(एकमात्र संकल्‍प ध्‍यान मे-मिथिला राज्‍य हो संविधान मे) अप्पन गाम घरक ढंग ,अप्पन रहन - सहन के संग,अप्पन गाम घर में अपनेक सब के स्वागत अछि!अपन गाम -अपन घर अप्पन ज्ञान आ अप्पन संस्कारक सँग किछु कहबाक एकटा छोटछिन प्रयास अछि! हरेक मिथिला वाशी ईहा कहैत अछि... छी मैथिल मिथिला करे शंतान, जत्य रही ओ छी मिथिले धाम, याद रखु बस अप्पन गाम ,अप्पन मान " जय मैथिल जय मिथिला धाम" "स्वर्ग सं सुन्दर अपन गाम" E-mail: madankumarthakur@gmail.com mo-9312460150

ज्ञान सागर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ज्ञान सागर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 21 सितंबर 2011

नारी समाज की हकीकत

नारी समाज की हकीकत
करुणा झा

“नारी तुम केवल श्रद्धा हो ।
विश्वास रजत नगपग तल में
... पीयुष श्रोत सी बहा करो,
जीवन के सुन्दर समतल में”

कविवर जयशंकर प्रसाद की ये पंक्तियाँ शायद तब हीसार्थक सिद्ध हो सकती है, जब औरतों के प्रति इस समाज की सोच विकसित हो । पुरुष मानसिकता बाले इस समाज में महिलाओं की स्थिति अब भी दूसरे दर्जे की बनी हुई है । आज २१वीं सदी में भी मध्य युग की उन सडी–गली रुढियों और मान्यताओं को ढोने और पुरुषों के प्रत्येक अत्याचारों को झेलने के लिए अभिशप्त है, जिन्होंने उनकी जिंदगी नारकीय बना दी थी । महिलाओं पर दिनों दिन लगातार बढती अत्याचार की घटनाओं ने विचारशील लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि या तो कानून ठीक ढंग से अपना काम नहीं कर पा रही है अथवा महिलाओं के प्रति नजरिये में अभी बदलाव नहीं आया है । कहा जाता है – किसी देश की स्थिति को जानने का पैमाना यह है कि वहाँ की महिलाओं की स्थिति पर नजर डालें तो पताल लगता है कि उनकी हालत अब भी सोचनीय और दयनीय बनी हुई है, छेडखानी, दुराचार, दहेज, हत्या, कन्या भ्रुण हत्या, बाल विवाह, तलाक, परिवार की इज्जत के नाम पर हतया, बलात्कार, यौन शोषण आदि अनेकानेक अत्याचारों के कारण उन्हें घर और बाहर आये दिन शारीरिक और मानिसक यातनाों से गुजरना पडता है । ऐसी स्थिति मे हम कैसे कह सकते है कि महिलाएँ आगे बढ रही हैं । ऐसा नहीं है कि महिलाओं की स्थिति में बिल्कुल ही सुधार नहीं हो पाया है । आज की महिलाएं, हर क्षेत्र में पुरुष की बराबरी भी कर रही है मगर उन्हें भी समय समय पर हतोत्साहित किया जाता रहा है । लैंगिक विभेदता अभी भी हमारे समाज में इस तरह है कि महिलाएँ हर क्षेत्र में इसका शिकार बनती आ रही हैं ।
सती प्रथा, देवदासी प्रथा आदि अनेक कुरीतियाँ भी आज तक उनके पैरो की बेडियाँ बनी हुई है । तेजाब डालने, नौकरी दिलाने का झाँसा देकर विदेश भेजने या शोषण करने, धन के लिए गरीब माँ–बाप द्वारा लडकियों और महिलाओं को बेचने आदि घटनाएं भी रोजाना अखबारों की सुर्खियाँ बनी रहती है । इतना ही नही घर में होने बाली हिंसा का भी उन्हे शिकार बनना पडता है । भारत के बिहार, पश्चिम बंगाल, प्रजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के भूस्वामियों को लडकियाँ बेची जाती है जो उनके घरों मे नौकरीयाँ बनकर घुट घुटकर जिन्दगी जीने को मजबूर है । ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारत और नेपाल में ही महिलाओं के खिलाफ शोषण के इन रुपों का इस्तेमाल होता है । दुनियाँ भर में किसी न किसी ढंग से उनपर जुल्मों सितम ढाये जाते हैं । किर्गिस्तान में तो दुल्हन का अपहरण आम बात है । फर्क सिफ इतना है कि पहले अपहरण किया जाता था, अब कार से जबरन उसे भावी शौहर के घर ले जाया जाता है । वहाँ दुल्हन को शादी के लिए मनाने की कोशिश की जाती है । उनके नही मानने पर कुछ परिवारों में तो तब तक बंधक बनाकर रखा जाता है जब तक वह शादी के लिए रजामन्द नहीं हो जाती है । खास बात यह है कि इस काम में दुल्हन के घर बाले भी शामिल रहते हैं । इथोपिया और रुवाण्डा में तो यह प्रथा बेहद क्रुर है । परिवार की इज्जत बचाने के नाम पर दुनियाँ भर के देशों में महिलाओं की हतया का चलन काफी पुराना है । भारत, नेपालके अलावा पाकिस्तान, बंग्लादेश, अलबानियाँ, कनाडा, ब्राजील, डेनमार्क, जर्मनी, इराक, इजरायल, इटली, साउदी अरब, स्वीडेन, यूगांडा, इग्लैण्ड और अमेरिका में इस तरह की हत्याएँ होती रहती है । माता पिता की पसंद के व्यक्ति से विवाह करने से मना करने, तलाक मांगने पर महिलाओं की हत्याएँ की जाती है । तेजाब डालकर महिलाओं का चेहरा जला देने की घटनाएँ अफगानिस्तान में आम है । धाना में धार्मिक दास्ता के तहत लडकियाँ को उसके परिवारवाले मंदिरो मे भेजते है, जहाँ पुजारी उनका शोषण करता है, ओर उससे मुफ्त मे काम करवाता है ।
सवाल यह उठता है कि हमारे संविधान से स्त्री को पुरुष के बराबर का दर्जा देने और उन पर होने बाले अत्याचारों को रोकने के लिए अनेक कानुनों के रहते हुए भी इनमें कमी होने की बजाय बृद्धि ही होती जा रही है । इस समस्या का समाधान समाज के साथ खुद स्त्री को ढुंढना होगा । एक मुख्य कारण तो यह है कि सदियों की गुलाम मानसिकता के कारण महिला अब भी अपने ऊपर होने बाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद करने का साहस नहीं जुट पाती है । वह यह सोचकर खामोश रह जाती है कि यदि उसने कोई कदम उठाया तो उसके और उसके परिवार की मान मर्यादा और प्रतिष्ठा पर धब्बा लग सकता है । उसे यह डर भी रहता है कि जुर्म करनेबाला व्यक्ति यदि प्रभावशाली हुआ तो वह कानून की गिरफ्त से बच निकलेगा और उसका जीना मुहाल हो जायेगा ।
समय पर अत्याचार का विरोध नहीं करना जुल्म को बढावा देता है । यह सच है कि कानून की अपनी अहमियत है और उन्हे कारगर बनाये जाने की जरुरत है । लेकिन विरोध की आवाज बुलन्द करने की पहल तो नारी को ही करनी होगी । घर में होनेबाले अत्याचारों पर भी यदि वह खामोश बैठ जाती है तो उनकी यातना के सफर का अंत होनेवाला नहीं है । प्रसिद्ध शायर साहिर लुधियानवी ने अपनी एक कविता में लिखा है –

“औरत ने जन्म दिया मर्दो को
मर्दो ने उन्हें बाजार दिया
जब जी जाहा मसला कुचला
जब चाहा दुत्कार दिया”

कवि के इस कथन के संदर्भ में नारी को अपनी शक्ति का अहसास करना होगा कि यदि मर्र्दो ने उसे बाजार दिया तो संसार तो उन्होंने ही दिया है । फिर वह खामोश रहकर अत्याचार क्यों बर्दाश्त करती है । औरत किसी भी मामले में पुरुषों से कम नही है, आज भारत में  ही देखे, महिला शक्ति से भरपूर राष्ट्र है । विपक्ष में सुषमा स्वराज, राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, सोनिया गाँधी देशमें, कल्पना चावाल स्पेश में, पी.टी. उषा रेस में, ऐश्वर्या राय फेस में । फिर, क्यों न हममें भी हौसला हो बुलंदियो को छुने का । मै तो कहती हूँ कविता लिखनी चाहिए ।
“करो नयाँ संकल्प अभी तुम
गढ लो नई कहानी
या तो जीजाबाई बनो
या झाँसी की रानी”

तो फिर वो दिन दूर नहीं जब महिला सशक्तीकरण बर्ष नहीं पूरा देश ही महिला शक्ति से भरपूर होगा । अस्तु ।।
 

सोमवार, 31 जनवरी 2011

ऐसे चलें-बैठें कि सेहत न रूठे

अटेंशन, छाती बाहर, कंधे पीछे... स्कूलों में असेंबली के दौरान ये कमांड सुनते बड़े होते हैं हम सभी, लेकिन स्कूल से निकलते ही इन शब्दों को पीछे छोड़ देते हैं। ज्यादातर लोग मानते हैं कि यह सेना, पुलिस या फिर मॉडलिंग से ताल्लुक रखनेवाले लोगों के काम की चीज है, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि अच्छा पॉश्चर (मुद्रा) हमारी पर्सनैलिटी में निखार तो लाता ही है, हमें कई बीमारियों से भी बचाए रखता है। अच्छे पॉश्चर के फायदे और उसे पाने के तरीके एक्सपर्ट्स की मदद से बता रही हैं प्रियंका सिंह : कीर्ति और श्रुति जुड़वां बहनें हैं। दोनों देखने में बिल्कुल एक जैसी हैं, लेकिन जब कीर्ति चलती हैं तो सबकी निगाहें उन पर टिक जाती हैं, जबकि श्रुति लोगों पर खास असर नहीं छोड़ पाती। फर्क सिर्फ दोनों के पॉश्चर का है, जो उनकी पर्सनैलिटी को भी बदलकर रख देता है। कीर्ति का पॉश्चर एकदम सही और सधा हुआ है, जबकि श्रुति झुककर चलती हैं। दरअसल, पॉश्चर हमारी पर्सनैलिटी को तो निखारता ही है, हमें कई बीमारियों से भी दूर रखता है। दिक्कत यह है कि हममें से ज्यादातर पॉश्चर सुधारने के लिए कोई कोशिश नहीं करते। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, बमुश्किल 15-20 फीसदी लोगों का ही पॉश्चर सही होता है। पॉश्चर की अहमियत चलते, उठते, बैठते हुए हमारे शरीर की मुद्रा यानी हाव-भाव पॉश्चर कहलाता है। ऐसा पॉश्चर, जिसमें मसल्स का इस्तेमाल बैलेंस्ड तरीके से हो, सबसे सही माना जाता है। मसलन अगर हम खड़े हैं तो यह जरूरी है कि हमारा सिर, धड़ और टांगे, तीनों एक सीध में एक के ऊपर एक हों। इससे शरीर के किसी भी हिस्से पर ज्यादा दबाव नहीं होगा। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि अगर कुछ ईंटें एक के ऊपर रखी हैं तो उन्हें किसी सहारे की जरूरत नहीं होगी, जबकि अगर वे टेढ़े-मेढ़े ढंग से रखी गई हैं तो उन्हें सहारे की जरूरत पड़ती है। कमर या कंधे झुके हों या हिप्स (नितंब) पीछे को निकलें हों या फिर सीना बहुत ज्यादा आगे को निकला हो, यानी जिस पॉश्चर में मसल्स का सही इस्तेमाल नहीं होता, उसे खराब पॉश्चर कहा जाता है। जब हम शरीर को साइड से देखते हैं तो हमें तीन कर्व नजर आते हैं। पहला गर्दन के पीछे, दूसरा कमर के ऊपरी हिस्से में और तीसरा लोअर बैक में। पहला और तीसरा कर्व उलटे सी (c) की तरह नजर आते हैं, जबकि दूसरा कर्व सीधा सी (c) होता है। दूसरे कर्व में ज्यादा मूवमेंट नहीं होता, इसलिए उसमें दिक्कत भी कम ही आती है, जबकि पहला और तीसरा कर्व सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस/ स्पॉन्डिलोसिस और कमर दर्द की वजह बन सकता है। इसी तरह, हम इंसानों में रीढ़ की हड्डी (स्पाइन) का रोल काफी ज्यादा होता है। मूवमेंट के साथ-साथ वजन उठाने का भी काम करती है हमारी रीढ़। इसी रीढ़ में होते हैं 24 वटिर्ब्रा, जिनके बीच में शॉक ऑब्जर्वर होते हैं, जो डिस्क कहलाते हैं। हमारे शरीर का वजन डिस्क के बीच से जाना चाहिए लेकिन जब यह साइड से जाने लगता है तो दर्द शुरू हो जाता है। लेकिन अगर हम पॉश्चर पर ध्यान दें, तो इस तरह की परेशानियों से काफी हद तक बचा जा सकता है। सही पॉश्चर की खासियत सही पॉश्चर वह है, जिसमें हमारी मसल्स की लंबाई नॉर्मल हो यानी किसी मसल को न तो जबरन खींचा जाए और न ही उसे ढीला छोड़ा जाए। अगर कोई लगातार गर्दन को झुकाकर बैठता है तो गर्दन में दर्द हो सकता है। यहां तक कि कई बार अडेप्टिव शॉर्टनिंग यानी आगे की मसल्स छोटी हो जाती हैं। तब स्ट्रेचिंग कर मसल्स को नॉर्मल किया जाता है। हमारे यहां अक्सर लड़कियां झुककर चलती हैं। वैसे, कई लोग सही पॉश्चर का मतलब मिलिट्री पॉश्चर से लगा लेते हैं, जिसमें कंधों और गर्दन को बहुत ज्यादा पीछे खींचा जाता है। यह सही नहीं है। इसमें रीढ़ की हड्डी के पीछे वाले भागों पर ज्यादा प्रेशर आ जाता है। साइड से देखें तो कान, कंधे, हिप्स और टखने से थोड़ा आगे का हिस्सा अगर एक लाइन में आते हैं तो अच्छा पॉश्चर बनता है। सामने से देखें तो सिर सामने ऊपर की ओर, ठोड़ी फर्श के लेवल में, सीना सामने की ओर, कंधे आराम की मुद्रा में और पेट का निचला हिस्सा सपाट हो तो अच्छा पॉश्चर कहा जाएगा। कैसे-कैसे पॉश्चर स्वे बैक पॉश्चर: पैरों के ऊपर, कमर सीधी होने के बजाय पीछे की ओर झुकी होती है। मिलिट्री पॉश्चर: दोनों कंधे पीछे की तरफ, सीना बाहर निकला हुआ। हाइपर लॉडोर्टिक पॉश्चर: प्रेग्नेंट महिलाओं या बहुत मोटे लोगों का ऐसा पॉश्चर होता है। इसमें तोंद बहुत बड़ी और कमर काफी अंदर की तरफ होती है। काइसोटिक पॉश्चर: इसमें कमर का ऊपरी हिस्सा थोड़ा बाहर (कूबड़) निकल जाता है। टीबी के मरीजों और जवान लड़के व लड़कियों में होता है। स्कोल्योटिक पॉश्चर: वर्टिब्रा सीधी होने के बजाय साइड को मुड़ जाती है। यह पॉश्चर काफी कॉमन होता है। गलत पॉश्चर की वजहें एनकायलोसिस (जोड़ों में जकड़न), स्पॉन्डिलोसिस (गर्दन में दर्द), कमर का टेढ़ापन, रिकेट्स, ऑस्टियोपोरॉसिस या पोलियो जैसी बीमारियां। हड्डियों में पैदाइशी विकार। स्पाइनल कोड में विकार। आनुवांशिक कारण। झुककर चलने की आदत, खासकर लड़कियों में। घंटों एक ही जगह बैठकर कंप्यूटर पर काम करना। डेंटिस्ट, सर्जन आदि का लंबे समय तक झुककर काम करना। उलटे-सीधे तरीके से लेटकर टीवी देखना। कंधे और कान के बीच फोन लगाकर एक ओर सिर झुकाकर लंबी बातें करना। किचन में नीचे स्लैब पर काम करना। प्रेस करते हुए पॉश्चर का ध्यान न रखना। प्रेग्नेंसी में स्पाइन का पीछे जाना, जिसे लॉडोर्स कहते हैं। बढ़ती उम्र के साथ आमतौर पर शरीर कुछ झुक जाता है। आरामतलबी और रिलैक्स के नाम पर गलत पॉश्चर अपनाना। गलत पॉश्चर से नुकसान गर्दन और कमर संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं, मसलन सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस/स्पॉन्डिलोसिस या कमर दर्द आदि। डिस्क प्रोलेप्स या डिस्क से जुड़ी दूसरी बीमारियां हो सकती हैं। जॉइंट्स में टूट-फूट यानी ऑर्थराइटिस हो सकता है। थकने की वजह से मसल्स अपना पूरा काम नहीं कर पाएंगी। मांसपेशियों में गांठें या सूजन आ जाती है। महिलाओं को किचन में काम करने की वजह से कंधों और कमर में दर्द जल्दी हो सकता है। रिपिटेड स्ट्रेस इंजरी हो सकती है, यानी किसी एक ही अंग के ज्यादा इस्तेमाल से उसमें दिक्कत आ सकती है। सही पॉश्चर के फायदे रीढ़ के जोड़ों को एक साथ जोड़े रखनेवाले लिगामेंट्स पर प्रेशर कम होता है। रीढ़ को किसी असामान्य स्थिति में फिक्स होने से बचाता है। मसल्स का सही इस्तेमाल होने से थकान नहीं होगी। कमर दर्द और जोड़ों के दर्द की आशंका कम होती है। देखने में व्यक्ति ज्यादा आकर्षक लगता है। सही पॉश्चर के लिए क्या जरूरी सही पॉश्चर के लिए मसल्स में अच्छी लचक, जोड़ों में सामान्य मोशन, र्नव्स का सही होना, रीढ़ के दोनों तरफ की मसल्स पावर का बैलेंस्ड होना जरूरी है। साथ ही, हमें अपने पॉश्चर की जानकारी भी होनी चाहिए और सही पॉश्चर क्या है, यह भी मालूम होना चाहिए। थोड़ा ध्यान देने और थोड़ी प्रैक्टिस के बाद गलत पॉश्चर को सुधारा जा सकता है। खड़े होने या चलने का सही तरीका सिर सामने ऊपर की ओर, ठोड़ी फर्श के लेवल में, सीना सामने की ओर, कंधे आराम की मुद्रा में और पेट का निचला हिस्सा सपाट हो। सिर या कंधों को पीछे, आगे या साइड में न झुकाएं। कंधे झुकाकर न चलें, न ही शरीर को जबरन तानें। कानों के लोब्स कंधों के मिडल के साथ एक लाइन में आएं। कंधों को पीछे की तरफ रखें, घुटनों को सीधा रखें और बैक को भी सीधा रखें। जमीन पर अपने पंजों को सपाट रखें। पंजे उचकाकर न चलें। एक पैर पर न खड़े हों। खड़े होते हुए दोनों पैरों के बीच में थोड़ा अंतर रखें। इससे पकड़ सही रहती है। चलते हुए पहले एड़ी रखें और फिर पूरा पंजा। पैरों को पटक कर या घुमाकर न चलें। चलते समय बहुत ज्यादा न हिलें। बैठने का सही तरीका सबसे पहले सही कुर्सी का चुनाव करें। यह पॉश्चर के लिए काफी अहम हैं। ऑफिस में कुसीर् को अपने मुताबिक एडजस्ट कर लें। हो सके तो अपने पॉश्चर के अनुसार कुर्सी तैयार कराएं। ध्यान रखें कि कुसीर् की सीट इतनी बड़ी हो कि बैठने के बाद घुटने और सीट के बीच बस तीन-चार इंच की दूरी हो, यानी सीट चौड़ी हो। बैठते हुए पूरी थाइज को सपोर्ट मिलना चाहिए। हैंड रेस्ट एल्बो लेवल पर होना चाहिए। बैक रेस्ट 10 डिग्री पीछे की तरफ झुका हो। कमर को सीधा रखकर और कंधों को पीछे की ओर खींचकर बैठें, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अकड़कर बैठें। कमर को हल्का-सा कर्व देकर बैठें। कुसीर् पर बैठते हुए ध्यान रहे कि कमर सीधी हो, कंधे पीछे को हों और हिप्स कुसीर् की पीठ से सटे हों। बैक के तीनों नॉर्मल कर्व बने रहने चाहिए। एक छोटा तौलिया भी लोअर बैक के पीछे रख सकते हैं या फिर लंबर रोल का इस्तेमाल कर सकते हैं। अपने घुटनों को सही एंगल पर झुकाएं। घुटनों को क्रॉस करके न बैठें। बैठते हुए घुटने या तो हिप्स की सीध में हों या थोड़ा ऊपर हों। पैरों के नीचे छह इंच ऊंचा स्टूल भी रख सकते हैं। बैठकर जब उठें तो कमर को आगे की तरफ झुकाएं, पैरों को पीछे की तरफ लेकर जाएं। ऐसा करने पर पंजे, घुटने और सिर जब एक लाइन में आ जाएं तो उठें। कंप्यूटर पर काम करते हुए कंप्यूटर पर काम करते वक्त कुर्सी की ऊंचाई इतनी रखें कि स्क्रीन पर देखने के लिए झुकना न पड़े और न ही गर्दन को जबरन ऊपर उठाना पड़े। कुहनी और हाथ कुर्सी पर रखें। इससे कंधे रिलैक्स रहेंगे। कुर्सी के पीछे तक बैठें। खुद को ऊपर की तरफ तानें और अपनी कमर के कर्व को जितना मुमकिन हो, उभारें। कुछ सेकंड के लिए रोकें। अब पोजिशन को थोड़ा रिलैक्स करें। यह एक अच्छा सिटिंग पॉश्चर होगा। अपने शरीर का भार दोनों हिप्स पर बराबर बनाए रखें। डेस्कटॉप उस पर काम करनेवाले व्यक्ति के मुताबिक तैयार होना चाहिए। कुसीर् ऐसी हो, जो लोअर बैक को सपोर्ट करे। पैरों के नीचे सपोर्ट के लिए छोटा स्टूल या चौकी रखें। किसी भी पॉजिशन में 30 मिनट से ज्यादा लगातार न बैठें। बैठकर काम करते हुए या पढ़ते हुए हर घंटे के बाद पांच मिनट का ब्रेक लेना चाहिए। दो घंटे के बाद तो जरूर ब्रेक लें। रोजाना गर्दन की एक्सरसाइज करें। ब्यौरा नीचे देखें। घूमने वाली कुर्सी पर बैठे हैं तो कमर को घुमाने की बजाय पूरे शरीर को घुमाएं। ड्राइव करते हुए सही पॉश्चर कमर के नीचे वाले हिस्से में सपोर्ट के लिए एक बैक सपोर्ट (छोटा तौलिया या लंबर रोल) रखें। घुटने हिप्स के बराबर या थोड़े ऊंचे हों। सीट को स्टेयरिंग के पास रखें ताकि बैक के कर्व को सपोर्ट मिल सके। इतना लेग-बूट स्पेस जरूर हो, जिसमें आराम से घुटने मुड़ सकें और पैर पैडल पर आराम से पहुंच सकें। सोने का सही तरीका ऐसी पोजिशन में सोने की कोशिश करें, जिसमें आपकी बैक का नेचरल कर्व बना रहे। पीठ के बल सोएं, तो घुटनों के नीचे पतला तकिया या हल्का तौलिया रख लें। जिनकी कमर में दर्द है, वे जरूर ऐसा करें। घुटनों को हल्का मोड़कर साइड से भी सो सकते हैं लेकिन ध्यान रखें कि घुटने इतने न मोड़ें कि वे सीने से लग जाएं। पेट के बल सोने से बचना चाहिए। इसका असर पाचन पर पड़ता है। साथ ही, कमर में दर्द और अकड़न की आशंका भी बढ़ती है। कमर दर्द है तो पेट के बल बिल्कुल नहीं सोना चाहिए। कभी भी बेड से सीधे न उठें। पहले साइड में करवट लें, फिर बैठें और उसके बाद उठें। गद्दा और तकिया गद्दा सख्त होना चाहिए। कॉयर का गद्दा सबसे अच्छा है। रुई का गद्दा भी इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन ध्यान रहे कि उसमें स्पंज इफेक्ट बचा हो। ऐसा न हो कि वह 10-12 साल पुराना हो और पूरी तरह चपटा हो गया हो। जमीन पर सोने से बचना चाहिए, क्योंकि सपाट और सख्त जमीन पर सोने से रीढ़ के कर्व पर प्रेशर पड़ता है। बहुत ऊंचा तकिया लेने या तकिया बिल्कुल न लेने से पॉश्चर में प्रॉब्लम हो सकती है, खासकर उन लोगों को, जिनकी मसल्स कमजोर हैं। अगर आप सीधा सोते हैं तो बिल्कुल पतला तकिया ले सकते हैं। करवट से सोते हैं तो 2-3 इंच मोटाई का नॉर्मल तकिया लें। तकिया बहुत सॉफ्ट या हार्ड नहीं होना चाहिए। फाइबर या कॉटन, कोई भी तकिया ले सकते हैं। ध्यान रहे कि कॉटन अच्छी तरह से धुना गया हो और उसमें नरमी बाकी हो। तकिया इस तरह लगाएं कि कॉन्टैक्ट स्पेस काफी ज्यादा हो और कंधे व कान के बीच के एरिया को सपोर्ट मिले। कंधों को तकिया के ऊपर नहीं रखना चाहिए। जिनकी गर्दन में दर्द है, उन्हें भी पतला तकिया लगाना चाहिए। एक्सरसाइज और योग कमर की मांसपेशियां कमजोर हों तो पॉश्चर गड़बड़ हो जाता है। ऐसे में हम कमर को झुकाकर चलने लगते हैं। हमें लगता है कि इससे आराम मिल रहा है लेकिन इससे हमारी जीवनी शक्ति और प्राणऊर्जा बाधित हो जाती है यानी हमारी सेहत जितनी बेहतर होनी चाहिए, उतनी नहीं होती। झुककर चलने या बैठने से निराशा भी आती है। ऐसे में ध्यान देकर अपना पॉश्चर सुधारना जरूरी है। इसके लिए नीचे लिखी एक्सरसाइज और आसन फायदेमंद हैं : जो लोग डेस्क जॉब में हैं, उन्हें रस्सी कूदना, सीढि़यां चढ़ना-उतरना, वॉकिंग, जॉगिंग, दौड़ना, स्विमिंग, साइक्लिंग, आदि करना चाहिए। इससे शरीर में लचक बनी रहेगी। ऑफिस में बैठे-बैठे गर्दन और घुटनों की एक्सरसाइज करते रहना चाहिए। रोजाना स्ट्रेचिंग करें। सुबह पूरी बॉडी को स्ट्रेच करें। ध्यान रहे कि मसल्स बहुत ज्यादा न खिंचें। इससे मसल्स में लचीलापन बना रहता है। कमर और पेट को मजबूती देने वाली एक्सरसाइज करें। ताड़ासन, अर्धचक्रासन, कटिचक्रासन, पवनमुक्तासन, भुजंगासन, अर्धनौकासन, मकरासन, बिलावासन, ऊष्ट्रासन, पश्चिमोत्तानासन, वज्रासन आदि करें। ये आसन इसी क्रम से किए जाएं तो ज्यादा फायदा होगा। गर्दन को मजबूत बनानेवाली सूक्ष्म क्रियाएं करें। सिर को पूरा गोल घुमाएं। एक बार राइट से लेफ्ट और फिर लेफ्ट से राइट को गर्दन घुमाएं। गर्दन को ऊपर-नीचे भी करें। कंधों को गोल-गोल घुमाएं। हफ्ते में कम-से-कम चार-पांच दिन 40 मिनट में 4 किमी वॉक करें। ऐसे अपनाएं सही पॉश्चर अपने पॉश्चर पर ध्यान दें। थोड़े दिन गौर करना पड़ेगा। बाद में आपको खुद-ब-खुद सही पॉश्चर की आदत बन जाएगी। जितना ध्यान देंगे, उतना जल्दी पॉश्चर सुधरेगा। जहां-जहां आप जाते हैं, मसलन अपने कमरे में, किचन में, ऑफिस में, टायलेट आदि वहां 'कमर सीधी' या 'बैक स्ट्रेट' लिखकर दीवार पर चिपका लें। जो लोग आगे झुककर चलते हैं, वे वॉक करते हुए, हर 10 मिनट में तीन-चार मिनट के लिए अपने हाथों को पीछे बांध लें। इससे पॉश्चर सीधा होता है। स्कूली बच्चे एक कंधे पर बैग टांगने के बजाय दोनों कंधों पर बदलते रहें। लैपटॉप बैग या पर्स भी बदलते रहें। कोशिश करें कि पिट्ठू बैग लें। कोई भी चीज उठाने के लिए कमर से न झुकें, बल्कि घुटने के बल बैठें और फिर चीज उठाएं। किचन में स्लैब की ऊंचाई इतनी हो कि झुककर काम न करना पड़े। बेड पर लेटकर पढ़ने के बजाय कुर्सी-मेज पर पढ़ें। बेड पर आधे लेटकर टीवी न देखें। सही तरीके से बैठें या थक गए हैं तो पूरा लेटकर टीवी देखें। वजन न बढ़ने दें। जिनकी तोंद है, वे खासतौर पर सावधानी बरतें। पोंछा लगाते हुए और कपड़े प्रेस करते हुए ध्यान रखें और उलटी-सीधी दिशा में झुके नहीं। अगर लंबे वक्त से खड़े हैं तो कुछ-कुछ देर बाद पोजिशन बदलें। वजन एक पैर से दूसरे पैर पर डालें। इससे पैरों को आराम मिलता है। 50-55 साल के बाद महिलाओं की हड्डियां कमजोर हो जाती है। उन्हें रोजाना आधा घंटा सूरज की रोशनी में बैठना चाहिए। इसके अलावा, बोन डेक्सा स्कैन कराकर हड्डियों की सघनता जांच लें। अगर जरूरत पड़े तो डॉक्टर की सलाह से कैल्शियम ले सकती हैं। कैसे पहचानें पॉश्चर बैठने पर: चौकड़ी मारकर बैठ जाएं। दोनों हाथों को घुटनों पर रखें। जब हमारी कलाई (जहां घड़ी बांधते हैं) घुटने के लेवल पर आती है तो पॉश्चर ठीक है। ध्यान रखें कि घुटने सीधे हों। खड़े होने पर: रोजाना एक मिनट तक शीशे के सामने सीधे खड़े हों। ध्यान रखें कि ठोड़ी शरीर से आगे न निकली हो और दोनों कंधे एक लेवल पर हों। पेट भी सीधा-सपाट हो। कमर किसी तरह झुकी न हो। ऐसे सुधारें पॉश्चर जो लोग डेस्क जॉब ज्यादा करते हैं, वे रोजाना सुबह 2-3 मिनट के लिए दीवार के सहारे सटकर खड़े हो जाएं। सिर, दोनों कंधे, हिप्स और एड़ी (एक-आध इंच आगे भी हो, तो चलेगा) दीवार के सहारे लगकर खड़े हो जाएं। रोजाना 2-3 मिनट प्रैक्टिस करने से पॉश्चर ठीक हो सकता है। पॉश्चर का कमाल आप कैसे चलते हैं, कैसे बैठते हैं, ये बातें आपकी पर्सनैलिटी पर असर डालती हैं, यह सभी जानते हैं लेकिन हाल में एक रिसर्च में यह बात और पुख्ता हुई है। इलिनोइस (अमेरिका) में नॉर्थ-वेस्टर्न यूनिवसिर्टी में हुई इस रिसर्च में 76 स्टूडेंट्स में से आधों को हाथ बांधकर, कंधे झुकाकर और पैर मिलाकर बैठने को कहा गया, जबकि बाकी को पैर फैलाकर और हाथ बाहर की ओर खोलकर बैठने को कहा गया। बंधे हुए पॉश्चर में बैठे लोगों ने हर टास्क में कम नंबर पाए, जबकि दूसरों ने अच्छा परफॉर्म किया। यानी रिसर्च साबित करती है कि अच्छा पॉश्चर कॉन्फिडेंस बढ़ाता है।
एक्सपर्ट्स पैनल डॉ. पी. के. दवे, चेयरमैन, रॉकलैंड हॉस्पिटल डॉ. हर्षवर्धन हेगड़े, एचओडी ऑथोर्पेडिक्स, फोर्टिस हॉस्पिटल डॉ. आई. पी. एस. ओबरॉय, ऑथोर्पेडिक सर्जन, आर्मेटीज हेल्थ इंस्टिट्यूट डॉ. राजीव अग्रवाल, इनचार्ज, न्यूरोफिजियोथेरपी यूनिट, एम्स सुरक्षित गोस्वामी, योग गुरु

शनिवार, 15 जनवरी 2011

सख्त नींबू को अगर गरम पानी में कुछ देर के लिए रख दिया जाये तो उसमें से आसानी से अधिक रस निकाला जा सकता है।
महीने में एक बार मिक्सर और ग्राइंडर में नमक डालकर चला दिया जाये तो उसके ब्लेड तेज हो जाते हैं।
नूडल्स उबालने के बाद अगर उसमें ठंडा पानी डाल दिया जाये तो वह आपस में चिपकेंगे नही।
पनीर को ब्लोटिंग पेपर में लपेटकर फ्रिज में रखने से यह अधिक देर तक ताजा रहेगा।
मेथी की कड़वाहट हटाने के लिये थोड़ा सा नमक डालकर उसे थोड़ी देर के लिये अलग रख दें।
एक टीस्पून शक्कर को भूरा होने तक गरम करे। केक के मिश्रण में इस शक्कर को मिला दे। ऐसा करने पर केक का रंग अच्छा आयेगा।
फूलगोभी पकाने पर उसका रंग चला जाता है। ऐसा न हो इसके लिए फूलगोभी की सब्जी में एक टीस्पून दूध अथवा सिरका डाले। आप देखेगी कि फूलगोभी का वास्तविक रंग बरकरार है।
आलू के पराठे बनाते समय आलू के मिश्रण में थोड़ी सी कसूरी मेथी डालना न भूले। पराठे इतने स्वादिष्ट होंगे कि हर कोई ज्यादा खाना चाहेगा।
आटा गूंधते समय पानी के साथ थोड़ा सा दूध मिलाये। इससे रोटी और पराठे का स्वाद बदल जाएगा।
दाल पकाते समय एक चुटकी पिसी हल्दी और मूंगफली के तेल की कुछ बूंदे डाले। इससे दाल जल्दी पक जायेगी और उसका स्वाद भी बेहतर होगा।
बादाम को अगर 15-20 मिनट के लिए गरम पानी में भिगो दें तो उसका छिलका आसानी से उतर जायेगा।
चीनी के डिब्बे में 5-6 लौंग डाल दी जाये तो उसमें चींटिया नही आयेगी।
बिस्कुट के डिब्बे में नीचे ब्लोटिंग पेपर बिछाकर अगर बिस्कुट रखे जाये तो वह जल्दी खराब नही होंगे।
कटे हुए सेब पर नींबू का रस लगाने से सेब काला नही पड़ेगा।
जली हुए त्वचा पर मैश किया हुआ केला लगाने से ठंडक मिलती है।
मिर्च के डिब्बे में थोड़ी सी हींग डालने से मिर्च लम्बे समय तक खराब नही होती।
किचन के कोनो में बोरिक पाउडर छिड़कने से कॉकरोच नही आयेंगे।
लहसुन के छिलके को हल्का सा गरम करने से वो आसानी से उतर जाते हैं।
हरी मिर्च के डंठल को तोड़कर मिर्च को अगर फ्रिज में रखा जाये तो मिर्च जल्दी खराब नही होती।
हरी मटर को अधिक समय तक ताजा रखने के लिए प्लास्टिक की थैली में डालकर फ्रिजर में रख दें।

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

आत्मज्ञानी कौन

धर्मशास्त्र कहते हैं कि आत्मज्ञानीवह है, जो सभी विकारों से मुक्त होता है। हमारे अंदर विकार होने से हमें आत्मज्ञान कदापि नहीं प्राप्त हो सकता। इस संदर्भ में एक कथा है-

एक बार महर्षि वेदव्यासऔर उनके पुत्र शुकदेववन जा रहे थे। एक सरोवर में कुछ देवकन्याएं स्नान कर रही थीं। आगे-आगे शुकदेवऔर पीछे-पीछे महर्षि वेदव्यास।शुकदेवजब उधर से गुजर रहे थे, तो देवकन्याएं पूर्ववत नहाती रहीं। उन्होंने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया। जब महर्षि गुजरने लगे, तो वे शर्मा गईं और कपडों से बदन ढंक लिया। यह देखकर महर्षि ने आश्चर्य प्रकट करते हुए उन लोगों से पूछा, अभी कुछ पल पहले मेरा पुत्र वहां से गुजर रहा था, तो तुम लोगों ने उसकी तरफ ध्यान भी नहीं दिया। मैं तो वृद्ध हो चुका हूं, तब भी मुझे देखकर इस तरह शर्मा रही हो? देवकन्याएं बोलीं, शुकदेवकी दृष्टि आत्मस्थहै। उन्हें संपूर्ण जगत में केवल आत्मतत्व ही दिखाई देता है। इसलिए उन्हें देखकर हमें लज्जा का भाव पैदा नहीं हुआ। महर्षि आप महाज्ञानीहैं, लेकिन आपकी दृष्टि में सारा संसार बसा हुआ है, इसलिए आपको देखकर हममें लज्जा का भाव पैदा हो गया। महर्षि भी समझ गए कि उनका पुत्र शुकदेवकोई साधारण साधक नहीं है, बल्कि एक उच्च कोटि का ब्रह्मज्ञानीहै। ऐसे ब्रह्मज्ञानीके लिए संसार में कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता है। भगवान श्रीकृष्ण भी गीता में कहते हैं- जो मनुष्य सारी इच्छाओं को त्याग देता है और लालसा रहित होकर कार्य करता है, उसे ही शांति मिलती है। ऐसे साधक प्रवृति के लोग ही आत्मज्ञानीया ब्रह्मज्ञानीकहे जाते हैं।

बौद्ध दर्शन में कहा गया है- ब्रह्मत्वको प्राप्त करना ही पूर्णता है। यह तभी संभव है, जब मनुष्य सारे विकारों से छूट जाता है। गीता में इसी को स्थितिप्रज्ञ कहा गया है। जब तक हम विकार से रहित नहीं होते हैं, तब तक संासारिकताके चक्रव्यूह में फंसे रहते हैं। हमें न तो आत्मज्ञान हो पाता है और न ही मनुष्य जन्म के मूल लक्ष्य की ही तरफ आगे बढ पाते हैं। ऐसा नहीं है कि गृहस्थ जीवन में रहकर या गृहस्थ जीवन से छूटकर ही आत्मज्ञान मिलता है। राजा जनक गृहस्थ जीवन बिताने के बावजूद आत्मज्ञानीथे। उन्हें ब्रह्मत्वप्राप्त हो गया था। इसके उलट करोडों लोग गृहस्थ जीवन त्याग कर भी आत्मज्ञानीनहीं हो सके। मतलब हमारी साधना पर निर्भर करता है कि हम लक्ष्य प्राप्त कर पाते हैं कि नहीं। संत तुलसीदास कहते हैं कि आत्मज्ञान के लिए प्रभु की कृपा और पुरुषार्थ दोनों आवश्यक है। जप, तप, ज्ञान, उपासना, स्तुति और सच्ची भक्ति से ही मन से विकार दूर हटते हैं और सद्भाव जाग्रत होते हैं।

सोमवार, 10 जनवरी 2011

नैनो परिवार, व्यस्त लाइफस्टाइल और बिजी कपल्स, तन्हा न रह जाए बच्चा

अतिदीप सेंवथ में पढ़ने वाला बच्चा, छुट्टी उसे खराब लगती है क्योंकि इस दिन स्कूल नहीं होता, दोस्त नहीं मिलते और दिन नहीं कटता। दिन भर कंप्यूटर या टीवी ही एकमात्र सहारा था समय गुजारने का। मां सात बजे ऑफिस से आतीं, पापा नौ बजे। बड़ी बहन थी, पर वह अपनी दुनिया में व्यस्त रहती। उसकी बातें उसकी समझ से दूर थीं। इंजीनियरिंग के फाइनल इयर की स्टूडेंट होने के कारण उसे समय था भी नहीं।
दादी थी नहीं, नानी दूसरे शहर में थी। चाची से मां की बनती नहीं और मौसी का घर दूर होने के कारण आए दिन वहां जाना संभव नहीं था। बेचारा मन मसोस कर रह जाता। उसे चार साल की नन्ही उम्र से पता था कि उसे बाहर नहीं निकलना, किसी के लिए दरवाजा नहीं खोलना और किसी पर भरोसा भी नहीं करना। एकाएक ही वह बचपना छोड़ मेच्योर हो गया। सवाल इस बात का नहीं कि वह अकेलापन महसूस करता है बल्कि मुश्किल यह है कि उसके जैसे बच्चों की संख्या अनगिनत है। रिश्तों की अहमियत से आज का बच्चा अनजान है। पहले परिवार संयुक्त होते थे। स्त्रियां भी कमकाजी नहीं थीं, जो थीं उनके बच्चे परिवारजनों के सुरक्षात्मक माहौल में आसानी से पल जाते थे। चाचा-बुआ के बच्चों का फर्क को कभी इन्होंने जाना नहीं। सबको एक सा खाना-पीना मिलता और एक साथ चहकना व खेलना। वे सुहाने दिन, छोटी-छोटी बातों पर झगड़ना और फिर झट से मान जाना। ये रिश्ते की मीठी यादें ही ताजिंदगी नहीं भूलतीं और आपसी प्यार को बनाए रखती हैं।
रीमा की मां ने दूसरे बच्चे को जन्म देने के बारे में कभी गलती से भी नहीं सोचा क्योंकि इसके जन्म के समय में ही उसे कम मुश्किलें नहीं झेलनी पड़ी थीं। एक साल के लिए नौकरी से लम्बी छुट्टी साथ ही कभी किसी रिश्तेदार को बुलाओ तो कभी दूसरे के नखरे उठाओ। ऐसे में दूसरे के बारे में सोचना भी असंभव था। आज वही रीमा अलग-थलग अपने में चुपचाप रहती है। स्कूल में भी उसकी दोस्ती किसी से नहीं। मनोचिकित्सक का कहना है कि बचपन में हुई परवरिश का असर सारी जिंदगी दिमाग पर हावी रहता है। इसीलिए संसार भर में संबंधों की अनिवार्यता को लेकर तमाम तरह से बल दिया जाता है। यहां तक कि पश्चिमी संस्कृति में, जहां रिश्तों की कद्र नहीं थी, अब अहमियत को समझा जा रहा है। मां-बाप सारी जिंदगी किसी के नहीं रहते, इसलिए परिवार अकेले बच्चे से नहीं बनेगा। हो सकता है कि वह इंडिपेंडेंट ज्यादा बने लेकिन अकेलापन तो दूर नहीं कर पाएगा।
आज जरूरत है इसी स्नेह और मिठास को बनाए रखने की। समय के साथ जरूरतें भले ही कितनी भी बदल जाएं, रिश्ते हमेशा जिंदा रहते हैं। वक्त-जरूरत पर ये ही अपने काम आते हैं। जिंदगी को मुकम्मल बनाने के लिए अपनों का साथ जरूरी है। अब वक्त आ गया है जब हमें अपने बच्चों को रिश्तों को निभाना ही नहीं, जीना भी सीखाना पड़ेगा, चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े।
रिश्तों की बेहतरी के लिए पेरेंट्स क्या करें
बच्चों की परवरिश में क्वालिटी टाइम लगाएं व बच्चे का दृष्टिकोण व्यापक करें, उसे रिश्तों की अहमियत समझाएं। याद रखें कि घरेलू रिश्ते मधुर होने पर ही सामाजिक जीवन बेहतर बनता है।
बहुत मजबूरी न हो तो परिवार को अति सीमित न रखें। बच्चों को बड़ों के प्रति संवेदनशील व उदार बनाने में सहयोग दें।बच्चों को बाहर ले जाएं या गेट टु गेदर करें जिससे वे सोशल बनें और मिलना-जुलना सीखें।अपने बच्चों के साथ कम्युनिकेशन बनाए रखें जिससे वह आपसे हर बात शेयर कर सकें।बच्चे को जिम्मेदार बनाने का मतलब यह नहीं कि उसमें शेयरिंग की भावना न हो। उसे मिल-बांट कर रहना सिखाएं।बच्चे के दोस्तों को समझों जिससे उसके माहौल के सही या गलत होने की जानकारी आपको रहे। इमोशनल बांडिंग को बनाने और मजबूत करने में सहयोग दें।हमेशा याद रखें कि बच्चा कहीं न कहीं आपका ही अनुसरण कर रहा होता है, इसलिए अपने व्यवहार को सयंमित रखें।छोटी-छोटी खुशियों में परिवार के साथ एंजॉय करना सीखें और सिखाएं।परिवार भले ही सीमित हुए हों लेकिन मॉडर्न टेक्नोलॉजी ने दूर से रिश्तों को निभाना भी आसान किया है। इसका फायदा लेना सिखाएं।

बुधवार, 24 नवंबर 2010

अपने लिए खींचें 'लक्ष्मण रेखा'
घर के चारों तरफ की चारदीवारी हमारी चीजों को सुरक्षित रखती है और हमें अपने पसंदीदा वातावरण में काम करने का उपयुक्त माहौल प्रदान करती है। उसी प्रकार अच्छी व्यक्तिगत सीमाएं हमें दूसरों के सामने अपमानित होने से बचाती हैं। यह इस बात की जानकारी भी देती है कि आप उनके साथ संबंधों में कहां खड़े हैं।
यह इस बात की ओर भी इशारा करती है कि आप किन बातों का समर्थन करते हैं और किन बातों का नहीं। यह हमें दूसरों के कृत्यों एवं शब्दों से भी दुखी होने से बचाती है। यह दूसरों को उस बात से भी अवगत कराना है कि आप क्या चाहते हैं और क्या नहीं चाहते। ये सीमाएं हमें एक-दूसरे से अलग करती हैं।
सीमाएं सदा अच्छे और ऊंचे दीवारों के रूप में ही नहीं होती हैं। भौतिक के अलावा ये भावनात्मक भी होती हैं, जैसे कि हम सभी के अंदर किसी खास स्थिति में खास भावनाएं एवं प्रतिक्रियाएं होती हैं।
किसी भी स्थिति में जो व्यक्ति हमारे संपर्क में आते हैं, उनके प्रति हमारा रवैया हमारी सोच, पृष्ठभूमि, पूर्व की घटनाओं एवं समाधानों तथा हमारी चित्रों एवं मान्यताओं पर आधारित होता है। ऐसा संभव है कि अन्य भी जो कि आप की तरह की ही सोच रखते हैं, मोटे तौर पर आप जैसा भी प्रतिक्रिया व्यक्त करें, लेकिन कोई भी बिल्कुल वैसी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करेंगे, जैसा कि आप दूसरे से कर सकते हैं। इसका स्पष्ट आधार है कि हर व्यक्ति एक-दूसरे से भिन्न है।
अधिकतर स्थितियों में प्रतिक्रियाएं भावनात्मक होती हैं। किसी सहकर्मी मित्र या बिल्कुल अपरिचित का कोई वक्तव्य आपको निराशकर सकता है। बच्चों की तरह हम ज्यादा भावुक होते हैं और भावनात्मक रूप से ब्लैक मेल हो जाते हैं। कोई किसी बच्चों पर जो कि चश्मा पहनता है, तीखी टिप्पणी कर सकता है। वह बच्चा शायद इस पर प्रतिक्रिया न दे पाए, परंतु एक आत्मविश्वासी वयस्क यह जरूर कह सकता है कि आपका इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि वह क्या पहनता है या फिर उसे व्यक्ति की संगति से ही अलग कर दे। वह यह भी जवाब दे सकता है कि किसी को भी यह अधिकार नहीं कि वह किसी की कार्यशीलता या उसकी सुंदरता पर टीका-टिप्पणी करे।
अन्य प्रकार के भावनात्मक अवरोधों में आपकी इच्छा के विरुद्ध कार्य करना पार्टी व कार्यक्रमों में शामिल होना, जिसमें आपकी कोई रुचि नहीं है, आपको दु:खी करती है। एक अन्य प्रकार की स्थिति भी शैक्षणिक परिसरों में अक्सर देखा जाता है कि कोई पैसा ले लिया है और न तो लौटाता है, न ही कर्ज देने वाले से बात करता है।
जीवन के हर क्षेत्र में चाहे वह आपका परिवार हो या फिर कार्यस्थल, आपको अपनी सीमाएं तय करनी चाहिए। ऐसे लोग हो सकते हैं जो गुस्सैल और आक्रामक हों। आपको यह तय करना होगा कि आपके लिए क्या अमान्य है। आपको न केवल आचार विचार एवं व्यवहार संबंधी सीमाएं तय करनी चाहिए, बल्कि इसके उल्लंघन पर शांत नहीं रहना चाहिए।
आपकी अपनी खुशियों के लिए जरूरी है कि आप दूसरों की इच्छाओं के लिए अपनी भावनाओं का गला न घोटें। यदि आप ऐसा करते हैं तो आप एक गलत संदेश देंगे कि गलत आचरण भी आपको स्वीकार्य है। यह आपके लिए ज्यादा कष्टदायक होगा, बजाय इसके कि यदि आप दूसरों को इस बात की छूट देते हैं कि वे आपके समय ऐसा-वैसा व्यवहार कर सके तो वह न तो इस बात को समझेगा न ही सीखेगा कि ऐसा बर्ताव आपको नापसंद है और वह बेइज्जती करके यूं ही चला जाएगा। ऐसे में सीमांकन दोनों ही पक्षों के लिए उचित है।
आपको सदैव इस बात के प्रति सजग रहना होगा कि किस प्रकार का व्यवहार या आचरण आपके लिए हानिकर है। आप महसूस करेंगे कि लोग आसानी से अपकी आवश्यकताओं को समझ जाएंगे और उसका ध्यान रखेंगे। यदि फिर भी कोई आपसे अभद्र व्यवहार करता है तो बिना किसी झिझक आपको उसे स्पष्ट करना चाहिए कि ऐसा व्यवहार वह बंद करे।
ऐसी सीमाओं के निर्धारण से पूर्व उस बात को स्पष्ट रूप से बंद करें। ऐसी सीमाओं के निर्धारण से पूर्व उस बात को स्पष्ट तौर पर समझ लें कि किस प्रकार का व्यवहार आपको पसंद है और किस प्रकार का नापसंद है। रिश्तों में आप क्या चाहते हैं और आपके इर्द-गिर्द के लोग आपसे कैसा व्यवहार करें। यह आप पर निर्भर करता है कि आप ऐसे लोगों से संबंध न रखें या फिर उसे न्यूनतम स्तर तक ले जाएं, यदि यह संपर्क आवश्यक हो क्योंकि आप एक ही संस्था में काम करते हैं। आप आश्चर्यचकित हो जाएंगे कि ज्यादातर लोग आपके अनुसार आपसे व्यवहार करेंगे।
(लेखक सीबीआई के पूर्व निदेशक हैं। डायमंड बुक्स प्रा.लि. से प्रकाशित उनकी पुस्तक 'सफलता का जादू' से साभार)

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

उत्तर : रिलीजन एक इटालियन शब्द है, जिसका अर्थ है वह चीज जो हमें प्रभु के साथ जोड़े। धर्म के दो पहलू हैं -एक बाहरी और एक अंदरूनी। अंदरूनी पहलू, रूहानी पहलू है। यह अध्यात्म है। अंदरूनी लक्ष्य सबका एक ही है -कि कैसे हम परमेश्वर से मिलें। और जो बाहरी पहलू है जिसमें हम कर्मकांड करते हैं -वो सबका अलग-अलग है। लोग इसे ही धर्म या संप्रदाय कहते हैं। मूल रूप से धर्म और अध्यात्म दोनों जुड़े हुए हैं। लेकिन हम लोग अक्सर सिर्फ बाहर की चीजों में उलझ कर रह जाते हैं, अंदर क्या है उसको भूल जाते हैं। और इससे कई कर्म कांड शुरू हो जाते हैं। एक कहानी सुनाता हूं। एक स्वामी जी थे, जो एक धर्म स्थान के पास सत्संग किया करते थे। जब सत्संग किया करते थे तो एक बिल्ली वहां आकर शोर मचाती थी। स्वामी जी ने सब सेवादारों से कहा कि बिल्ली को दूर बांधकर आया करो, तो उन्होंने बिल्ली को दूर बांधना शुरू कर दिया, ताकि सत्संग के वक्त शोर न हो। जैसे समय गुजरा उन स्वामी जी मृत्यु हो गई। एक नए स्वामी जी आ गए, वे भी पहले वाले स्वामी जी की ही तरह पूजा-पाठ और सत्संग करने लगे। कुछ समय बाद पुराने वाले सेवादारों की भी मृत्यु हो गई। तो अब नए सेवादार आ गए। इसके कुछ समय बाद बिल्ली की भी मौत हो गई। तब उन्होंने नई बिल्ली लाकर बांधनी शुरू कर दी। क्योंकि उन्हें लगा कि इतने समय से बिल्ली बांधी जाती थी। जरूर इसका कोई धार्मिक महात्म्य होगा। जब तक बिल्ली नहीं बंधेगी, तब तक भला सत्संग कैसे शुरू होगा। तो कर्म कांड ऐसे ही बनते हैं। हम भूल जाते हैं कि कारण क्या था, आंख पर पट्टी बांधकर हम उन्हें करते रहते हैं। हमें जानना चाहिए कि उसके पीछे उद्देश्य क्या है। अध्यात्म अनुकरण नहीं है, वो धर्म या विश्वास को अनुभव करना है। यह नहीं कि आंखें बंद करके किए जाओ। लेकिन हम सोचते हैं कि हमने अगरबत्ती जला दी, घंटी बजा दी, और काम हो गया। जब सभी धर्म एक ही बात कहते हैं, तो विभिन्न धर्मों के बीच इतनी लड़ाई क्यों होती है? हम विभिन्नता से इतने भयभीत क्यों रहते हैं? क्योंकि हम सिर्फ अपनी समझ और अपने विचारों को ही ठीक मानते हैं। हम सोचते हैं कि जो कुछ हमने सोच लिया , जो हमने कह दिया या कर दिया वही ठीक है , बाकी सब गलत हैं। अलग - अलग संस्कृतियां हैं , अलग - अलग तरीके हैं , अलग - अलग सोच है। हम ये समझ नहीं पाते कि अपने आराध्य की पूजा कई तरीकों से की जा सकती है। इसीलिए जब शांत अवस्था में बैठेंगे , अंतर में प्रभु के साथ जुड़ेंगें तो हमें यह विश्वास हो जाएगा कि सब एक हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारी चमड़ी का रंग क्या है , कि हम पढे़ - लिखे कितने हैं , या हमारे पास कितना पैसा है। या हम इधर मुंह कर के प्रार्थना करते हैं या उधर मुंह कर के। दूसरों के बारे अज्ञानता अथवा उन्हें पूरी तरह न समझ पाने के कारण कई मुश्किलें पैदा होती हैं। इसलिए सबसे जरूरी है कि हम कुछ समय दूसरों को जानने - समझने के लिए दें। अगर हम समय निकालेंगे , समझने की कोशिश करेंगे तो पाएंगे कि सभी धर्मों की बुनियाद तो एक ही है। और जब एक बार इंसान को अनुभव हो जाए तो फिर उसकी तरफ से सबकी ओर सिर्फ प्यार ही जाता है , खिंचाव नहीं। संत राजेंदर सिंह जी महाराज

सोमवार, 22 नवंबर 2010

बच्चों की पढाई को लेकर माँ कितना तनाव ले, कितना नहीं

बच्चे की शिक्षा किसी भी परिवार का महत्वपूर्ण कर्तव्य होता है. बच्चे पूरे साल पढाई में नियमित रहें, साथ ही तनावमुक्त होकर परीक्षा दे सकें, इसकी जिम्मेदारी माँ पर होती है, लेकिन क्या अधिकतर परिवारों में ऐसा हो पाता है? क्या माताएं सामान्य रह पाती हैं? और क्या बच्चा बिना किसी तनाव में आये परीक्षा दे पाता है? अधिकतर का उत्तर शायद ना में होगा. दरअसल कई बार परीक्षाओं का हौव्वा हमारा स्वयं द्वारा बनाया हुआ होता है, जिसका बच्चे और परिवार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.

अपराजिता और उसकी बहन टापर रह चुकी हैं. उनकी माँ से जब बच्चों की कामयाबी का राज पूछा, तो वे हंस कर बोलीं, 'ऐसा कुछ खास तो नहीं किया, हाँ जब भी लगता था कि वे पढाई से दिल चुराने की कोशिश कर रही हैं, तो मैं कहती, चलो मेरे साथ घर का कम करवाओ. बस वे कम से बचने के लिए पढने बैठ जाती थीं. एक तरह से मैं भी यही चाहती थी कि वे घर का कम न करके अपनी पढाई पूरी कर लें. हो सकता है उनके जरिये मैं अपने सपने पूरे करना चाहती थी. हाँ, उनका जब खुद का मन होता था, तो वे घर के कामों में मेरा हाथ बटा देती थीं. उनके पिता चूँकि स्वयं विज्ञानी हैं, तो वे बच्चों की पढाई में जरूर मदद करते थे. यूँ मानिये कि उनकी पढाई में हम सभी का यह साझा प्रयास था - हमारी कभी तू-तू मैं-मैं नहीं हुई.

ऐश का मामला तो इससे एकदम उल्टा था. उसकी मम्मी करुणा तो रात-दिन ऐश के पीछे पड़ी रहती थी - चलो पढने का समय हो गया है. क्या बात है कल पेपर है और आज तुम अपनी सहेली से गप्पे लड़ा रही हो; ऐसे खाली कैसी बैठी हो. मैंने तुम्हारे चक्कर में खाना तक नहीं बनाया है, मैगी खा लेंगें और सब एक गिलास ढूध पीकर सो जायगें . खबरदार जो तुम बारह बजे से पहले सोई. अब आप स्वयं ही सोच सकते हैं कि ऐसे में ऐश की क्या हालत होती होगी.

बच्चों का यदि साल भर ध्यान रखा जय, तो जाहिर है कि परीक्षा के समय उन पर किसी किस्म का तनाव नहीं रहेगा. माँ को चाहिए कि वह आरम्भ से ही बच्चे में अनुशाशन, अध्धयन, शारीरिक व्यायाम, नियमित और संतुलित आहार की आदत डाले. अभिभावकों को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि परीक्षा देना बच्चों का काम है, उन्हें सिर्फ उनके (बच्चों के) काम में मदद करनी है. इसके विपरीत माता-पिता परीक्षाओं को इस तरह अपने सर पर ओढ़ लेते हैं जैसे की परीक्षा उन्हें देनी हो. माता-पिता की घबराहट बच्चा या तो घबरा जाता है या फिर लापरवाह हो जाता है. बेहतर हो कि माता-पिता बच्चे के तनाव को कम करने का प्रयास करें और उस पर जबरन अच्छे अंक या अच्चा नतीजा लाने का दबाव न डालें. यह दबाव तो स्कूल और साथियों के कारण उस पर पहले से ही है. अभिभावक को तो इस दबाव को कम करने की जरूरत है.



अभिभावकों का कर्तव्य
अपने बच्चे की तुलना किसी अन्य बच्चे से कतई न करें. इससे बच्चे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है
बच्चा चाहे कितने भी अंक लाये, उसे आगे बढ़ने को हमेशा प्रोत्साहित करें
अपनी इच्छाएं और अपनी चाहतें बच्चे के सामने कम से कम दर्शायें
अपने बच्चे को मूल्यवान समझें, वह जैसा भी है किसी चमत्कार से कम नहीं hai
अपने बच्चों कि क्षमताओं को समझें
अंको के आधार पर उसकी काबिलियत आंकने का प्रयास न करें
बच्चे अच्छी नींद लें. रात को देर तक पढने के बजाय सुबह जल्दी उठें. अच्छी नींद बहुत जरूरी है. शारीर को आराम चाहिए. बच्चा आठ घंटे कि नींद अवश्य ले.
बच्चों को संतुलित आहार दें और फास्ट फ़ूड से दूर रखें.
घर का माहौल सहज रखें. बच्चे से मित्रवत व्यवहार रखें.
लगातार पढने के लिए बच्चे पर दबाव न डालें.
बच्चा जिस समय पढने में सहूलियत महसूस करे, उसी समय उसे पढने दें. हर समय पढो-पढो की रट न लगाये रखें.
बच्चा जो भी परीक्षा देकर आये, उसके बजे में अधिक सवाल-जवाब करने से बेहतर है कि उसे अगले विषय के बारे में सोचने दें. जो कर दिया सो कर दिया, उसे आगे की सोचने दें.
जरूरी नहीं की उसके साथ पढाई के समय सर पर सवार होकर बैठा जय. उसे इत्मिनान से पढने दीजिये. उसे इस बात का एहसास ही काफी है कि आप उसके इर्द-गिर्द ही हैं और जरूरत के समय उपलब्ध हैं.
प्रयास करें कि इन दिनों आप बच्चे कि पसंद का खाना बनाएं. उसके साथ सैर को जाएँ, उसके मनपसंद खेल और शौक के बारे में उससे बातचीत करें.
परीक्षाओं से भी दो तरह के तनाव होते हैं - तनाव अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी. अच्छा तनाव वह है जिसके द्वारा बच्चा अनुशासन में रहना और आगे बढ़ना सीखता है, लेकिन बुरे तनाव के कारण बच्चे के मन- मस्तिस्क की शांति भंग हो जाती है, जिससे सर-दर्द और बदन दर्द हो जाता है और वह अवसादग्रस्त हो जाता है.
टाइम-टेबल बनाने में बच्चे कि मदद करें. देखें कि कोई विषय छूट न जाय. प्रत्येक घंटे के बाद ब्रेक हो, साथ ही उसे एहसास दें कि परीक्षा कोई जिन्दगी और मौत का सवाल नहीं है. परीक्षा, एक परीक्षा भर है, जिसके लिए उसे अपनी सामर्थ्य के अनुसार बस मेहनत करनी है.
अभिभावक रोज सुबह जल्दी उठें, आँख बंद करके थोडा चिंतन-मनन करें और मन को शांत रखें.
अभिभावक अपना खान-पान सुधारें. दरअसल होता यह है कि अधिकतर हमारा रहन-सहन कुछ ठीक नहीं होता. कई बार हमारे खाने-पीने में, सोने-जागने में और आचार-व्यवहार की आदतें भी सही नहीं होतीं. कई बार हम काफी-चाय अधिक लेने लगते हैं, फास्ट-फ़ूड और कोल्ड-ड्रिंक भी ले लेते हैं जिससे बच्चों पर भी असर पड़ता है और वे भी इन चीजों कई मांग करते हैं और इनके आदी हो जाते हैं.
बच्चों को चाहिए
पढाई के लिए अपना समय स्वयं तय करें, अपना टाइम-टेबल बनाएं और उसके अनुसार पढाई करें. कुछ बच्चे रात को पढना पसंद करते हैं और कुछ दिन में. सुबह का वक्त पढाई के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है क्योंकि उस समय वातावरण में शांति होती है और सोने के बाद शारीरिक थकावट भी नहीं होती और बुद्धि भी तरोताजा होती है. शास्त्र तो यहाँ तक कहते हैं कि सुबह के समय (ब्रह्ममूर्त में) ऋषि-मुनि और देवता गण अपनी- अपनी रश्मियाँ/ किरने बिखेरते हैं और उस समय जो प्राणी जिस भाव से अपनी इच्छा शक्ति को बढ़ाता है उसे वह वस्तु मिल जाती है.
पढाई के बीच में आराम करना भी जरूरी है, क्योंकि एक साथ बैठे-बैठे दिमाग थकने लगता है, जिससे पढ़ाई का लाभ नहीं मिल पाता. अपना खान-पान सही रखें, विशेषतौर पर परीक्षाओं के दिनों में. फल सब्जियों का सेवन अधिक करें. परीक्षा से पहले घबराहट होनी तो स्वाभाविक है, लेकिन इससे भी आप पार पा सकते हैं. पढाई के बीच में थोडा समय निकल कर आप मनन - चिंतन करें और हल्का व्यायाम करें इससे आपका मन-मस्तिस्क शांत रहेगा और दिमाग भी चुस्त रहेगा.
आपको दिन में कम-से-कम आधा घंटा शारीरिक व्यायाम तो अवश्य करना चाहिए. अक्सर होता यह है कि सब कुछ आते हुए भी परीक्षा भवन में आप अक्सर उत्तर भूल जाते हैं. इस समस्या के समाधान के लिए आप परीक्षा से एक रात पहले तनाव मुक्त हों, आराम से महत्वपूर्ण प्रश्नों को दोहराएँ, यह ध्यान रखें कि आप पूरा कोर्स एक रात में नहीं दोहरा सकते. इसलिए पहले से इस प्रकिर्या को प्रारंभ कर दें और हो सके तो महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर किसी नाम या तिथि या अपने जीवन की विभिन्न घटनाओं के साथ लिंक करके 'सेव' करलें जैसे कंप्यूटर में हम विभिन्न फाइलों को अलग-अलग नाम से 'सेव' कर लेते हैं और आवश्यकता के समय उस फाइल को आसानी से ढूंढ लेते हैं.
एग्जामिनेशन पेपर हाथ में आने के बाद एक दम उत्तर लिखना प्रारम्भ न करें. पेपर को ध्यान से पढ़ें. याद रखें, जो तुमने पढ़ा है, वह तुम्हारे दिमाग में कहीं है. बस थोडा जोर डालना है. अगर प्रश्न पत्र में सभी प्रश्न हल करना आवश्यक हैं तो भी और यदि उनमें से कुछ छूट है तो भी पहले वे प्रश्न हल करें जो तुम्हे सबसे अच्छी तरह आते हैं. उसके बाद भी यही क्रम जारी रखें. ऐसा करने से आपकी इच्छा शक्ति को बल मिलेगा और मन को शांति और हो सकता है जब तक आप कम याद वाले प्रश्नों तक पहुचें तब तक उनके बारे में भी आपके मस्तिस्क में आवश्यक जानकारी इकठ्ठी हो जाय. इससे एक लाभ यह होगा कि हो सकता है की एग्जामिनर आपके पहले प्रश्नों के उत्तर से प्रभावित होकर बाद वाले प्रश्नों की मामूली भूलों को नजरंजाज भी कर दे. इसका एक पहलू और भी है कि आप ऐसा करके अपने तनाव को एक सीमा तक दूर कर सकते हैं क्योंकि तनाव के समय जो एड्रेनैनिल नामक हार्मोन उत्पन्न होता है, जिससे दिमाग एकदम खाली-खाली सा महसूस करने लगता है उससे आप बहुत हद तक अपने आपको बचा सकते हैं. इस हार्मोन का असर व्यायाम से भी कम होता है क्योंकि व्यायाम से उर्जा बढती है जो इस हार्मोन के असर को कम कर देती है.

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

घरेलू नुस्खे: चुटकी में हल

घरेलू नुस्खों का प्रयोग करके कई समस्याओं को चुटकी में हल किया जा सकता है।
आज आपको बता रहे हैं कुछ ऐसे ही नुस्खों के बारे में :
नाभि में रोजाना सरसों का तेल लगाने से होंठ नहीं फटते।
प्रतिदिन दिन में एक गिलास गाजर का जूस पीने से शरीर में खून बढता है। साथ ही आंखों की रोशनी बढती है।
तुलसी की चार पांच पत्तियों को सुबह-शाम चबाकर खाने से मुंह की दुर्गध दूर होती है।
शरीर के किसी हिस्से में कांटा चुभने पर उसमें हींग का घोल लगाएं। थोडी देर में कांटा निकल आएगा। पेटदर्द होने पर भूनी हुई सौंफ को चबाएं। दर्द से राहत मिलेगी।
बादाम के तेल के इस्तेमाल से रूसी दूर होती है।
खांसी होने पर तुलसी के रस, शहद और अजवाइन के रस को बराबर मात्रा में लेने पर आराम मिलता है।
रात में नींद न आने पर पैरों में तिल का तेल मलें।
नारियल के तेल में लौंग के तेल की कुछ बूंदे डालकर सिर की मालिश करने से सिरदर्द ठीक हो जाता है।
खाना न पचता हो, तो प्याज के रस में थोडा सा नमक मिलाकर खाएं।
अमरूद के पत्तों का काढा बनाकर कुल्ला करने पर मुंह के छालों और मसूडों के दर्द से आराम मिलता है।

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

लोक और परलोक

संसार में सारे पदों के लिए मारामारी है , पर भगवान के समीप पहुँचाने वाले पदों के लिए कोई भीड़ नहीं है क्योंकि उसमें खुद को मिटाना होता है।

गृहस्थ जीवन ही वैराग्य की पहली पाठशाला है

देव दत्त ईश्वर भक्ति करते थे, पर बात- बात पर पत्नी को धमकी देते थे कि देख ! तू अपने काम में सतर्क नहीं रही या तुमने यह काम नहीं किया तो मैं संत पुनीत के आश्रम में चला जाऊंगा, वैराग्य ले लूँगा। उसकी पत्नी यह सोच - सोच कर दुबली होती चली गई कि कहीं पतिदेव सचमुच ही न चले जाएँ। एक दिन संत पुनीत भ्रमण करते हुए उसके घर आ गए और बोले- "विद्यावती ! तेरा स्वस्थ्य कैसा हो गया, तू कुछ खाती नहीं क्या?" यह सुनकर वह रो पड़ी। संत के कहने पर उसने पति कि बार-बार धमकी कि बात बता दी। संत ने कहा कि जब वह अबकी बार धमकी दे तो उसे मेरे पास भेज देना। मैं उसे ठीक कर दूंगा। अगले दिन भोजन बनाने में कुछ देर हो गई तो देवदत्त ने पुनः धमकी दी। विद्यावती बोली - "कल कि छोडिये, आज ही चले जाइये। मन नहीं लगे तो वापस आ जाइयेगा।

अब तो देवदत्त के अहंकार को दुगनी चोट लग गई। वह तुरंत आश्रम को चला गया। रात में सोने की व्यवस्था हो गई। अगले दिन सन्यास दीक्षा के लिए पुनीत महाराज के पास पहुंचे तो उन्होंने कहा- "कपडे उतर दो और नहा कर आओ।" उधर वे नहाने गए, इधर संत के इशारे पर देवदत्त के सारे कपडे फाड़ दिए। कुछ कडवे फल स्वल्पाहार के लिए रखे। फटे कपडे देख कर देवदत्त बहुत नाराज हुआ और जैसे ही खाना खाने बैठा तो गुस्से के मरे आश्रम के ब्रहम्चारियों को अपशब्द कहने लगा। यह कैसी व्यवस्था है? महर्षि बोले- "वैरागी को पहले संतोषी, धैर्यवान, सहनशील बनना पड़ता है।" देवदत्त बोला -"यह तो मैं घर पर भी कर सकता था। आपके पास तो विशिष्ट साधनाओं के लिए आया था। " महर्षि बोले - "तात! घर लौट कर सदगुणों का अभ्यास करो। विभूतियाँ तो बाद की बातें हैं।" देवदत्त घर लौट आये। पत्नी से क्षमा मांगने लगे। पत्नी ने कहा-"आपका स्वागत है प्रियतम घर में।
यदि हर गृहस्थी यह समझ ले तो सभी ओर शांति की साम्राज्य हो।
अपने अन्दर छुपे हुए सत्य का एक छोटा सा एहसास भी जीवन की साडी अपवित्रता को मिटाने में सक्षम है। आग की एक छोटी सी चिंगारी भी फूस के विशाल भंडार को नष्ट करने की क्षमता रखती है। इसी तरह अपने अन्दर छुपे हुए देवत्व का स्पर्श पाकर पूरे व्यक्तित्व में आग सी लग जाती है। जब उस देवत्व के बारे में सुनकर मन में रस आने लगे तो मानना चाहिए कि हमारे अन्दर रूपांतरण हो रहा है। नर-पशु भी यदि इस ओर ध्यान देने लगे तो वह भी एक दिन देवमानव बन कर रहेगा।

महर्षि शमीक और उनके शिष्यों को कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत के महारण में एक खंडित घड़े के नीचे टिटहरी के कुछ अंडे मिले। शिष्य आश्चर्य चकित थे कि इतने भीषण युद्ध में भी वे अंडे न सिर्फ सुरक्षित थे बल्कि उनमे से कुछ पक्षी भी निकल आये थे। ऋषि ने उन्हें आश्रम ले चलने को कहा क्योंकि अगले दिन फिर युद्ध होना था। शिष्यों ने कहा- "महाराज जब ईश्वर ने इन्हें महासंग्राम में बचाया है तो क्या वह इनकी आगे रक्षा नहीं करेगा?" ऋषि - "वत्स ! जहाँ भगवान का काम समाप्त होता है, वहां मनुष्य का काम आरम्भ होता है। ईश्वर के छोड़े काम को पूरा करना ही मनुष्यता है।

ईश्वर ने जो परिवार या सहयोगी हमें दियें हैं उनकी सहायता करना हमारा धर्म है क्योंकि हम भी किसी न किसी कि सहायता प्राप्त करके ही बड़े हुए हैं ।

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

मैं वह हूं जो आप हैं,


आदि शंकराचार्य शिष्यों के साथ नर्मदा नदी तट पर स्नान के लिए जा रहे थे। शिष्य उनके लिए मार्ग साफ करते चल रहे थे। इस दौरान एक पथिक वहां से गुजरा। शिष्यों ने उससे कहा-मार्ग छोड दें। स्वामी जी यहां से गुजरेंगे। शिष्यों के बार-बार आग्रह करने के बावजूद पथिक रास्ते से नहीं हटा। इतने में आदि शंकराचार्य भी वहां आ गए। उन्होंने उस पथिक से पूछा कि आप कौन हैं? पथिक ने अत्यंत धैर्य से उत्तर दिया-मैं वह हूं, जो आप हैं।

पाथिक के इस कथन को सुनकर शंकराचार्य कुछ क्षण के लिए शांत खडे रहे और फिर झुक कर पथिक के चरणों को स्पर्श कर लिया। उन्होंने कहा-आज आपने मुझे जीवन का वास्तविक ज्ञान दे दिया। मैं आपको अपना गुरु स्वीकार करता हूं।

वहपथिक निम्न कुल का था। शंकराचार्य आजीवन उसे अपना गुरु मानते रहे। पथिक के कथन की उन्होंने दार्शनिक व्याख्या की, जिससे अद्वैत दर्शन का निर्माण हुआ। मानवतावादी चिंतन के लिए अद्वैत दर्शन एक आध्यात्मिक प्रेरणा है। सब एक हैं। कोई दूसरा नहीं है। इसका कारण है सर्वव्यापी ईश्वर और आत्म तत्व का ब्रह्म तत्व का अंश होना।

जबसृष्टि का नियामक एकमेव ब्रह्म है, तो फिर कोई किसी अन्य से पृथक क्यों? सब में वही आत्म तत्व है, जो सभी में है। उपनिषद में ऋषि कहते हैं कि अपने को जान, उसे जान, मुझे जान, और ईश्वर को जान। स्वयं से साक्षात्कार करने की स्थिति व्यक्ति को अमरत्व के दर्शन कराती है। जो आपमें है, उसमें है और हम में भी। छान्दोग्यउपनिषद में ऋषि कहते हैं कि सब कुछ ब्रह्म ही है। मनुष्य उसी से उत्पन्न हुआ है।

तैत्तिरीय उपनिषद में ऋषि ब्रह्म को आनंद का प्रतीक मानते हुए कहते हैं कि जिसने सृष्टि बनाई है, वह सबमेंहै और सब उसमें है। यह विचार भी अद्वैत दर्शन को पुष्ट करते हैं। साथ ही, ब्रह्म में आनंद की उपस्थिति उसके कल्याण रूप का प्रतीक है। ऋषि कहते हैं कि आनंद से ब्रह्म है, आनंद में ही ब्रह्म है, आनंद से ही ब्रह्म जीव पैदा होते हैं, आनंद से ही वे जीवित रहते हैं, आनंद में ही फिर समा जाते हैं।
भारतीय दर्शन में विभेद को मान्यता नहीं दी गई है। समरूपता,समरसता और एकाग्रता आत्मा के लक्षण हैं। उसे स्वीकार करते हुए कहा गया है कि एक ही ईश्वर सब प्राणियों के भीतर विराजमान है। वह सबको गति और ऊर्जा प्रदान करता है। सबके भीतर वही समाया है। वह सभी कर्मो का स्वामी है। वह साक्षी भी है, ज्ञाता भी है और न्यायाधीश भी। ईश्वर निर्गुण और अनंत है।

साधक की इच्छा होती है कि वह जीवन-जगत के रहस्यों को समझें। इसके लिए वह परमपिता परमेश्वर की निकटता चाहता है, क्योंकि उसकी निकटता का अनुभव मात्र ही अनेक रहस्यों को अनावृत्त कर देता है।

इश्वर को जानने से सारे संशय दूर हो जाते हैं और जीव के मोह भाव नष्ट हो जाते हैं। कोई गैर नहीं होता, किसी से बैर नहीं होता। सब अपने होते हैं और व्यक्ति अद्वैत की स्थिति प्राप्त कर लेता है।
स्वामी चक्रपाणि
मैं वह हूं जो आप हें

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

ध्यान करने की सही विधि

ध्यान एक तकनीक है जिसका कि मात्र एक ही तरीका है एवं वह एक वैज्ञानिक तरीका है जो कि बहुत ही यथार्थ एवं स्पष्ट है। यदि आप यह सीखते हैं कि सही तरीके से ध्यान का अभ्यास कैसे किया जाए तो यह आपको शिखर तक पहुंचाने में अधिक समय नहीं लेगा, बशर्ते आप पूर्ण तकनीक से परिचित हों। सबसे पहले अंदर से एक दृढ व ज्वलंत इच्छा का होना जरूरी है। जब आपके पास ध्यान करने की ज्वलंत इच्छा होगी तो यही आपका नेतृत्व करेगी। संकल्पशक्ति की आवश्यकता होती है। आज मैं ध्यान में बैठूंगा। किसी के पास मुझे रोकने की शक्ति नहीं है। विचार मन का उत्पाद है। मैं विचारों से संबंधित नहीं हूं। यदि आप मन की अस्पष्ट बातों से परे जाना सीख लेते हैं एवं चेतना के गहनतम कक्ष तक जा सकते हैं तब शरीर, श्वांस व मन आपके रास्ते में नहीं आते हैं। ये मार्ग में आते हैं क्योंकि आपने इन्हें प्रशिक्षित नहीं किया है, आपने ध्यान करने का निर्णय नहीं लिया है। एक बार व हमेशा के लिए आपको निर्णय लेना सीखना चाहिए और आपको ध्यान के लिए प्रात:काल एवं सोने से पूर्व एक समय निश्चित करना चाहिए।
आपको बाह्य संसार में वस्तुओं को देखने एवं परीक्षण करने के लिए सिखाया गया है। किसी ने आपको अंतर्मन में देखना एवं खोजना नहीं सिखाया है। संसार की कोई वस्तु आपको वह शक्ति प्रदान नहीं कर सकती जो आपको ध्यान प्रदान कर सकता है। यदि आप ध्यान के लिए प्रवृत्त नहीं हैं तो मत कीजिए। यदि ध्यान करना चाहते हैं तो आपको आदत का निर्माण करना होगा, क्योंकि आदतें आपके चरित्र एवं व्यक्तित्व को बुनती हैं। यदि आप वास्तव में जानना चाहते हैं कि आप कौन हैं तो आपको अपने समस्त मुखौटों को उतारना पडेगा। पूर्णरूप से नग्न होना पडेगा। अग्नि में जाना पडेगा। आप इसके लिए तैयार हैं तो ध्यान के मार्ग पर चलना सीख सकते हैं। बाह्य संसार में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जो आपको प्रसन्न कर सके, क्योंकि सभी वस्तुएं परिवर्तन, मृत्यु, क्षय एवं विघटन का विषय हैं। वह जो परिवर्तन का विषय है एवं शाश्वत नहीं है, कभी भी प्रसन्नता नहीं दे सकता है। केवल क्षणिक आनंद दे सकता है। क्षणिक आनंद उदाहरण है कि कहीं कुछ ऐसा है जिसे आनंद कहते हैं। आप गलत स्थान में इसे ढूंढ रहे हैं। यदि आपने शाश्वत आनंद को प्राप्त कर लिया है तो आप स्वतंत्र होंगे। आप उस स्वतंत्रता व उस महान आनंद के लिए जीवित हैं।
मैं आपको सलाह देता हूं कि जब आप ध्यान में बैठते हैं तो विभिन्न प्रकार के प्रकाश को देखने की चिंता न करें। आपको अपने स्थान को पूर्ण अंधकार में बनाना सीखना होगा ताकि आप उस मधुर प्रकाश को देख सकें। यदि आप कोई प्रकाश नहीं देखते या कोई अनुभव नहीं करते अथवा कुछ नहीं देखते तो चिंता मत कीजिए। यदि आपके पास धैर्य है एवं आप स्थिर होकर बैठना सीख जाते हैं, तो जीवन एवं प्रकाश का केंद्र आपके समक्ष स्वयं को प्रकट करना आरंभ कर देगा। तब तक व्यर्थ के प्रकाशों की कल्पना हानिप्रद है। प्रकाश की प्रतीक्षा करते हुए अंधकार में रहना सीखें। ध्यान में किसी प्रकार का अनुभव न होना ही सही अनुभव है। यदि आप ध्यान की विधि का क्त्रमिक रूप से अनुसरण कर रहे हैं तो आपको चिंता करने की जरूरत नहीं पडेगी कि आप उन्नति नहीं कर रहे हैं। जब कभी आप ध्यान कर रहे हैं या ध्यान का प्रयास कर रहे हैं तो आप कुछ न कुछ कर रहे हैं। यह मत सोचिए कि आप अपने कमरें का फल प्राप्त नहीं कर रहे हैं। यह संभव नहीं है।
यदि आप क्त्रमिक रूप से ध्यान करना सीखते हैं तो पाएंगे कि विवेक की शक्ति, बुद्धि आपको जीवन के बाहर एवं भीतर दोनों यात्रा में सहायता करेगी। आपको चार मुख्य बिंदुओं पर ध्यान देना पडेगा दृढ निश्चय का निर्माण करना, प्रार्थना करना सीखना, निर्देशों के अनुसार ध्यान करना सीखना एवं अपने मन को स्वचरित अपराध का धब्बा लगाने की आज्ञा न देना जो कि आंतरिक आध्यात्मिक शक्तियों को नष्ट करती है।
नि:स्वार्थ कर्म को करते हुए दैनिक जीवन में आध्यात्मिक बनना सीखें। प्रतिदिन कुछ मिनटों तक ध्यान करना सीखें। लंबे समय तक बैठकर एवं विभ्रम करते हुए पाखंडी न बनें। कुछ मिनटों तक ध्यान कीजिए एवं जीवन का आनंद लीजिए। ध्यान करना सीखिए एवं यहां और अभी में रहना सीखिए। ध्यान स्वयं का प्रयास है, आंतरिक जीवन का एक निरीक्षण है और यह समय आने पर समस्त रहस्यों को आपके समक्ष प्रकट कर देगा।
आवश्यक है प्रार्थना
अनेक शिक्षार्थी जो ध्यान करते हैं, सोचते हैं कि प्रार्थना आवश्यक नहीं है। क्योंकि वे यह नहीं समझते हैं कि प्रार्थना क्या होती है। आप प्रार्थना क्यों करना चाहते हैं? सुबह से शाम तक प्रार्थना करते रहते हैं, ईश्वर मुझे यह दो, वह दो। आप वास्तव में क्या कर रहे हैं? अपने अहं का पोषण कर रहे होते हैं, जो बुरी आदत है। यह अहं केंद्रित प्रार्थना है। इच्छाओं एवं चाहतों द्वारा डांवाडोल किए जाने से मनुष्य अहं केंद्रित प्रार्थना के शिकार बन चुके हैं जो कि उन्हें वास्तव में भिखारी बनाती है। फिर भी यह प्रार्थना है और इसीलिए कुछ भी न करने से बेहतर है। अपनी भाषा में जीवन के ईश्वर से प्रार्थना कीजिए जो कि आपके अस्तित्व के आंतरिक प्रकोष्ठ में बैठा हुआ है। वह आपको किसी भी अन्य की अपेक्षा बेहतर ढंग से जानता है। वह आपका मार्गदर्शन करता है, आपकी रक्षा करता है एवं आपकी सहायता करता है। शक्ति व बुद्धिमत्ता प्रदान करने के लिए हृदय से जीवन के ईश्वर से प्रार्थना कीजिए, ताकि आप समस्त दृष्टिकोणों से जीवन को समझ सकें।
प्रात: एवं सायंकाल दिन में दो बार प्रार्थना अति आवश्यक है। हमारी सफलता के लिए अतिरिक्त ऊर्जा हेतु प्रार्थना एक निवेदन है। प्रार्थना किसे करनी चाहिए? ईश्वर समस्त शक्तियों का स्त्रोत, केंद्र, प्रकाश का शक्तिशाली घर, जीवन एवं प्रेम है। प्रार्थना द्वारा हम इस शक्तिशाली घर तक पहुंच सकते हैं एवं अपने मन के क्षेत्र एवं चेतना के क्षितिज को विस्तृत करने के लिए ऊर्जा ले सकते हैं। आप उससे प्रार्थना कर रहे हैं जो कि शरीर, श्वांस एवं मन नहीं है किंतु जो इस नश्वर ढांचे के पीछे एवं इससे परे बैठा है, जिसका केंद्र आपके भीतर एवं विस्तार विश्व है। एक ही असीम सत्ता अस्तित्व में है और यही सत्ता आपके भीतर है। कुछ उच्चतर शक्ति जिसे आप ईश्वर कहते हैं, उस तक पहुंचना एवं उसे स्पर्श करना चाहते हैं। अपने मन को एक इच्छा के तहत एक लक्ष्य पर बना लेते हैं जो आपको प्रार्थना के लिए प्रेरित करता है, प्रार्थना के लिए आपकी इच्छा में विलीन मन शांत बन जाता है। जब मन शांत होता है तो वह महान रहस्य स्वयं को प्रकट करता है और तब प्रार्थना का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है। प्रार्थना के कई चरण होते हैं, प्रथम कुछ मंत्रों का उच्चारण करना, फिर मानसिक रूप से इन मंत्रों को स्मरण करना, फिर उत्तर पाने की प्रतीक्षा करना। प्रत्येक प्रार्थना का उत्तर मिलता है। जब आप शरीर को दृढ एवं स्थिर रखते हुए, श्वांस को शांत बनाते हुए तथा मन को उपद्रवों से मुक्त करते हुए ध्यान करते हैं तो यह आपको आंतरिक अनुभव की एक स्थिति तक ले जाएगा। आप किसी उच्चतर को स्पर्श करते हैं एवं ज्ञान को प्राप्त करते हैं जो कि मन से नहीं, बल्कि भीतर की गहराई से आता है।
आपको इस भाव से ध्यान करना चाहिए कि शरीर एक पवित्र मंदिर है एवं अंतर्वासी जीवन का स्वामी ईश्वर है। मन एक साधक है। यह अपने आचरणों, मनोदशाओं एवं हथियारों का समर्पण करना यह कहते हुए सीखता है कि मेरे पास कोई क्षमता नहीं है, मेरी क्षमताएं सीमित हैं। ईश्वर मेरी सहायता करो, मुझे शक्ति दो, ताकि मैं समस्त समस्याओं का साहस के साथ समाधान कर सकूं। मात्र मैं की तरफ झुकाव बनाए बिना मन इस प्रकार से जीवन के स्वामी पर निर्भर हो जाने के लिए एक आदत का निर्माण कर लेता है। मात्र मैं अहं है एवं सत्य मैं अंतर्तम् ईश्वर है। यह अंतर्मुखी प्रक्त्रिया ध्यान एवं प्रार्थना है। अन्य समस्त प्रार्थनाएं तुच्छ इच्छाओं एवं चाहतों से परिपूर्ण, स्वार्थ से पूर्णतया रंगी हुई एवं अहं को ख्ुश करने के लिए होती हैं। किसी भी स्वार्थ के लिए कभी प्रार्थना मत कीजिए। ईश्वर से प्रार्थना कीजिए ताकि आपका मन ऊर्जा ग्रहण करे एवं आपके लिए तथा दूसरों के लिए जो सही है ईश्वर आपको उसे करने के लिए प्रेरित करे। वह जिसे किसी भी अन्य साधन के द्वारा पूर्ण नहीं किया जा सकता है उसे प्रार्थना के द्वारा पूर्ण किया जा सकता है। बाइबिल में एक ख्ूबसूरत पंक्ति है-खटखटाओ और यह आपके लिए खोल दिया जाएगा। यह नहीं लिखा है कि व्यक्ति को कितनी बार खटखटाना है।
प्रार्थना एवं प्रायश्चित महान शुद्धिकर्ता हैं, जो जीवन के मार्ग को विशुद्ध बनाते हैं एवं हमें आत्म-अनुभूति की तरफ ले जाते हैं। बिना प्रायश्चित के प्रार्थना अधिक सहायता नहीं करती है। प्रार्थनाएं सदैव सुनी जाती हैं (इनका उत्तर मिलता है), इसलिए अपने पूरे मन एवं हृदय के साथ प्रार्थना कीजिए। डॉ. स्वामीराम

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

इ कहानी 1352-1448 बिचक अछि जाही में महा कवी विद्यापति के जन्म बिस्फी गाम में भेलानी और ओ मैथिलीक बहुत पैघ कवी भेला जिनका कबी कोकिल के उपाधि देल गेलनी और ओ महादेव के बहुत पैघ भक्त सेहो छलाकवी विद्यापतिक रचना एतेक प्रभाबी होईत छलनी जे जखन ओ आपण रचना के गबैत छला त कैलाश पर बईसल भगबान महादेव प्रशन्न भ जाईत छला और हरदम हुनक रचना सुनबाक इच्छा राखैत छला, ई इच्छा एतेक बड़ी गेलनि जे ओ एक दिन माता पार्वती के कहलखिन " हे देवी सुनु, हम मृत्युलोक जा रहल छी कवी विद्यापतिक रचना हमरा बहुत नीक लागैत अछि और हमर मोन भ रहल अछि जे हम हुनका संगे रही क' हुनक रचना सुनी, त अहां अही ठाम कैलाश में रहू और हम जा रहल छी मृत्युलो" और रचना सुनबाक लेल धरती पर आबी गेला, और विद्यापति के ओतै नौकर बनी क उगना के नाम स काज कर लागला ओ विद्यापतिक चाकरी में लागी गेला ओ हुनकर सब काज करथिन हुनका पूजक लेल फूल और बेलपत्र तोरी क आनैथ बरद के चरबैथ सब चाकरी करैत और राइत में सुत्बा काल में हुनकर पैर सेहो दबबैथ (धन्य ओ विद्यापति जिनक पैर देवक देव महादेव दबबैथ) अहि प्रकारे जखन बहुत दीन बीत गेल, ओम्हर माता पार्बती बहुत चिंतित भ गेली हुनका लगलैन जे आब महादेब मृत्यु लोक स वापस नै एता, और ओ हुनका बापस अनबाक प्रयास में लैग गेली, ओ क्रोध के आदेश देलखिन जे आहा जाऊ और विद्यापतिक पत्नी सुधीरा में प्रवेश क जाऊ जाही स उगना द्वारा कोनो गलत काज भेला पर सुधीरा हुनका मारी क भगा देती, लेकिन माता पार्वती के इ प्रयाश सफल नै भेलैन तखन ओ दोसर प्रयाश केलि ओ प्याश के कबी विद्यापतिक ऊपर तखन सवार क देलखिन जखन ओ एकटा जंगल के रास्ता स उगना संगे राजा शिव शिंह के ओतै जारहल छला ओ घोर जंगल छलाई ओत दूर दूर तक ज'लक कोनो आस नै छलाई और ओही बिच में कवी विद्यापति प्याश स तरपअ लागला "रे उगना जल्दी सँ पाइन ला रउ नै ता हम मइर जेबउ बर जोर स प्यास लागी गेलौ" कहैत जमीन पर ओन्घ्रे लगला, आब उगना की करता ओ परेशान भ गेला एम्हर उम्हर पाइन के तलाश में भट्क' लगला हुनका पाइन नै भेटलैन, तखन ओ एकटा गाछक पाछू में नुका गेला और अपण असली रूप धारण क' अपन जटा सँ गंगाजल निकालला' और फेर उगनाक रूप धारण क विद्यापति के ज'ल देलखिन, विद्यापति जल पिबैते देरी चौक गेला ओ उगना स पूछ' लागला " रे उगना इ त गंगाजल छऊ, बता एता गंगाजल कत स अन्लाए" आब उगना की करता ओ कतबो बहाना बनेला लेकिन हुनकर एको नै चलल, ओ कि करता हुनका विबश भ अपन रूप देखाब' परलानी और ओ अपन असली रूपक दर्शन कवी विद्यापति के देलखिन, विद्यापति महादेवक अशली रूपक दर्शन करिते देरी चकित रही गेला और हुनक चरण पर खसी क हुनका स छमाँ माँग' लागला "प्रभु हमरा छमाँ करू हम अहां के चिन्ह नै सकलौं हमरा स पहुत पैघ अपराध भ गेल" तखन हुनका उठाबैत महादेव कहलखिन "हम आहा संगे एखन और रहब, लेकिन हमर एकता शर्त अछि जे आहा इ बात केकरो स नै कहबनी और जखने आहा इ बात केकरो लंग बाजब ओही छन हम अहाँ लंग स चली जायब" विद्यापति शर्त के मंजूर करैत और दुनु गोटे राजदरबार के तरफ चली गेला, माता पार्बती के इहो प्रयाश सफल नै भेलैन. तखन एक दिन उगन के बेलपत्र लावय में कनिक देरी भ गेलनि ताहि पर सुधीरा एतेक क्रोधित भ गेली कि ओ चुल्हा में जरैत एकटा लकड़ी निकली क हुनका मारबाक लेल उठेल्खिन "सर'धुआ आय तोरा नै छोर्बाऊ तू बड शैतान भ गेला हन हमर बच्चा सब भूख स बिलाय्प रहल अछि और तू एतेक देर स बेलपत्र ल' क' एलै हन" कहैत हुनका दिश बढ़लखिन, तखन विद्यापति स देखल नै गेलन्हि और ओ बजला "हे हे इ की करैत छि इ त साक्छात महादेव छैथ" और एतबे कहिते महादेव गायब भ गेलखिन, फेर विद्यापति हुनका जंगले जंगले तक' लगला और "उगना रे मोर कतै गेला" गबैत रहला लेकिन उगना फेर हुनका नै भेटलखिन, और ओ अपन प्राण तियैग देलखिन I
ओ स्थान जाहि ठाम देवक देव महादेव कवी-कोकिल विद्यापति के अपन अशली रूपक दर्शन देने छलखिन ओही ठाम "बाबा उगना" के मंदिर छैन और ओहिमे शिवलिंग जे छाई से अंकुरित छाई, जेकर कहानी किछु एहन, छाई जे एक बेर गामक एक बुजुर्ग ब्यक्ति के महादेव सपना देलखिन की "हम एकता गाछक जैर में छी" और ओतै बहुत पैघ जंगल छलई तखन गामक लोक सब तैयार भ क ओय ठाम गेला और पहुँच क जखन खुदाई केला त देखलखिन की एकटा बहुत सुन्दर शिवलिंग छाई, सब गेटे बहुत खुश भेला और विचार भेलय की हिनका बस्ती पर ल चलू ओय ठाम मंदिर बना क हिनक स्थापना करब और हुनका उठेबाक लेल जखने हाथ लगेलखिन की ओ फेर स जमीन के भीतर चली गेला, फेर स कोरल गेल और हुनका निकलवाक प्रयाश कैल गेलई, इ प्रयाश दू तीन बेर कैल गेल मुदा सब बेर ओ जमीन के भीतर चली जायत छला, तखन सब गोटे के बुझबा में एलईन जे इ अहि ठाम रहता और अय ठाम स नै जेता, तखन ओही ठाम साफ सफाए कैल गेल और तत्काल मंडप बनैल गेल और बाद में मंदिरक निर्माण सुरु भेल जे १९३२ में जा क तैयार भेल और अहि मंदिरक परिसर में ओ अस्थान सेहो अछि जाहि ठाम महादेव अपना जटा स गंगाजल निकलने छला और आय ओ इनारक रूप में अछि जेकरा "च्न्द्रकुप" के नाम स जानल जैत छाई और एखनो ओकर जल शुद्ध गंगाजल छाई, जे लैब टेस्टेड छाई !
दरभंगा के एकटा बहुत प्रशिद्ध डॉक्टर अपना मेडिकल लैब में एकर टेस्ट केने छलखिन और ओ अय बात के सुचना ग्रामीण सब के देलखिन जे अय में पूरा गंगाजल के तत्व बिद्यमान अछि, और इ दोसर रुपे सेहो टेस्टेड छाई, अय जल के यदि अहां बोतल में राखि देबय ता इ ख़राब नै होइत छाई
इ स्थान मधुबनी जिलाक भवानी पुर गाम में स्थित अछिएत' सब गेटे एकबेर जरुर आबी, एही स्थानक कुनु तरहक जानकारिक लेल अहां हमरा स संपर्क क सकैत छि"जय बाबा उग्रनाथ"
बसंत झा
e-mail- jha.basant@gmail.com
9310350503

बुधवार, 15 सितंबर 2010

UGNA MAHADEV: UGNA MAHADEV TEMPLE,BHAWANIPUR

UGNA MAHADEV: UGNA MAHADEV TEMPLE,BHAWANIPUR: "THIS IS THE HISTORICAL PLACE OF MITHILA, UGNA MAHADEV TEMPLE IS SITUATED IN BHAWANIPUR VILLAGE AT MADHUBANI DISTRICT IN BIHAR STATE OF INDI..."

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

हम किस ओर जा रहे हैं

समाज और सामाजिकता क्या है ये आज तक समझना मुस्किल सा हो रहा है.
जब मै कक्षा नवम में गया तब वह अचानक एक नए बिषय से पला परा और वो था नागरिक शःत्र . यहाँ हमने पाया की मनुष्य एक समाजिक प्राणी है और अब जब की मै मिडिया में कार्यरत हूँ तब यह एह्शाश होता है की पुरे मानव से सामाजिकता का लोप हो गया है.
यहाँ आय दिन होने वाली घटनाओ को देखे तो पता चलेगा की हमारी सामजिकता किस और जा रही है.
सरे पवित्र रिश्ते किस तरह तर तर हो रहे हैं .कही शिक्षक छात्र का अवैध सम्बन्ध दीगर होता है तो कही बाप बेटी को एक हवाश पूर्ति का साधन मात्र समझता है.
संबंधो को अगर छोड़ भी दे तो हैवानियत इस कदर बढती जा रही है की दाहिने हाथ को अपने ही बाये हाथ का भरोषा नहीं रहा.
आज हमारे निर्वाचित उम्मीदवारों के लिए अपनी वेतन की ज्यादा फिकर है अपने निर्वाचन छेत्र की जनता से .
वो जिसके वोट से निर्वाचित होते हैं उन्ही से मिलने के लिए उनको अतिरिक्त राशी चाहिए .
बात अगर यही ख़त्म हो जाती तो मै समझता की चलो सायद उनको अपने जनता की परवाह है लेकिन इसके बाद भी जनता के ये रहनुमा इनके लिए आये बाढ़ और अन्यान्य रहत राशियों का बन्दर बाँट करने से गुरेज नहीं करते है.
मुझे तो लगता हिया की सर्कार द्वारा चलाये जा रहे विभिन्न योजना इनके व्यक्तिगत विकास के लिए ही आता है.
आज के युवा तो एक तरफ राजनीती को गाली देते है लेकिन इसकी गंदगी को दूर करने कोई सामने नहीं आना चाह रहा है .
किन्तु वो भी क्या करे हमारे यहाँ से राजशाही तो समाप्त हो गया लेकिन इसकी जड़े जमींन
में काफी अंदर तक गाड़ी है जिसका समूल नस्ट होता नहीं दिख रहा है.
राजनीती भी वंशवादी परम्परा जैसी दिख रही है.............................................
इन सब बातो को सोचने के बाद मन बेचैन हो उठता है और कोई रास्ता भी नजर नहीं आता.
आखिर ये समझ में नहीं आता की हम किस ओर जा रहे हैं
या तो हम आपनी वजूद को ही भूलते जा रहे हैं नहीं तो सभ्यता की दुहाई देकर पतन के राश्ते में दिनों दी आगे बढ़ते जा रहे हैं.

गुरुवार, 6 मई 2010

हम कौन हैं ?

हम कौन हैं या हम क्या हैं यह जानने के लिए हमें कुछ त्याग करना पड़ेगा और वह त्याग कोई भौतिक त्याग नहीं है अपितु हमें हमारी सांसारिक बुद्धि को स्थिर रखते हुए जो कुछ भी अब तक हमने सीखा है या जाना है उसे भूल कर इस नवीन सन्देश के लिए थोडा सा स्थान बनने देना है. यद्यपि यह प्रश्न हम सब के दिलो दिमाग पर जीवन में अनेक बार उठता है कि हम कौन हैं, कहाँ से आये हैं, क्यों आयें हैं ( हम अपने आप तो आये नहीं हमें तो यहाँ भेजा गया है) लेकिन हम भौतिक जगत की आवस्यकताओं की पूर्ति करने में इतने व्यस्त रहते हैं कि हम अपने अंतर कि इस मौलिक एवं मूलभूत आवाज को अनसुना कर देते है. इसीलिए आपसे कुछ त्याग करने के लिए अनुरोध किया गया है ताकि जो गूढ़ बात अब यहाँ बताई जाने वाली है उस बात का प्रभाव यदि १००% नहीं तो कुछ अंश तक तो अवश्य आपके अन्दर प्रवेश कर सके.

एक शायर ने बहुत ही सटीक कहा है:

पहचान ले खुद को तो इन्सान खुदा है, जाहिर में गो खाक है मगर खाक नहीं है.
जलवों की खता क्या जो दिखाई नहीं देते, खुद देखने वालों की नजर पाक नहीं है.

जब हम इस संसार में सारी उम्र संघर्ष करने के बाद भी अपने आप को पूरी तरह से नहीं जान पाते तब खुदा को पाने या संसार का समस्त ज्ञान पाने का हमारा दावा खोखला ही माना जायगा. अपने आपको या दूसरों को जानने की इच्छा कभी-न-कभी हर इन्सान के मन में आती है; यह बात दूसरी है कि हममें से अधिकतर लोग इस जिज्ञासा का गला ही घोंट देते हैं. वास्तव में यह एक जटिल प्रश्न है और शायद इसीलिए हम इसको हल करना नहीं चाहते. या इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि वर्तमान आधुनिकीकरण एवं अर्थवाद की गला-काट-प्रतिस्पर्धा के चलते ऐसे प्रश्नों को हल करने का कोई लाभ प्रतीत नहीं होता.

हम बाहरी तौर पर जो दिखाई देते हैं या वर्तमान में जो हमारी वाह्य पहचान बन गई है इसे नाकारा नहीं जा सकता परन्तु यही सब कुछ है; ऐसा भी नहीं है. हमारे इस भौतिक शरीर का सम्बन्ध ईश्वर के विराट स्वरूप से है. इस भौतिक शरीर में एक सूक्ष्म शरीर भी है जिसके अन्दर बहुत कुछ छिपा है जैसे- मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, इच्छा, आशा, वासना, काम, क्रोध, लोभ, ईर्षा, द्वेष, घ्रणा, कल्पना, संतोष, सय्यम आदि. इस सूक्ष्म शरीर का सम्बन्ध ईश्वर के अव्याकृत रूप से है.

इसके अतिरिक्त इस शरीर का सम्बन्ध ईश्वर के हिरण्यगर्भ रूप से भी है जिसका प्रतिनिधि हमारी आत्मा है. यहाँ तक का ज्ञान तो आम आदमी पुस्तकों से पढ़ कर अथवा दूसरों से सुनकर प्राप्त कर सकता है यद्यपि ऐसा ज्ञान वाचक ज्ञान कहलाता है और यह हमें अधिक दूर तक नहीं ले जाता; तथापि इस ज्ञान से ही सत्य की खोज की चाह पैदा होती है-इसी में से सत्य जानने का अंकुर पैदा होता है.

इस हर-मंदिर में (गुरु नानक देव जी ने इस शरीर को हर-मंदिर कहा है क्योंकि इसमें हरी निवास करता है/ इस शरीर में ईश्वर रहता है) इन सबका साक्षी भी रहता है जिसे विशुद्ध आत्मा या सुरत कहते हैं जो ईश्वर का ही रूप होता है. इस रूप को ईश्वर का अंश कहना भी गलत होगा क्योंकि अंश का तात्पर्य सामान्य रूप से यह लगाया जाता है कि यह पूर्ण का टुकड़ा है जबकि वह ईश्वर या मालिक तो अविभाज्य है.

इस प्रकार एक अमूर्त भाव को मूर्तरूप में व्यक्त करने का प्रयास किया गया है जिसमे कहने और सुनने या लिखने और पढने वाले के अनुभवज्ञान के स्तर में भिन्नता होने पर अर्थ का अनर्थ होने कि सम्भावना बनी रहती है क्योंकि सामान्य लोग शब्दों का सामान्य अर्थ लगा कर बात को समझने का प्रयास करते हैं और इसी में गलती कर जाते हैं. इसका मूल कारण यह है कि:
यह करनी का भेद है नहीं बुद्धि विचार,
कथनी तज करनी करे तब पावे कुछ सार.

संक्षिप्त में कहने का तात्पर्य यह है कि हम कोई नश्वर शरीर मात्र ही नहीं हैं; न ही हम इस भौतिक संसार में केवल खाने-पीने और मौज उड़ाने आये हैं बल्कि हम तो ईश्वर के अंश हैं और पूर्ण हैं और इस संसार में ईश्वर को ढूंढने आये हैं क्योंकि इस सृष्ठी के आदि में उसने हमें अपने से दूर भेज दिया था और दूर भी इसलिए भेज दिया था ताकि हम उससे दूर होकर उसके विरह में व्यथित हों और उसे पाने का प्रयास करें. और यह प्रयास भी वही हमसे करवाता है; हम अपनी शक्ति के बल पर उसे ढूंढने का प्रयास भी नहीं कर सकते. अपने से दूर भेजने का एक कारण यह भी हो सकता है कि वह ईश्वर हमेशा लीला करता रहता है जैसे बच्चे लुका-छिपी का खेल खेलते हैं और उसी खेल-खेल में उसने हमें अपने से दूर भेज दिया ताकि हम उसे ढूंढे लेकिन हम उसे ढूंढ़ नहीं पाते. इसलिए वह अपने जीवों को निज धाम ले जाने के लिए संतो/सतगुरु के रूप में प्रगट होकर लेने आता है क्योंकि वह हर जीव से बेहद प्यार करता है. परन्तु फिर भी हम इस संसार के मेले में इतने मोहित हो जाते हैं कि हम उसकी बात को ही नहीं सुनते और वह जो शब्द कि नाव लेकर आता है उस पर बैठ नहीं पाते और वह निराश होकर चला जाता है.
मालिक सब का कल्याण करे

बुधवार, 5 मई 2010

शंकर - पार्वती जी के मूर्ति भेटल


लोग कहैत अछि अबक समय में धर्म - कर्म सब धीरे- धीर निप्टल जायत अछि , मुद्दा हम एखनो देखैत छिक गाम - घर में पूजा - पाठ एखनो धरी सर्बोपारित अछि , चाहे रौदिक अकाली होय या बढिक दाहर ओहिमे अपन कर्म पूजा पाठ के चलन जरी राखैत छैथि ,

देखू ने एखनो कलना (हरलाखी , मधुबनी ) नामक गांव गाम में , भिसन गरमी आ सुखार के कारने दामेस्वरी पोखैर के साफ - सुतरा आ खूनेय के कल में सोमदिन भगवान शंकर - पार्वती के आलिंगन मुद्रा में अति प्राचीन आकार्सक मूर्ति भेटल अहि मूर्ति के देखय आ पूजा करैक लेल हजारो के संख्यां में लोगक भीड़ उमैरी गेल ,
मूर्ति देखेक में अति सुन्दर लागैत अछि , प्रतिमा के निचला भाग में बसहा आ पार्वती मूर्ति के निचिका भाग में सिंह क मूर्ति सेहो सामिल अछि , ई पोखैर भिसन गरमी के कारने बिलकू सुखा गेल छल जहि के चलती गाम - घरक लोग सब अहि पोखैर में से मैट कैट के अपन घर अगना के भरैत छल ,
आखिर सत्य अछि ताहि दुवारे धर्म के सर्वब्याप्त रहै के लेल समय -समय पर धर्म के समाबेस होयत रहैत अछि --
अहि दुवारे कहल गेल अछि ---
सतेयन धारिते पृथ्वी सतेयें तपते रवि
सतेयं वती बयुस्यच सर्वम सत्यम परितिठितम

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

गुरू की पहचान भाग-4

गुरु की पहचान

अब एक छोटा सा या मोटा सा प्रश्न कभी-कभी यह उठता है कि गुरु की पहचान कैसे की जाय? यह पता कैसे चले कि कोई व्यक्ति जिसे अन्य लोग गुरु समझते हैं वह गुरु है भी या नहीं इसकी पहचान कैसे हो? कहीं वह धोखेबाज तो नहीं जैसा कि आमतौर पर आजकल देखने-सुनने में आता है. यह संदेह बिलकुल सत्य है क्योंकि यदि किसी व्यक्ति के अन्दर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास नहीं है तो उसे न तो सच्चे संत महात्मा/ सच्चे सदगुरू से कुछ मिल सकता है और न ही ढोंगी बाबा से. इसके विपरीत जिसको जिस पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास है उसे उससे मनोवांछित फल मिलने कि पूरी सम्भावना रहती है. अब इसके साथ ही एक प्रश्न यह भी पैदा होता है कि आप के पास ऐसा कौन सा औजार है, कौन सा बारोमीटर है, कौन सा स्केल या पैमाना है जिससे आप यह अंदाज लगा सकते हैं कि कोई व्यक्ति सच्चा सदगुरू है या पाखंडी है. अगर आप समझते हैं कि आप औरों कि नक़ल करके गुरु कि पहचान कर सकते हैं तो भी आप गलती खा सकते हैं क्योंकि उसने अपने अनुभव या अपनी मान्यता के आधार पर किसी को गुरु माना है जिसकी तुलना आप नहीं कर सकते और यदि आप अपनी बल बुद्धि के आधार पर कोई निर्णय लेते हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप गुरु कि परीक्षा लेने के काबिल हैं अर्थात आप गुरु से ज्यादा समझ रखते हैं . क्योंकि एक एम० ए० के विद्यार्थी कि कापी उससे उच्च ज्ञान रखने वाला ही जाँच सकता है कोई हाई स्कूल पास नहीं.

देखिये आदि संत कबीर साहिब गुरु के बारे में कहते हैं :

गुरु को मानुस जानते, ते नर कहिये अंध
दुखी होएँ संसार में आगे जम का फंद

गुरु किया है देह को सतगुरु चीन्हा नाहीं
कहें कबीर ता दास को तीन ताप भ्रमाहीं

गुरु नाम आदर्श का गुरु है मन का इष्ट
इष्ट आदर्श को ना लाखे समझो उसे कनिष्ट

इससे तो यह स्पष्ट होता है कि गुरु आम आदमी की तरह ही दीखता है, आम आदमी की तरह खाता-पीता है और आम आदमी की तरह ही सब जगत-व्यवहार करता है परन्तु उसमें एक खास बात होती है जो अन्य सामान्य व्यक्तियों में नहीं होती जिसके कारण गुरु अन्य व्यक्तियों से भिन्न होता है और वह खास बात यह है की गुरु के अन्दर परमतत्व पूर्ण रूप से अवतरित हुआ होता है. यूँ तो परमतत्व इस संसार/इस ब्रह्माण्ड और कोटि-कोटि ब्रह्माण्डों के एक-एक अणु और परमाणु में भी मौजूद रहता है क्योंकि सब कुछ उसी से निकला है, उसी में समाया हुआ है और उसी में विलीन हो जायगा फिर भी सभी संत- महात्मा और सभी प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ यही कहते आये हैं कि वह परमतत्व जड़ पदार्थों में सुप्त अवस्था में रहता है, वनस्पतियों में वह अचेतन, पशु -पक्षियों में अर्धचेतन, मनुष्यों में चेतन अवस्था में और संत्सत्गुरु में वह पूर्ण चेतन अवस्था में रहता है और अपने निज स्वरुप में वह चेतनघन अवस्था में रहता है. चूंकि संत्सत्गुरु में वह पूर्ण चेतन अवस्था में रहता है इसलिए संत सत्गुरुवक्त ही उस पूर्ण चेतनता को दूसरे व्यक्तियों में प्रवाहित करने में सक्षम है. इस द्रष्टिकोण से भी यही प्रमाणित होता है कि गुरु मनुष्य रूप में स्वयं परमतत्व ही होता है.

सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति, एश्वर्य और धन -धन्य की पूर्ति तो किसी भी देवी-देवता, या किसी भी वस्तु को इष्ट मान कर पूजा करने से हो सकती है, इससे लोक और परलोक भी सुधर सकते हैं परन्तु इनकी पूजा से आवागमन से छुटकारा नहीं मिल सकता. आवागमन से छुटकारा यदि कोई दिला सकता है तो वह हस्ती संत सत्गुरुवक्त ही है वह इस प्रकार की एक तो वह स्वयं निर्बंध होता है दूसरे वह आपकी शंकाओं का आपके संदेहों का निवारण मुंह-दर-मुंह फेस-टू - फेस कर सकता है जिससे आपकी प्रगति अबाधित रूप से होने लगती है जो अन्य प्रकार से संभव नहीं.

अब रही बात यह कि गुरु पर श्रद्धा और विश्वास कैसे लाया जाय? यह बिलकुल निजी मामला है और इसके लिए कोई सिद्धांत प्रतिपादित नहीं किये जा सकते क्योंकि जितना भी इस बारे में कहा जायगा वह विवादित बन जायगा. जैसे कोई किसी को रोना नहीं सिखा सकता, किसी को प्रेम करना नहीं सिखा सकता, इसी प्रकार कोई किसी को किसी पर श्रद्धा और विश्वास करना भी नहीं सिखा सकता. यह तो जब होता है तब होता है और नहीं होता तो नहीं होता. फिर भी अपनी तुच्छ बुद्धि के अनुसार और अपने अनुभव के आधार पर मैं यहाँ पर लिखना चाहता हूँ कि यदि किसी को किसी महापुरुष के पास बैठकर मानसिक शांति मिलती है, उसके काम-क्रोध में कमी आने लगती है, उसकी वासनाएँ बदलने लगती हैं, उसके विकारों में परिवर्तन आना शुरू हो जाता है, उसकी चंचलता घटने लगती है तो समझो कि वह आपका मार्गदर्शन करने में सक्षम है. यदि वह अपनी प्रशंसा नहीं करता/करवाता, अहंकारवश कोई बात नहीं कहता, वाह्य-आडम्बरों से दूर रहता है और किसी का खंडन-मंडन नहीं करता और अपने अनुभव के आधार पर आपकी समस्स्याओं का समाधान बताता है तो ऐसा महापुरुष गुरु स्वीकार करने के योग्य है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि उसके पास बैठकर आपके मन में यह भावना जाग्रत हो जाय कि जिसकी मुझे तलाश थी बस वह यही है. यदि ऐसी चिंगारी आपके मन मंदिर में जाग उठती है तो आप का काम उससे बन जायगा और आपका कल्याण हो जायगा. अब एक बात यहाँ पर और स्पष्ट करने योग्य है कि क्या गुरु कि खोज हम करते हैं? मेरी धारणा है कि गुरु कि खोज तो स्वयं गुरु कि प्रेरणा से ही होती है. वही हमारे अन्दर यह भावना पैदा करता है कि हम-एक-दूजे के लिए हैं.

गुरू की पहचान

गुरु की पहचान

संतमत में सबसे ज्यादा जोर, सबसे ज्यादा महिमा गुरु की गाई जाती है. संतमत में गुरु को भगवान से भी बढ़ कर माना जाता है. संतमत के आदि गुरु संत कबीर ने तो यहाँ तक कह दिया :
गुरु गोबिंद दोउ खड़े काके लांगू पॉंव
बलिहारी गुरु अपनों जिन गोबिंद दियो बताय

पता है ऐसा क्यों कहा गया है? इसके अनेक कारण हो सकते हैं. ज्ञानी और विद्वान तो अपने-अपने तर्कों के अनुसार अनेकोंअनेक कारण ढूंढ कर विषय को और भी अधिक जटिल बना सकतें हैं क्योंकिं शब्द जाल महा जाल होता है और उससे बच निकलना आसान नहीं होता और विद्वानों के पास तो शब्दों का अपार भंडार होता है. इसलिए मैं अपनी तुच्छ बुद्धि के आधार पर इसका साधरण सा कारण इस प्रकार व्यक्त करता हूँ:
सभी धर्म सभी संत महात्मा अनादी काल से कहते आये हैं कि ईश्वर ने मनुष्य को अपने ही रूप में बनाया है परन्तु किसी ने भी आज तक असली ईश्वर को बाहर में नहीं देखा है जिसने भी ईश्वर को पाया है उसने अंतर में ही दर्शन पाया है और अंतर में दर्शन पाकर गूंगा बन गया है क्योंकि असली ईश्वर का न तो वर्णन हो सकता है और न ही उसकी व्याख्या हो सकती है. वाणी तो उसे व्यक्त करने का एक कमजोर साधन है जिसके चलते अर्थ का अनर्थ हो जाता है अर्थात वाणी के चलते सत्य असत्य हो जाता है. ईश्वर अनुभव का विषय है और इस अनुभव को वही दूसरे को अनुभव करा सकता है जिसने स्वयं इसका अनुभव किया हुआ होता है. यद्यपि प्रत्येक मनुष्य के अन्दर ईश्वर मौजूद है तथापि हरेक उसका अनुभव स्वयं करने में असमर्थ है. इसके भी अनेक कारण हो सकते हैं- जैसे पूर्व जन्मो के प्रारब्ध कर्म और उनका संस्कार, इस जन्म के संचित कर्म और क्रियमाण कर्म और उनके संस्कार; इसके अतिरिक्त काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्षा, आशा, तृष्णा, वासना और कामना आदि ऐसी मानवी वृतियां हैं जिनके चलते घर में ही खजाना होते हुए भी हम जीवन भर कंगाल ही बने रहतें हैं. जो इन पर विजय प्राप्त कर लेता है या जिसे उस खजाने कि चाबी मिल जाती है वही उस धन का उपयोग कर सकता है.
जिसको इसका ज्ञान हो जाता है वही दूसरों को इसका ज्ञान दे सकता है और गुरु ही वह हस्ती है जिसे अंतर का ज्ञान हो चूका होता है और वही इस ज्ञान को दूसरों को बाँटने में सक्षम होता है. मेरी समझ के अनुसार गुरु की आवश्यकता इसीलिए जानी जाती है.