा सकैत अछि:
क) खानपान, ख) वस्त्र विन्यास, ग) गीत आ संगीत, घ) वाद्ययंत्र, च) भाषा , छ) धार्मिक संप्रदाय आ परंपरा।
क. खानपान 
खानपान कोनो समाजक संस्कृतिक मूल होइत अछि। 
परम्पराक बात करी त' मैथिल चारि बेर भोजन करैत छथि:

i.  पनपियाइ: किछु आहारग्रहण उपरांत जलग्रहण। 
ii. कलउ/ मँझिनी: मध्याह्न भोजन कायाकल्प तृप्यान्त स्थुल शरीर तृप्त्यार्थ अन्न-फल-जल सँ परिपूरित            भोजन।
iii. बेरहट: दिनक चारिम पहर मे लेल जायवला आहार।
iv. रातुक भोजन। कतेक लोक रातिक हल्लुक आ सुपाच्य आहार लैत छथि जकरा "हलझप्पी" कहल जाइत           अछि।
आब कनि सामग्री आ विन्यासक बात करी:

मिथिला मे खानपान दू दृष्टिकोण सँ देखल जा सकैत अछि। भोजनक मुख्य आ स्थानीय तत्त्व आ दोसर भोजनक सचार। जखन बहुत रासक वस्तुसँ भोजनक थारी अथवा थार सजाएल जाएत अछि त' ई भेल सचार। सचार में कोनो जरुरी नहि जे सब वस्तु अथवा भोज्य सामग्री स्थानीय हो। जखन भोज्य सामग्री के बात करैत छी त मिथिलाक मूल भोज्य सामग्रीक ज्ञान बुझ पडत। 
एक फकड़ा कहल जाइत छैक:--
तिरहुतीयताक भोजन तीन।
कदली    कबकब      मीन।।

आब कनि एकरा देखी:
      कदली (केरा): केरा गाछक सब चीज़क प्रयोग मिथिला मे होइत अछि। थम्बक भीतरक गुद्दाक तरकारी, कोषाक तरकारी, कांच केराक तरकारी, पाकल केराक विविध रूप मे प्रयोग। कोनो भार बिना केराक पूर्ण नहि अछि। केराक प्रयोग सब बिध, बेबहार, पूजा पाठ, उत्सव, सत्यनारायण कथा आदि मे होइत अछि। कांच केराक तरकारी पथ्य के रूप मे प्रयुक्त अछि। केरा थम्भ के बहुत शुभ कार्य मे प्रयोग होइत अछि। केराक पात पर भोजन करब अदौसँ अबैत परंपरा अछि।

          कबकब: कबकबक अंतर्गत भेल ओल, खमहारु , कौआं पात , ओलक पेंपी, कन्ना पात, अरिकंचक लोढ़हा, आदि। ओल शुद्ध आ सुपाच्य वस्तु अछि। सामूहिक भोज में ओलक सन्ना अनिवार्य रहैत अछि। ओलक तरकारी सेहो खूब चावसँ हमरालोकनि खाइत छी। खमहारुक तरुआ अथवा खमहारुआ मिथिलाक विशेषता अछि। अरिकोंच ओनात' सब खाइत छथि मुदा स्त्रीगनक मध्य ई कनि अधिक प्रिय अछि। कबकब भोज्य पदार्थक विन्यासमे कागजी, ज़मीरी नेबो, कांच आम, आ आमिलक प्रयोग होइत अछि।
एकर अतिरिक्त सुथनी, अरुआ आदि पदार्थक सेहो कबकबक श्रेणी मे राखल जा सकैत अछि।

        मीन : मीनक अर्थ भेल माछ। माछ त अपना सभक भोजनक मुख्य पदार्थ अछि। अनेक तरहक माछ आ माछक संग संग ओहि प्रजातिक अन्य चीज़ जेना कांकोड, डोका, काछु आदि खेबाक परंपरा मिथिला मे अछि।
माछक अनेक तरहेँ उपयोग भोजन विन्यास मे होइत अछि। माछक तरल, माछक झोड़, माछक सन्ना आदि।

       ई त भेल तीन मुख्य तत्त्व। एकरा अतिरिक्त किछु पदार्थ अछि जे मैथिल के बहुत प्रिय छनि। ई सब अछि:
          नाना तरहक साग, जेना केराव, बूट, गेनहारी, बथुआ, ख़ेसारी, करमी आदि। सागक महत्व मिथिला मे बहुत रहल अछि। बसन्त पंचमी लगैत देरी बेटी सगतोरनी भ' जाइत छैक। बूट-केराव आ खेसारीक साग तौला सभमे मह-मह करैत खदकैत रहैत छैक। सामान्य लोक आ सभ जातिक लोक साग-भात भरि इच्छा हरियर मरिचाइ गूडि गूडि सुआद लए लए खाइत अछि। बिना तिलकोरा तरुआकेँ मिथिलाक भोजन बेकार। चाउर पिठारक लेप मे बोरि क' सरिसबक तेल मे तरब। कुर कुर स्वादक अनुभूति सँग खैब मिथिले मे संभव छैक।

          गरीब गुरबा सब कुअन्न जेना मड़ुआ, ख़ेसारी, अल्हुआ, कौन, साम, मकई, अल्हुआ, कन्द आदि खाए सेहो अपन गुजड़ करैत छ्ल। आब स्थिति मे सुधार भेलैक अछि आ सब कियोक एक साँझ भात त दोसर साँझ गहुमक सोहारी एकर अतिरिक्त तरकारी, तीमन, दालि अचार आदिक सङ्ग खाइत छथि।

     दही-चूरा, चीनी: समस्त विश्व मे मिथिले एहेन क्षेत्र अछि जतए दही-चूरा-चीनी मुख्य भोजन आ भोज इत्यादि मे सामूहिक भोजनक रूप मे खाएल अछि। अतेक झटदनि तैयार होबए बला फ़ास्ट फ़ूड दुनिया मे बहुत कम थिक।
       आ सब व्यंजन पर भारी पड़ैत अछि अपन मिथिलाक तिलकोरा । सर्वत्र उपलब्ध, ने दाम ने छदाम, आ स्वादक की कहब? छोट पैघ सब मे अपन स्थान रखने अछि। ई एहेन भोज्य पदार्थ अछि जकरा केवल मैथिल खाइत छथि।
           मिथिलाक भोजक सकरौड़ी विलक्षण होइत अछि। एकरा अपन सभक भात दालिक भोजन के डेजर्ट कहि सकैत छी। सकरौड़ी दूध मे ड्राई फ्रूट्स, बुनिया एवं अन्य सामग्री डालि दूध के खूब गाढ़सँ खौलेलाक बाद बनैत छैक। चीनी सबसँ अंत मे देल जाइत छैक। भोज मे लोक चीनी सुरकैत अछि। सकरौड़ीसँ भोजक अंत होइत अछि। 
           दालि भातक भोजक श्रृंगार थिक बर ।   बर सामान्यतया उड़िदक घाटिसँ बनैत अछि। 
मखान: भारतवर्ष मे सबसँ अधिक मखान अपन मिथिला मे होइत अछि आ सबसँ बेसी एकर उपयोग सेहो हमरे लोकनि करैत छी। 
अंततः भोजनक पूर्णता मुखशुद्धि सँ होइत अछि आ मुखशुद्धि पान सुपारी संगे।
ख. वस्त्र विन्यास 
    परंपरागत वस्त्र मिथिलाक पुरुष लेल धोती, गमछा, या मुरेठा आ स्त्रीगण लेल नुआ, आंगी अछि। किछु विशेष वर्गक लोक या त विशेष अवसर पर अथवा ओहुना पाग सेहो धारण करैत छथि। धोती त मिथिलाक मुसलमान सेहो पहिरैत छला। आब मुस्लमानक बाते छोड़ू हिन्दू सब सेहो धोती सँ बप्पा बैर केने जा रहल छथि। पहिने अपना ओत कोकटा बाँग होइत छल जकर प्राकृतिक रंग ऑफ वाइट होइत छलैक। ओही बांग केर धोती के कोकटा धोती कहल जाइत छलैक। 
         प्राचीन समयमे पुरुष गाम गमैत भ्रमण करबा काल धोती, मिर्जई, दुपट्टा, गमछा, आदिक प्रयोग करैत छला। पैर मे खराम पहिरबाक प्रथा हाल तक छल। पाहुन परखक पएर धोबक हेतु खराम देल जेबाक परंपरा एखनो बहुत ठाम अछि। उच्च वर्ण मे खराम पहिरक व्यवस्था उपनयन संग प्रारम्भ भए जाइत छल। किछु लोक खरपा सेहो पहिरैत छला। खरपाक आधार आर्थत तरवा काठक आ ऊपर मे आँगुर लग प्लास्टिक अथवा चाम लागल रहैत छलैक। 
           कालान्तर मे लोक गोल गला सेहो पहिरनाइ प्रारम्भ केलनि। 
मिथिलाक स्त्रीगण सब व्यवहार कएल वस्त्र यथा धोती आ नुआ सँ केथड़ी आ सुजनीक निर्माण सुई ताग सँ करैत छली। केथड़ी मोटगर होइत छैक जकर व्यवहार मोटगर गद्दा जकाँ जारक समय बिछेबाक हेतुकएल जाइत छैक। सुजनी कलात्मक होइत छैक। सुजनी मे अनेक तरहक तागक सुन्नर संयोजनसँ बहुत रास डिजाईन , मोटिफ, वोटिफ, पैटर्न आदि बनेबाक प्रथा मिथिला मे छलैक। सब वर्ग आ जातिक स्त्रीगण एहि कलामे निपुण होइत छली। सुजनीक प्रयोग ओछाइनक चद्दरिक रूप मे होइत छैक। किछु लोक गरीबी मे केथड़ी सेहो ओढ़ैत छथि। 
        पूस मासक जड़काला गोइठा-करसी धरि तापए बला रहैत छैक। ओना त' माघक जाड़ बाघ होइत अछि मुदा पंचमी लगैत देरी घोकचल चाम आ मोचरल अंग साहि लोक सोझ भ' क' ठाढ़ होमय लगैत अछि। मोटकी दुसल्ला चद्दरिक गांती बनहैत अछि। गांतीक अर्थ भेल चद्दरिकेँ माथ सँ झाँपैत गरदनिक पाछा मे गिठह बान्हब। सामान्यतया बच्चा आ बूढ़ गांती बनहैत छथि। घूर लोक अगहन, पूस आ माघ धरि पजबइत अछि आ तपैत अछि।

ग. गीत संगीत 
        मिथिलाक लोकगीत एक महासागर अछि। एकर संख्या कतेक अछि से कहब असंभव। मैथिली लोकगीतक विशेषता एकर समवेत गायन शैली छैक। लगभग 98 प्रतिशत गीत बिना कोनो वाद्ययंत्र और विशेष रागसँ गाएल जाइत अछि। मुदा गीतक शब्द, भाव, गबैय्याक उत्साह आ समर्पण, विध बेबहारक प्रति ध्यान , ऋतुक संग स्वभाव, क्रियाकलापसँ प्रतिबद्धता, काज मे लगाव, आपसी प्रेम आ प्रकृति सँ अनुराग बिना कोनो वाद्ययंत्र के सेहो मैथिली लोकगीत के अलग संसार मे ल जाइत अछि। विद्यापतिक पदावली, ताहू में उत्सव विशेषक गीत, सोहर, समदाउन, उदासी, साँझ, प्राती आ शिवक गीत मे महेसवानी , नचारी आ कमरथुआ गीत तन-मनकेँ बहुत हर्षित करैत अछि। सीता, राजा सलहेस, कारिख महाराज, दीनाभद्री, आदिक लोकगाथा आ गीत सेहो अपन अलग स्थान रखैत अछि। सब शास्त्रीय गीत मिथिला मे बहार सँ आयातित अछि, यद्यपि ध्रुपद मैथिली लोकशैली संगे तारतम्य बना सकल अछि। बटगबनी, तिरहुत, लगनी तीव्रगति सँ चलैत गीत आ मोन लगबए बला गीत अछि। उदासी संत परंपरा, कबीरपंथी परम्परा, सँ प्रभावित भ रचल गेल अछि। 
       मिथिलाक उच्चवर्ग विशेष रूपसँ ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ अपन महिला के पब्लिक स्पेस मे गायन, वाद्ययंत्र संगे गायन, नृत्य आदिक स्वतंत्रता नहि देने छथि जाहिसँ एहि वर्गक महिला मे नृत्य, नृत्यगीत, नृत्यनाटिका आदिक शैली नहि विकशित भ सकल छनि। अन्य जाति सब मे डोमकच्छ, जटा-जटिन, झ्झिया, आदिक रूप भेटैत अछि। शामा चकेबा मे बहुत साधारण तरहक नृत्य आ उत्साहक स्वतंत्रता देखैत छी।

          मुस्लमान महिला सब ताजिया के समय झिझिया छाती पीट पीट गबैत छथि। हुनकर स्वर आ टोन बहुत हद तक उदासी आ समदाउन सँ मेल खाइत छनि।

घ. वाद्ययंत्र 
       मिथिलाक मूल वाद्ययंत्र रसनचौकी मे प्रयुक्त होइत अछि। दुर्भाग्य सँ एकरा कहियो मिथिलाक तथाकथित विद्वान लोकनि प्रोत्साहित नहि केला। एकरा बारेमे कहल जाइत अछि जे जखन सीता राजा जनक द्वारा हर जोतैत काल स्वर्ण कुम्भसँ धरतीसँ बहार भेली त भगवान स्वर्गसँ प्रसन्न होइत अप्सरा, वाद्ययंत्र आ ओकरा बजबए बला कलाकार सेहो मिथिला पठेला। किछु लोकक कहब छनि जे चूँकि ई वाद्ययंत्र चमार बजबैत छथि ताहि एहि पर विशेष ध्यान नहि देल गेल।
 च. भाषा:
        मैथिली भाषा प्राचीन भाषा अछि। एकर अपन लिपि छैक मुदा आब लोक देवनागरी मे लिखैत छथि। बंगला लिपि मिथिलाक्षर सँ प्रेरित भ बनल अछि। एहि भाषा में विद्यापति, ज्योतिरेश्वर, चंदा झा, लाल दास, हरिमोहन झा आ यात्री सनहक़ साहित्यकार भेल छथि। मैथिली भाषाक अनेक उपभाषा अथवा बोली जेना अंगिका, बज्जिका, मुस्लमानक (कुंजड़ा), सीतामढ़ीक उपभाषा आदि मे देखल जा सकैत अछि।
छ.  धर्म आ संप्रदाय 
        मिथिला मे सब वर्णक लोक, सब धर्मक लोक रहैत छथि। अतए केर हिन्दू पंचोपासक छथि। महादेवक पूजा माटिक महादेव बना अद्भुत ढंग सँ कएल जाइत अछि। बुद्धक भाषा आ चार्यपदकेँ एखनो मैथिली अपना मे आत्मसात केने अछि। तंत्रमे बौद्ध तंत्रक स्पष्ट प्रभाव छैक। सिद्धपीठ आ बज्रयानक तंत्र स्थल मिथिला मे आबि जेना संगम जकाँ एक दिशा मे एक भए बहए लगैत अछि। मुस्लमान सब सेहो अपन धर्मक पालन करैत छथि संगहि किछु लोक परंपराक तत्वक अपना मे समावेश क लेत छथि।

सीताकेँ मिथिलाक स्त्री नायिकाक प्रतिनिधि आ राजा सलहेसकेँ पुरुष नायकक प्रतिनिधि कहल जा सकैत अछि।
ज. मिथिला चित्रकला
मिथिला चित्रकला जकरा मधुबनी चित्रकला सेहो कहल जाइत अछि, अपन स्थान आ नाम कला संसार मे नीक जकाँ दर्ज करा लेने अछि। एहि पर बड्ड लिखब अनिवार्य नहि। इंगित भ गेल अतेक काफी अछि।

बुधवार, 22 नवंबर 2017


विवाह पंचमी के मंगल मय  शुभकामना अछि  ,
                                    रेवती रमन झा "रमण "
|| विवाह - गीत || 
बाबा     करियो       कन्या      दान  
बैसल   छथि  , बेदी पर  रघुनन्दन | 
 दशरथ सनक  समधि  छथि आयल 
 हुनकर        करू       अभिनन्दन  ||  
                        बाबा करियो ----
नयनक    अविरल     नोर     पोछु  
ई    अछि      जग    के      रीत  | 
बेटी   पर  घर    केर  अछि   बाबा 
अतबे    दिन  केर   छल    प्रीत  || 
मन  मलान  केर  नञि अवसर  ई 
चलि     कय  करू   गठबन्धन   || 
                     बाबा करियो ----
जेहन   धिया   ओहने  वर  सुन्दर 
जुरल         अनुपम           जोड़ी  |
 स्वपन  सुफल सब  आइ हमर भेल 
बान्धू            प्रीतक            डोरी || 
आजु    सुदिन   दिन   देखू     बाबा 
उतरि    आयल   अछि   आँगन   || 
                  बाबा करियो ----
हुलसि   आउ  सुन्दरि  सब   सजनी 
गाबू                मंगल             चारु | 
 भाग्य        रेख   शुभ रचल   विधाता 
अनुपम            नयन           निहारु  || 
"रमण " कृपा  निज दीय ये गोसाउनि 
कोटि - कोटि  अछि  बन्दन  || 
   बाबा करियो ----

शनिवार, 11 नवंबर 2017

हम मूर्ख समाजक वाणी छी

|| हम  मूर्ख  समाजक वाणी छी || 
हम  मुर्ख समाजक वाणी  छी  | 
ज्ञाता जन छथि सदय कलंकित 
हमहीं  टा    बस   ज्ञानी    छी || 
                     हम  मुर्ख ---  || 
रामचंद्र    के   स्त्री    सीता  
तकरो      कैल    कलंकित  | 
कयलनि डर सं अग्नि परीक्षा 
भेला    ओहो    शसंकित    || 
एक्कहि  ठामे  गना दैत  छी 
सुर   नर   मुनि  जे   ज्ञानी | 
हम कलंकित सब  के कयलहुँ 
देखू      पलटि     कहानी  ||  
बुद्धिक-बल   तन  हीन  भेल 
बस आप  नौने  सैतानी छी | 
                  हम  मुर्ख ---|| 
बेटा  वी. ए. बैल हमर अछि 
हम   फुइल    कय  तुम्मा  | 
नै  केकरो  सँ  हम  बाजै छी 
बाघ   लगै    छी    गुम्मा  || 
अनकर  बेटा   कतबो बनलै 
 रहलै       त         अधलाहे | 
अगले    दिन उरैलहुँ  हमहीं 
कतेक    पैघ     अफवाहे  || 
अपनहि मोने,अपने उज्ज्वल 
बस   हम   सब  परानी  छी | 
                   हम  मुर्ख ---  ||   
बाहर  के कुकरो  नञि पूछय 
गामक       सिंह       कहबी  | 
परक    प्रशंसा  पढ़ि  पेपर में 
मूँह    अपन     बिचकावी   || 
सदय इनारक फुलल  बेंग सन 
रहलों        एहन        समाज  |
आनक   टेटर  हेरि  देखय लहुँ 
अप्पन       घोलहुँ       लाज | | 
अधम मंच  पर बैसल हम सब 
पंडित  जन  मन  माणि  छी | 
                        हम  मुर्ख --- ||  
गामक    हाथी  के  लुल्कारी  
जहिना      कुकर     भुकय  | 
बाहर   भले  देखि कय हमर 
प्रभुता    पर   में     थुकय  || 
अतय   सुनैने  हैत ज्ञाण की 
वीघर  छी   कानक     दुनू  |
 कोठी  बिना अन्न केर बैसल 
ओकर     मुँह    की    मुनू  || 
हम  आलोचक   पैघ सब सँ 
हमहीं     टा      अनुमानी  || 
                 हम  मुर्ख --- || 
माली  पैसथि  पुष्प  वाटिका 
सिंचथि        तरुवर       मूल | 
पंडित   पैसथि  पुष्प  वाटिका 
लोढथि      सुन्दर      फूल  | | 
लकरिहार  जन  लकड़ी  लाबय 
चूइल्ह       जेमबाय      गामें  |
 सूअर    पैसय    पुष्प  वाटिका 
विष्ठा         पाबय       ठामे  || 
जे अछि  इच्छु  जकर तेहन से 
दृष्टि      ताहि    पर     डारय | 
मूर्खक  हाथ  मणि अछि पाथर 
ज्ञानी       मुकुट      सिधारय  || 
"रमण " वसथु जे एहि समाज में 
मर्दो    बुझू      जनानी      छी  | 
हम   मुर्ख समाजक  वाणी  छी 
                       हम  मुर्ख ---|| 
 रचनाकार -:


रेवती रमन झा "रमण " 
गाम- जोगियारा पतोंर दरभंगा ।
मो - 9997313751 

बुधवार, 8 नवंबर 2017

पावन हमर ई मिथिला धाम

|| पावन हमर ई मिथिला धाम || 

हनुमंत  एक    बेर  आबि के   देखियो 
पावन      हमरो    मिथिला    धाम   | 
अपन    सासुर     में  बैसल      छथि 
अहाँक      प्रभु      श्री            राम  || 
                              हनुमंत एक बेर ----
  जनम - जनम तप ऋषि -मुनि कयलनी 
नञि           पुरलनी        अभिलाषा  | 
 चहुँ     दिश   सरहोजि  सारि  घेरि कउ 
कयने           छन्हि          तमसा  ||  
                                हनुमंत एक बेर ----
वर     हास - परीहास    कुसुम - कली 
छाओल           ऋतु         मधुमासे  | 
सात    स्वर्ग - अपवर्ग  कतौ   नञि 
एहन           मधुर           उपहासे  || 
                            हनुमंत एक बेर ----
एकहि   इशारे ,    नाचि रहल छथि 
बनि        कय       जेना      गुलाम |
"रमण "   सुनयना सासु  मुदित मन 
शोभा        निरखि          ललाम ||   
                        हनुमंत एक बेर ----

रचित -
रेवती रमन झा "रमण "
मो - 9997313751 




मंगलवार, 7 नवंबर 2017

अगहन मास

 ।। अगहन मास ।।


आयल    अगहन   सेर   पसेरी
मूँसहुँ         बीयरि       धयने।
     जन  बनि हारक मोनमस्त अछि
    लोरिक      तान         उठौने ।।  

भातक दर्शन पुनि पुनि परसन
होइत        कलौ    बेरहटिया ।
भोरे  कनियाँ  कैल   उसनियाँ 
परल      पथारक     पटिया ।।

   फटकि-फटकि खखड़ा मुसहरनी
खयलक      मुरही        चूड़ा ।
नार पुआरक कथा कोन अछि
वड़द    ने     पूछय     गुड़ा ।।

चारु    कात   धमाधम   उठल
जखनहि    उगल     भुरुकवा ।
 साँझक साँझ परल  मुँह  फुफरी
तकरो      मुँह     उलकुटवा ।।

रचयिता
रेवती रमण झा "रमण"
मो - 9997313751