सोमवार, 28 जून 2010
शुक्रवार, 25 जून 2010
गुरुवार, 24 जून 2010
भारत भूमि महान
लेखक - मुकेश मिश्रा

मार्ग कठिन अछी आत्मबल सबल अछि
पाठकक स्नेहे स मनोबल बढल आछी !
हम तऽनिमित छि मिथिलाक पुत्र केर ,
दीन राति बाटैत छि मैथिलिक सूत्र केर !!
मिथिला राज्य चाही बस एक अछि अभिलाषा ,
अपन गामक सहयोग स जरुर पुरत इ आशा !!!
भारत भूमि महान
हमर हे भारत भूमि महान , आहा केर लाखक लाख प्रणाम
भाल मुकुट हिमगिरी बीराजय , बन उपवन तन -मन के साजय,
जलनिधि पायर पखारथी सदिखन ,कय कल -कल स्वर गान !
हमर हे भारत भूमि महान , आहा केर लाखक लाख प्रणाम !!
दिनकर प्रथम किरन दय उर पर ,गाबय कोकिल सातहु सुर पर ,
शीतल बिंदु इंदु झहराबथी , तारागन मुस्कान
हमर हे भारत भूमि महान , आहा केर लाखक लाख प्रणाम
ब्रम्हापुत्र ,गंडक आ गंगा , सरयुग ,कोशी ,यमुना ,तमसा ,
वक्षस्थल पर खेलथी सदिखन कमला और बलान !
हमर हे भारत भूमि महान , आहा केर लाखक लाख प्रणाम
शंकर ,व्यास ,मंडन आ दधिची,बिद्या बारीधी पुण्र बिभूति
देलनि रंग बीरंगक पोथी गीता ,वेद ,पुरान !
हमर हे भारत भूमि महान , आहा केर लाखक लाख प्रणाम
गाँधी ,बुद्ध ,सुभाष ,भगत केर ,जंथी के नही एही जगत केर
सीता ,साबित्री सन कर्मठ ,मनु सनक सन्तान !
हमर हे भारत भूमि महान , आहा केर लाखक लाख प्रणाम
गीतकार - मुकेश मिश्रा
9990379449
भाल मुकुट हिमगिरी बीराजय , बन उपवन तन -मन के साजय,
जलनिधि पायर पखारथी सदिखन ,कय कल -कल स्वर गान !
हमर हे भारत भूमि महान , आहा केर लाखक लाख प्रणाम !!
दिनकर प्रथम किरन दय उर पर ,गाबय कोकिल सातहु सुर पर ,
शीतल बिंदु इंदु झहराबथी , तारागन मुस्कान
हमर हे भारत भूमि महान , आहा केर लाखक लाख प्रणाम
ब्रम्हापुत्र ,गंडक आ गंगा , सरयुग ,कोशी ,यमुना ,तमसा ,
वक्षस्थल पर खेलथी सदिखन कमला और बलान !
हमर हे भारत भूमि महान , आहा केर लाखक लाख प्रणाम
शंकर ,व्यास ,मंडन आ दधिची,बिद्या बारीधी पुण्र बिभूति
देलनि रंग बीरंगक पोथी गीता ,वेद ,पुरान !
हमर हे भारत भूमि महान , आहा केर लाखक लाख प्रणाम
गाँधी ,बुद्ध ,सुभाष ,भगत केर ,जंथी के नही एही जगत केर
सीता ,साबित्री सन कर्मठ ,मनु सनक सन्तान !
हमर हे भारत भूमि महान , आहा केर लाखक लाख प्रणाम
गीतकार - मुकेश मिश्रा
9990379449
बुधवार, 23 जून 2010
झरोखा
लेखक - मुकेश मिश्रा

झरोखा
पलक झुका कर सलाम करते है,
अपने दिल की दुवा आपके नाम करते है
कबूल हो तो मुस्कुरा देना,हम मुकेश मिश्रा,
ये झरोखा आप के नाम करते है
पलक झुका कर सलाम करते है,
अपने दिल की दुवा आपके नाम करते है
कबूल हो तो मुस्कुरा देना,हम मुकेश मिश्रा,
ये झरोखा आप के नाम करते है

दुनियाँ में रह के सपनों में खो जाव
किसी को अपना बना लो या किसी का हो जाव
अगर कुछ भी नही होता तो तकिया लो अऔर
सो जाव ,
बुझी हुयी समा फिर से जल सकती है
तूफान में गिरी कस्ती किनारे लग सकती है
मायूस ना होना कभी जिन्दगी में ..
ये किस्मत है कभी भी बदल सकती है
दिल ने कहा दोस्त को sms करो ,
फिर ख्याल आया की दिल तो पागल है ,
फिर सोचा दिल दिल अगर पागल है तो क्या हुवा ..
मेरा दोस्त कैन सा नौरमल है
वादियों से सूरज निकल आया है,
फ़िजावो ने नया रंग चाह है
खामोश हो अब तो मुस्कराव,आपकी
मुश्कान देखने हमारा sms आया है
गम वी जो आशु ला दे,ख़ुशी वो जो गम भुला दे
हमे तो चाहिए आपकी इतनी सी दोस्ती, जो
हमारे याद करने पर एक फोन कर दे
लिखे जो खत मैंने उसकी याद में,
पूरा पढ़ लिया पापा ने रात में
सुबह जब हुवा तो जुते इतने परे की
तेरे नाम वाला बाल गजनी में बदल गया
जब भी हम मैसेज करते है,लोग कहता है
इनको तो आदत है पैसा उराने की,मगर वो
नदान किया जाने, ये भी एक आदत है
रिश्ते निभाने की
बरे अरमानो से बनबाया है,
इसे रौशनी से सजाया है
जरा खिरकी खोल के देख लेना,आपको
good night कहने चाँद को भेजबाया है
गीतकार - मुकेश मिश्रा
9990379449
मंगलवार, 22 जून 2010
बुधन पंडित जी
लेखक - मुकेश मिश्रा

बुधन पंडित जी
हमरा गाम में एगो बुधन पंडित जी छला,
बर तमशाह,कुनु धिया -पुता ज कखनो
कीछ कही देलखान,त फेर जुनी पुछु
मुदा तमशाह रहितो ..........
बर नामि छला, सत्यनारायन पूजा, बीभाह,
मुंडन,उपनयन,सब प्रयोजन में हिनका बजयल जात छ्ल, अहि प्रकारे दूर गाम से न्योता ऐलान, जे हमरा बचीयाक
बीभाह थीक से अपने एतिये,
पंडित जी तौयार भेला,और अपना गामक हजमा के सेहो संग ल लेला
दुनु गोटे से पहुचला ओही ठाम,........
धूम-धाम स बिबाहक तैयारी भ रहल छल,
दूर गाम से एला स पंडित जी थाकी गेल छला ,
आराम खातिर कीछ देर दलान पर चली गेला
गामक अगति छोरा जेना,मदन जी, चन्दन जी,
और अपन गाम घर स जुरल चारी पाच गो
अबिबाहित नबयुबक सब पंडित जी लग पहुचल
ओय में से एक जन अपन हाथ आगा बर्बैत,बजला
पंडित जी हमर बिबाह कहिया हेते
अगिला साल भ जेतो जो
ओ हाथ हटलैन की दोसर हाथ पहुचल
पंडित जी हमर बिबाह कहिया हेते
अगिला साल भ जेतो जो
ओ हाथ हटलैन की तेसर हाथ पहुचल
पंडित जी हमर बिबाह कहिया हेते
तोहर अहि साल भ जेतो जो
अहिना एगो हाथ हटें की दोसर,फेर तेसर ,
पंडित जी तबाह भ गेला
तामस आब लगलान,माथ घुरिया लगलेन,
मुदा तामस क बर्दास्त करेत बजलाह
आन गाम आयल छि ,एत कोना ऊट पतांग करब
अहि प्रकारे तामस क बर्दास्त करेत,छोरा सब क
अगिला साल पछिला साल कहैत बिभाहक समाय
दैत जाथिन,अहिना हैत हैत एगो लम्बा चोरा हाथ
पंडित जी के सामने एलैन, पंडित जी जाही ,हाथ पकरला
देखला एगो जनाना कम स कम एक कुंटल बीस किलो क
जनाना हाथ बर्बैत बजली ,पंडित जी हमर बीभाह
कहिया हेते.. पंडित जी क तामस बर्दास्त नै भेलैन ,
पंडित जी झट स उठला आ पट स जनाना क पटैक
छाती पर बैस गेला आर बजला ...............
अय छोरा सब के बिबाह अगिला पिछला साल त
भयै जेतै,मुदा हे मौगी तोहर बिबाह एखने हेतौ
एखने हेतौ तोहर बिबाह , एखने हेतौ तोहर बिबाह
गीतकार- मुकेश मिश्रा
9990379449
सोमवार, 21 जून 2010
बेबफा प्यार
बेबफा प्यार
लेखक - मुकेश मिश्रा

मैंने प्यार किया तुझसे , दिल की गहरायी से
वो हरजाई ऐसी निकली, मार डाला तनहायी से

माय भूल से कर बैठा प्यार
समझ नही आया उस नागिन का प्यार
जिन्दगी रह गयी मझदार में
दिल के टुकरे हुये हजार
जब आखे खुला उनकी इंतजार में देखा ...
वह मग्न है दुसरो के प्यार में
भूल गया था मै की वह दौलतमंद की बेटी है
मै मरता रहा और वो महलो में लेटी रही
इसीलिए कहता हु यारो ........
मत करना प्यार दौलतमंद की बेटी से
मार डालेगी अँखीयो की गोली से
गीतकार - मुकेश मिश्रा
9990379449
कोजगरा

लेखक - मुकेश मिश्रा
अहि रायतो क लाख -लाख अभिन्दन
अहि दिनों क लाख -लाख अभिन्दन
अपन गाम घर और अपन गाम घर स जुरल सब भाय क
गीत कार व एक्टर मुकेश मिश्रा के तरफ स
सेहो लाख -लाख अभिन्दन
कोजगरा
गणु घर आंगन चमकाबौथ, सजबौथ अपन दलान
नहु - नहु बात फटैय छैन चिबा रहल छैथ पान
आयल मुकेश जी पुछलक काका .......
मदन जी के छि काइल कोजगरा, कुन नाच मंगबैय छि
मुह मोरी क कहला मुकेशबा,सेहो नय बुझल खुलासा
तहन पहिले से करारी केने छाथ एक पछहतर टाका ,
आ एगो मोटर गारी से ज नै लेता देता त हेबे कर्तान झगरा
हेबे कर्तान झगरा रौऊ मुकेशबा हेबे कर्तान झगरा
कतबो करता खोयचातानी, देबअ परतान टिभी जपानी
सोन सनक मदनजी हमर, नोकरी छैय सरकारी
तैय जमाय के नैय कोना देथिन एगो गारी
संगे संग टोकना लोटा अरिया थारी,
देब कुन भेलै इ भारी ....
नै कोना देथिन समैध बोरा भरल मखान
तहन ने रात भैर ओगेर क परसब अपन दलान
आंगन में बूङी अरिपन द सुभे गीत गाबी रहल छैथ
कोंटा दिश ताकि रहल छैथ, जे किया नै भार आयल ह
एतेक राइत बीत गेलै ह, किया नै भार आयल ह
धरफर धरफर लोक करै य परसू गणु मखान .....
गीतकार- मुकेश मिश्रा
9990379449
रविवार, 20 जून 2010
दफन

लेखक - मुकेश मिश्रा
दफन
ऐक बार मेरे मुल्क में एसा हुवा चलन
वो वापसी होने लगे जो हो चुके थे दफन
पहली थी बारी गाँधी की
गाँधी जी आ गये
जब सुट बूट देखे तो वो तिलमिला गये
जब कहि मिलती नही मुल्क में खादी
तो कहने लगे .....
चलता हु भूल आया हु लाठी
वो सो गये समाधि में फिर तानकर कफन
वो वापसी होने लगे जो हो चुके थे दफन
दूजी थी बारी चाचा नेहरू की .......
नेहरु जी आ गये
जब देखे बिगरे बच्चो तो वो भी तिलमिला गये
वो कह न सके सर्म के मारे पहले होश ढूंड लू
कहने लगे आता हु पहले रोज ढूंड लू
अब तक ना ढूंड पाए ,ऐसी लगी चुभन
वो वापसी होने लगे जो हो चुके थे दफन
तीजी थी बारी लाल की......
गये लाल जी भी आ
जब मुछ कटे देखे तो वो भी तिलमिला गये
कहने लगे ऐसा सितम सह नही सकता
संग मुछ कटो के माय रह नही सकता
ना लौटने की उन्होंने भी ली कसमे
और कहने लगे तीनो मिलकर ......
अरे मुल्क बालो कहो, सुधर जाते क्यों नही
जिस तरह गुजरा वो दिन उधर जाते क्यों नही
तुम्हे साफ साफ शब्दों में समझा चूका हु
सब भुला कर ना कहना की वो आते क्यों नही
जब देखा उन्होंने ये उजरा हुवा चमन
वो फिर से लगे मरने और हो गये दफन वो वापसी होने लगे जो हो चुके थे दफन
SONG WRITER-MUKESH MISHRA
CON..9990379449
दफन
ऐक बार मेरे मुल्क में एसा हुवा चलन
वो वापसी होने लगे जो हो चुके थे दफन
पहली थी बारी गाँधी की
गाँधी जी आ गये
जब सुट बूट देखे तो वो तिलमिला गये
जब कहि मिलती नही मुल्क में खादी
तो कहने लगे .....
चलता हु भूल आया हु लाठी
वो सो गये समाधि में फिर तानकर कफन
वो वापसी होने लगे जो हो चुके थे दफन
दूजी थी बारी चाचा नेहरू की .......
नेहरु जी आ गये
जब देखे बिगरे बच्चो तो वो भी तिलमिला गये
वो कह न सके सर्म के मारे पहले होश ढूंड लू
कहने लगे आता हु पहले रोज ढूंड लू
अब तक ना ढूंड पाए ,ऐसी लगी चुभन
वो वापसी होने लगे जो हो चुके थे दफन
तीजी थी बारी लाल की......
गये लाल जी भी आ
जब मुछ कटे देखे तो वो भी तिलमिला गये
कहने लगे ऐसा सितम सह नही सकता
संग मुछ कटो के माय रह नही सकता
ना लौटने की उन्होंने भी ली कसमे
और कहने लगे तीनो मिलकर ......
अरे मुल्क बालो कहो, सुधर जाते क्यों नही
जिस तरह गुजरा वो दिन उधर जाते क्यों नही
तुम्हे साफ साफ शब्दों में समझा चूका हु
सब भुला कर ना कहना की वो आते क्यों नही
जब देखा उन्होंने ये उजरा हुवा चमन
वो फिर से लगे मरने और हो गये दफन वो वापसी होने लगे जो हो चुके थे दफन
SONG WRITER-MUKESH MISHRA
CON..9990379449
एक नकपिची लरकी ....

लेखक - मुकेश मिश्रा एक नकपिची लरकी .... 9990379449
एक नकपिची लरकी थी ,एक लरके पे मरती थी
चोरी -चोरी छत पे आ कर,रोज मिला करती थी
मिलते -मिलते फस गई ,उसको वो लरका पट गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
किसी न किसी बहाने रोज हमसे लरती थी
छोटी सी नन्ही सी नादान सा वो दिखती थी
लरते- लरते, रोते -रोते बाहोंमे शमा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
मुझे देखने रोज सबेरे ही उठ जाती थी
देख के नको पे अंगुली की इसारा करती थी
हेलो टाटा बाय-बाय कह के सासों में शमा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
मेरे घर में एक दिन टीबी देखने आयी थी
मेरे बहो में बैठ कर मेरे गालो को चूमी थी
सादी करुगी तुझी से हसते-हसते कह गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
एक दिन छत पे खेलने वो आयी थी
मुझे देख वहा कोई जनत ही पायी थी
खेलना छोर पीछे से मेरे कन्धो पे लटक गई
एक नकपिची लरकी थी...............
मेरे मुबायल पे किसी अजनबी लरकी की फोन आयी थी
पीछे से आकर अपने कान को मेरे फोन में सटायी थी
गुसे से फोन छीन कर निचे फेक गई
एक नकपिची लरकी थी...............
एक सहेली शालू थी पर वो बहुत चालू थी
दोनों ने मिलकर एक दिन मुझे बनाया भालू थी
आय लब यु कह दो शालू ने बता गई
एक नकपिची लरकी थी...............
दुसरे ही दिन माय ने आय लब यु कह दिया
शर्म के मरे उनका बुरा हाल हो गया
हस्ते मुस्कुराते आख मर के वो वहा से चली गई
एक नकपिची लरकी थी...............
अचानक स्कूल में आ गई गर्मी की छुटी
वो चली गई दीदी के पास बांध के दो जुटी
जाते जाते फोन करुगी मुझे वो बता गई
एक नकपिची लरकी थी...............
सुबह-सुबह मिसकॉल आया माय समझा मेहमान आया
माय ने इधर से फोन लगाया रूह में मेरे जान आया
रखती हु दीदी आयी ,फोन को वो काट गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
दुसरे दिन फोन पे कहि एक लरका मुझे देखता है
माय ने कहा देखनेदो;कुछ करता तो नही
मार ही दंगी फोन पे गुनगुना गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
किसी बहाने माय ने उसे वहा से बुला लिया
देख कर माय उसे दिल में लगी आग बुझा लिया
बच के रहना हम से गुसे में बता गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
रूठ गयी वो हमसे कैसे उसे मनावू
भाभी से पुछा कैसे उसे पावू
भाभी ने हम दोनों को आपस में मिला गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
स्टेसन तक छोरने हम भी साथ गये थे
उसकी खामोसी देख सरमा हम गये थे
गारी में बैठ के हमे अकेला छोर गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
गाव जाने से पहले अपनी सहेली संगीता को कुछ बता गयी
कह देना तुम उन्हें माय सदी उसी से करूंगी
दिल की अरमा जुवा पे ला गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
गाव जा कर उसकी ममी ने एक चाल चल दी
फोन कर के बिटु माँ को हमे बदनाम कर दी
दिल में लगा चोट नींद भी भाग गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
सबेरे ही फोन पे उसने हम से पुछा किया हुवा
मई ने कहा हम से अच्छा लरका तुम्हे मिलेगा
चार कैमरा तुम्हारे सदी में ले जवुगा
धूम -धाम से तुम्हारी सदी की लडू भी खाऊगा
उसने बोली और किया देखोगे ..
माय ने कहा ..तुम्हारी सादी देखूगा उसने बोली..मेरी मरी हुयी मुह देखोगे
यू कह के फोन को वो काट गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
मुझे लगा मुझसे बहुत प्यार करती है वो
मेरे बगैर जिन्दा ना रह सकती है वो
माय भी बेसुमार प्यार उसे करने लगा
खुवाबो में रोज उसे देखने लगा
दिल में हलचल मचा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
चोरी चोरी मै उसका तस्बीर खीचने लगा
पूरी तस्बीर खीच के तोफा में उसे दे आया
धन्यबाद कह के हस के वो चिली गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
यु ही समाय बीतने लगा हम दोनों प्यार में डूबते गये
एक दुसरे को दखने में ही समाय बीतते गये
हवा की डोर ने हम दोनों को बांध गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
किसी लायला मजनू से कम नही मेरा ये मुहब्त
उसे देखने में ही समय बीत गया मिली नही फुर्सत
आखो में झिलमिल सी रोशनी वो दे गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
उसके प्यार में माय इस कदर डूब गया
उसे छोर कहि जाने का मन नही किया
प्यार की एक जोत दिल में जगा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
उसके माँ पापा दादा दादी सब को माय भा गया
सादी होगा मेरा इससे माय सरमा गया
दिल में इंतजार का ललक छोर गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
गाव से मेरे दादा जी मेरे पास आये थे
अपने प्यार की दस्ता उन्हें सुनाये थे
करलेना उसी से सादी ये बात कह गये
एक नकपिची लरकी थी...............
सब को अच्छा लगा पर उसे अच्छा ना लगा
मेरे सिबा एक और लरका उसे चाहने लगा
मुझे पसंद नही ये लरका मेरे बारे में बता गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
पता लगाया आखिर ये लरका है कौन
पता चला उसी के साथ पढ़ती है टीयुसन
मुझे छोर उस लरका में समा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
घर के गेट लगा कर सामने वो बैठती थी
पढाय के बहाने उससे प्यार की बाते करती थी
मेरा हाथ छोर उसका हाथ पकर गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
मेरा प्यार भुलाकर उससे वो प्यार करने लगी
बचपन की इस डोर को पल में वो तोर गयी
कैसे जीयु उसके बिन कुछ ना बता गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
वो तो मुझे भूल गयी पर माय कैसे भूल पौउगा
जब तक जिन्दा रहूँगा उसी को माय चाहुगा
मेरे दिए तोफा भी फेक गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
खत्म कर दी सारी जज्बात की कहानी
कैसे कहू माय यारो थी वो मेरी सपना रानी
तीर मार के वो मुझे कब्र पे सुला गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
प्यार तो इस्वर का दिया बरदान होता है
जो ना इसे समझा वो नदान होता है
मेरे यादो को छोर उसकी यादो में समा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
मेरे दिल को छोर उस के दिल में घर बसा गयी
दुवा करुगा उसे वो मिल जय जिसमे वो रमा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
गुल को गुलाब बना देता गुलाब को कमल बना देता
आपकी ऐक मुस्कान पे कितना गजल लिख देता
सपना जी आप मेरा साथ छोरती नही तो आपके
नाम से बिहार में भी ऐक ताजमहल बना देता,
(कुछ बाते)
१.प्यार इस्वर का बरदान होता है
२.तरप प्यार का पहचान होता है
३.पार्थना ,तपसिया,पूजा ,खोना को प्यार कहते है
४.दो दिलो का मीलन प्यार का रूप है
५.प्यार एक से होता है
६.कृष्ण ने राधा से सादी नही की ,पर दुनिया उनके प्यार को पूजता है
७.प्यार में रोवो मत हिमत रखो
८.अपने प्यार पे भरोसा रखो
mukesh.mishra@rediffmail.com
९९९०३७९४४९,
एक नकपिची लरकी थी ,एक लरके पे मरती थी
चोरी -चोरी छत पे आ कर,रोज मिला करती थी
मिलते -मिलते फस गई ,उसको वो लरका पट गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
किसी न किसी बहाने रोज हमसे लरती थी
छोटी सी नन्ही सी नादान सा वो दिखती थी
लरते- लरते, रोते -रोते बाहोंमे शमा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
मुझे देखने रोज सबेरे ही उठ जाती थी
देख के नको पे अंगुली की इसारा करती थी
हेलो टाटा बाय-बाय कह के सासों में शमा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
मेरे घर में एक दिन टीबी देखने आयी थी
मेरे बहो में बैठ कर मेरे गालो को चूमी थी
सादी करुगी तुझी से हसते-हसते कह गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
एक दिन छत पे खेलने वो आयी थी
मुझे देख वहा कोई जनत ही पायी थी
खेलना छोर पीछे से मेरे कन्धो पे लटक गई
एक नकपिची लरकी थी...............
मेरे मुबायल पे किसी अजनबी लरकी की फोन आयी थी
पीछे से आकर अपने कान को मेरे फोन में सटायी थी
गुसे से फोन छीन कर निचे फेक गई
एक नकपिची लरकी थी...............
एक सहेली शालू थी पर वो बहुत चालू थी
दोनों ने मिलकर एक दिन मुझे बनाया भालू थी
आय लब यु कह दो शालू ने बता गई
एक नकपिची लरकी थी...............
दुसरे ही दिन माय ने आय लब यु कह दिया
शर्म के मरे उनका बुरा हाल हो गया
हस्ते मुस्कुराते आख मर के वो वहा से चली गई
एक नकपिची लरकी थी...............
अचानक स्कूल में आ गई गर्मी की छुटी
वो चली गई दीदी के पास बांध के दो जुटी
जाते जाते फोन करुगी मुझे वो बता गई
एक नकपिची लरकी थी...............
सुबह-सुबह मिसकॉल आया माय समझा मेहमान आया
माय ने इधर से फोन लगाया रूह में मेरे जान आया
रखती हु दीदी आयी ,फोन को वो काट गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
दुसरे दिन फोन पे कहि एक लरका मुझे देखता है
माय ने कहा देखनेदो;कुछ करता तो नही
मार ही दंगी फोन पे गुनगुना गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
किसी बहाने माय ने उसे वहा से बुला लिया
देख कर माय उसे दिल में लगी आग बुझा लिया
बच के रहना हम से गुसे में बता गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
रूठ गयी वो हमसे कैसे उसे मनावू
भाभी से पुछा कैसे उसे पावू
भाभी ने हम दोनों को आपस में मिला गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
स्टेसन तक छोरने हम भी साथ गये थे
उसकी खामोसी देख सरमा हम गये थे
गारी में बैठ के हमे अकेला छोर गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
गाव जाने से पहले अपनी सहेली संगीता को कुछ बता गयी
कह देना तुम उन्हें माय सदी उसी से करूंगी
दिल की अरमा जुवा पे ला गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
गाव जा कर उसकी ममी ने एक चाल चल दी
फोन कर के बिटु माँ को हमे बदनाम कर दी
दिल में लगा चोट नींद भी भाग गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
सबेरे ही फोन पे उसने हम से पुछा किया हुवा
मई ने कहा हम से अच्छा लरका तुम्हे मिलेगा
चार कैमरा तुम्हारे सदी में ले जवुगा
धूम -धाम से तुम्हारी सदी की लडू भी खाऊगा
उसने बोली और किया देखोगे ..
माय ने कहा ..तुम्हारी सादी देखूगा उसने बोली..मेरी मरी हुयी मुह देखोगे
यू कह के फोन को वो काट गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
मुझे लगा मुझसे बहुत प्यार करती है वो
मेरे बगैर जिन्दा ना रह सकती है वो
माय भी बेसुमार प्यार उसे करने लगा
खुवाबो में रोज उसे देखने लगा
दिल में हलचल मचा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
चोरी चोरी मै उसका तस्बीर खीचने लगा
पूरी तस्बीर खीच के तोफा में उसे दे आया
धन्यबाद कह के हस के वो चिली गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
यु ही समाय बीतने लगा हम दोनों प्यार में डूबते गये
एक दुसरे को दखने में ही समाय बीतते गये
हवा की डोर ने हम दोनों को बांध गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
किसी लायला मजनू से कम नही मेरा ये मुहब्त
उसे देखने में ही समय बीत गया मिली नही फुर्सत
आखो में झिलमिल सी रोशनी वो दे गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
उसके प्यार में माय इस कदर डूब गया
उसे छोर कहि जाने का मन नही किया
प्यार की एक जोत दिल में जगा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
उसके माँ पापा दादा दादी सब को माय भा गया
सादी होगा मेरा इससे माय सरमा गया
दिल में इंतजार का ललक छोर गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
गाव से मेरे दादा जी मेरे पास आये थे
अपने प्यार की दस्ता उन्हें सुनाये थे
करलेना उसी से सादी ये बात कह गये
एक नकपिची लरकी थी...............
सब को अच्छा लगा पर उसे अच्छा ना लगा
मेरे सिबा एक और लरका उसे चाहने लगा
मुझे पसंद नही ये लरका मेरे बारे में बता गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
पता लगाया आखिर ये लरका है कौन
पता चला उसी के साथ पढ़ती है टीयुसन
मुझे छोर उस लरका में समा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
घर के गेट लगा कर सामने वो बैठती थी
पढाय के बहाने उससे प्यार की बाते करती थी
मेरा हाथ छोर उसका हाथ पकर गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
मेरा प्यार भुलाकर उससे वो प्यार करने लगी
बचपन की इस डोर को पल में वो तोर गयी
कैसे जीयु उसके बिन कुछ ना बता गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
वो तो मुझे भूल गयी पर माय कैसे भूल पौउगा
जब तक जिन्दा रहूँगा उसी को माय चाहुगा
मेरे दिए तोफा भी फेक गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
खत्म कर दी सारी जज्बात की कहानी
कैसे कहू माय यारो थी वो मेरी सपना रानी
तीर मार के वो मुझे कब्र पे सुला गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
प्यार तो इस्वर का दिया बरदान होता है
जो ना इसे समझा वो नदान होता है
मेरे यादो को छोर उसकी यादो में समा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
मेरे दिल को छोर उस के दिल में घर बसा गयी
दुवा करुगा उसे वो मिल जय जिसमे वो रमा गयी
एक नकपिची लरकी थी...............
गुल को गुलाब बना देता गुलाब को कमल बना देता
आपकी ऐक मुस्कान पे कितना गजल लिख देता
सपना जी आप मेरा साथ छोरती नही तो आपके
नाम से बिहार में भी ऐक ताजमहल बना देता,
(कुछ बाते)
१.प्यार इस्वर का बरदान होता है
२.तरप प्यार का पहचान होता है
३.पार्थना ,तपसिया,पूजा ,खोना को प्यार कहते है
४.दो दिलो का मीलन प्यार का रूप है
५.प्यार एक से होता है
६.कृष्ण ने राधा से सादी नही की ,पर दुनिया उनके प्यार को पूजता है
७.प्यार में रोवो मत हिमत रखो
८.अपने प्यार पे भरोसा रखो
mukesh.mishra@rediffmail.com
९९९०३७९४४९,
मंगलवार, 15 जून 2010
मक्ष्छर चलिसा

दोहा
अति आबस्यक जानी के होके अति लचार ,
बरनो मच्छर सक्ल गुणों दुख दायक ब्यबहार ।
बिना मसहरि दिन हूँ सुनहू सकल नर्रनार ,
मक्ष्छर चलिसा लिखक पढ़उ सोइच बिचैर ।।
चोपाई
जय मच्छर भगवान उजागर ।
जय अनगिनित हे रोग के सागर ।।
नदियाँ पोखैर गंगा सागर ।
सबठाम रहते छी अही उजा गर ।।
नीम हकिम के अही रखबारे ।
डाक्टर के भेलो अतिश्य प्यारे ।।
मलेरिया के छी अहा दाता ।
छी खटमल के प्यारे भ्राता ।।
जरी बुट्टी से काज नऽ बनल ।
अंग्रेजी दबाइर् जलदी फीट करल ।।
आउल आउट गुडनाइर्ट अपनेलो ।
फेर अपन अहा जान बचेलो ।।
दिन दुखि सब धुप में जरैत छैथ ।
रैतो में बेचैन रहैत छैथ ।।
संझ – भोर अहा राग सुनाबी ।
गूं गूं के नाम कमाबी ।।
राजा छैथ या रंक फकिरा ।
सब के केलो अपनेही मत धिरा ।।
रूप कुरूप न अहा मानलो ।
छोटका - बऱका नै अहा जनलो ।।
नर छैथ या स्वर्गाक नारी ।
सब के समक्ष बनलो अहा भारी।।
भिन्न भिन्न जे रोग सुनेला ।
डाकटर कुमार फेर शर्मेला ।।
सब दफ्तर में आदर पेलो ।
बिना इजाजत के अहा घुस गेलो ।।
चाट परल जिन्गी से गेलो ।
कनैत खिजैत परिवार गमलो ।।
जय - जय हे मक्ष्छर भगवाना ।
माफ करू सबटा जुर्माना ।।
छी अहा नाथ साथ हम चेरा ।
जल्दी उजारारू अहा अपनेही डेरा ।।
दोहा
निश बंसर शंकर करण मालिन महा अति कुर |
अपन दल बल सहित बशु कहि जा दुर ||
मदन कुमार ठाकुर
पट्टीटोल (कोठिया), भैरव स्थान ,
झंझारपुर , मधुबनी , बिहार ,८४७४०४
मंगलवार, 8 जून 2010
बहुत गलत बात अछि
दूध में पैन के , दुश्मनी में आईंन के , गाम में डैन के ,
बहुत गलत बात अछि --------
बर्बाद करै में मुस के , नोकरी मे घुस के , बनिया में मखीचूस के ,
बहुत गलत बात अछि --------
भाई में बैमान के , कर्म में अभिमान के , मनुष्य में सैतान के ,
बहुत गलत बात अछि --------
नशा में दारू के , आदमी में भारू के , मिया - बीबी संग झारू के ,
बहुत गलत बात अछि --------
मेला में जेवर के , डैविटिज में मिठाई घेवर के , बदमाशी में देवर के ,
बहुत गलत बात अछि --------
पूजा -पाट बिना पीपल के ,श्रधकर्म बिना पीतल के , बरी -भात बिना जूरी शीतल के ,
बहुत - गलत बात अछि ---------------
नारी गर्दन बिना अठन्नी के, समान बेचनाय बिना पन्नी के , पेंटिंग बिना मधुबनी के ,
बहुत - गलत बात अछि ---------------
डिगरी बिना ईग्न्नु के , खिसा -पिहानी बिना गन्नू के , लेन - देन में भीख मग्न्नु के
बहुत - गलत बात अछि ---------------
आदमी में दुराचारी के , फल में मह्कारी के , इंडिया में बेरोजगारी के ,
बहुत गलत बात अछि --------
समाज में काम चोर के , आदमी में सुईद खोर के , लराई में लातखोर के ,
बहुत गलत बात अछि --------
ब्यबसय में मन मर्जी के , सिग्नेचर में फर्जी के , फोज में बिना बर्दी के ,
बहुत गलत बात अछि --------
बस में जेब कत्तर के , हर बात में अक्तर के , गंदगी में बत्तर के ,
बहुत गलत बात अछि --------
सरक पर भीख माँगा के , सहर में लफंगा के , शरीर में बिना अंगा के
बहुत गलत बात अछि --------
चलें में मटकैत के , जंगली एरिया में डकैत के , गाम में लठैत ,
बहुत गलत बात अछि --------
नशा में सिकरेट के , हर बात में डारेकट के , आदत में क्रिकेट के ,
बहुत गलत बात अछि --------
इंडिया में बिना टेक्स के , दफ्तर में बिना फेक्स के , फॉरनर में सेक्स के ,
बहुत गलत बात अछि --------
विराद्धा अबस्था में बिना लाठी के , चिता पर बिना काठी के , सीरियल में बिना मराठी के ,
बहुत गलत बात अछि -----
शरक पर क्च्चरा के , बारादरी में झगरा के , कागज - पत्तर में लफरा के ,
बहुत गलत बात अछि -----
गाम में बिना भोज के , मजदूरी में बिना रोज के , साइंस में बिना खोज के ,
बहुत गलत बात अछि -----
यात्रा बिना मंगल के , प्रोग्राम बिना दंगल के , व्रत में अंजल के ,
बहुत गलत बात अछि -----
विदियार्थी बिना मास्टर के , हॉस्पिटल बिना डाक्टर के , फिल्म बिना डारेक्टर के ,
बहुत गलत बात अछि -----
उग्रवादी बिना तालिवान के , कुस्ती बिना पहलवान के , अतिथि के बिना जलपान के,
बहुत गलत बात अछि -----
मनोरंजन बिना खेल के , बिजनेस बिना सेल के , कैदी बिना जेल के ,
बहुत गलत बात अछि -----
रेड लाइट बिना अक्सिडेंट के , हॉस्पिटल बिना पेशेंट के , दाँत बिना पेप्सोडेंट के ,
बहुत गलत बात अछि -----
जनौऊ संस्कार बिना बरुवा के , मैथिल भोजन करेनाय बिना तरुवा के , आराम केनाय बिना गेरुवा के ,
बहुत गलत बात अछि ---------
अध्ययन बिना कम्पूटर के , पंखा बिना रेगुलेटर के , नियूज बिना प्रेशरिपोटर के ,
बहुत गलत बात अछि ---------
भगवन पूजा बिना माला के , घर छोरी बिना ताला के , सासुर जेनाय बिना साला के ,
बहुत गलत बात अछि ---------
शहर में बिना लाइट के , लराई में बिना फाइट के , जींस पेंट बिना टाईट के ,
बहुत गलत बात अछि -----
नागरिकता बिना मतदान के , जिनगी बिना कन्यादान के , परोपकर बिना रक्तदान के ,
बहुत गलत बात अछि -----------
महाभारत में शोक्न्नी के , शहर में बिना पत्त्नी के , आ रचना में बिना टिप्पणी के ,
बहुत गलत बात अछि -----
मदन कुमार ठाकुर
पट्टीटोल ,
भैरव स्थान ,
झंझारपुर ,मधुबनी ,
बिहार - ८४७४०४
mo- 9312460150
गुरुवार, 3 जून 2010
जून,2010 केर पाबनि-तिहार
4 जून-कालाष्टमी व्रत
5 जून-शीतलाष्टमी
6 जून-नवमी
8-अपरा/अचला एकादशी
9 जून-मधुसूदन द्वादशी
10 जून-वट सावित्री व्रत आरंभ। प्रदोष व्रत। शिवरात्रि व्रत।
11 जून-फलहारिनी कालिका पूजा
12 जून-शनिदेव अमावस्या,ज्येष्ट अमावस्या,वटसावित्री अमावस्या,पीपल पूजन,
13 जून-दस दिनक गंगा दशहरा-स्नान प्रारंभ
15-मिथुन संक्रांति तृतीया
16 जून-विनायक चतुर्थी,पंचमी
17 जून-विंध्यवासिनी पूजन,षष्टी
19 जून-दुर्गाष्टमी व्रत,श्रीअन्नपूर्णाष्टमी व्रत
21 जून-निर्जला एकादशी। आचार्य श्रीराम शर्मा के पुण्यतिथि,सौर वर्षाकाल प्रारंभ
23-प्रदोष
24-त्रयोदशी,आद्याशक्ति के महापूजा के विशेष योग
25 जून- पूर्णिमा व्रत। सत्यनारायण पूजा-कथा
26-ज्येष्ट/वटसावित्री/देवस्नान पूर्णिमा
30-गणेश चतुर्थी
5 जून-शीतलाष्टमी
6 जून-नवमी
8-अपरा/अचला एकादशी
9 जून-मधुसूदन द्वादशी
10 जून-वट सावित्री व्रत आरंभ। प्रदोष व्रत। शिवरात्रि व्रत।
11 जून-फलहारिनी कालिका पूजा
12 जून-शनिदेव अमावस्या,ज्येष्ट अमावस्या,वटसावित्री अमावस्या,पीपल पूजन,
13 जून-दस दिनक गंगा दशहरा-स्नान प्रारंभ
15-मिथुन संक्रांति तृतीया
16 जून-विनायक चतुर्थी,पंचमी
17 जून-विंध्यवासिनी पूजन,षष्टी
19 जून-दुर्गाष्टमी व्रत,श्रीअन्नपूर्णाष्टमी व्रत
21 जून-निर्जला एकादशी। आचार्य श्रीराम शर्मा के पुण्यतिथि,सौर वर्षाकाल प्रारंभ
23-प्रदोष
24-त्रयोदशी,आद्याशक्ति के महापूजा के विशेष योग
25 जून- पूर्णिमा व्रत। सत्यनारायण पूजा-कथा
26-ज्येष्ट/वटसावित्री/देवस्नान पूर्णिमा
30-गणेश चतुर्थी
सोमवार, 10 मई 2010
उठो भाई जागो
ओ भारत के वीर जवानों ,
माँ का क़र्ज़ चुका देना ,
कटे फटे इस मानचित्र को
अबकी ठीक बना देना !!
पटना साहीब से मीलने को
ननकाना बैचेन खड़ा ,
अबकी तिरंगा रावलपिंडी में
घुस कर तुम फहरा देना !!
अटक कटक से सिन्धु नदी तक
सब कुछ हमको प्यारा है ,
कश्मीर मत मांगो कह दो
पाकिस्तान हमारा है !!
जो उपवन से घात करे
वो शाख तोड़ दी जायेगी ,
जो पीछे से वार करे
वो बांह मोड़ दी जायेगी ,
जो कुटुंब का नाश करे
वो गर्दन तोड़ दी जायेगी,
मेरे देश पे उठती
हर एक आँख फोड़ दी जायेगी ,
जो देश द्रोह की बात करे
वो मनुष्य हत्यारा है ,
कश्मीर मत मांगों
कह दो पाकिस्तान हमारा है !!
बन्दे- मातरं
जय हिन्द - जय भारत
(आनंद कुमार )
माँ का क़र्ज़ चुका देना ,
कटे फटे इस मानचित्र को
अबकी ठीक बना देना !!
पटना साहीब से मीलने को
ननकाना बैचेन खड़ा ,
अबकी तिरंगा रावलपिंडी में
घुस कर तुम फहरा देना !!
अटक कटक से सिन्धु नदी तक
सब कुछ हमको प्यारा है ,
कश्मीर मत मांगो कह दो
पाकिस्तान हमारा है !!
जो उपवन से घात करे
वो शाख तोड़ दी जायेगी ,
जो पीछे से वार करे
वो बांह मोड़ दी जायेगी ,
जो कुटुंब का नाश करे
वो गर्दन तोड़ दी जायेगी,
मेरे देश पे उठती
हर एक आँख फोड़ दी जायेगी ,
जो देश द्रोह की बात करे
वो मनुष्य हत्यारा है ,
कश्मीर मत मांगों
कह दो पाकिस्तान हमारा है !!
बन्दे- मातरं
जय हिन्द - जय भारत
(आनंद कुमार )
गुरुवार, 6 मई 2010
हम कौन हैं ?
हम कौन हैं या हम क्या हैं यह जानने के लिए हमें कुछ त्याग करना पड़ेगा और वह त्याग कोई भौतिक त्याग नहीं है अपितु हमें हमारी सांसारिक बुद्धि को स्थिर रखते हुए जो कुछ भी अब तक हमने सीखा है या जाना है उसे भूल कर इस नवीन सन्देश के लिए थोडा सा स्थान बनने देना है. यद्यपि यह प्रश्न हम सब के दिलो दिमाग पर जीवन में अनेक बार उठता है कि हम कौन हैं, कहाँ से आये हैं, क्यों आयें हैं ( हम अपने आप तो आये नहीं हमें तो यहाँ भेजा गया है) लेकिन हम भौतिक जगत की आवस्यकताओं की पूर्ति करने में इतने व्यस्त रहते हैं कि हम अपने अंतर कि इस मौलिक एवं मूलभूत आवाज को अनसुना कर देते है. इसीलिए आपसे कुछ त्याग करने के लिए अनुरोध किया गया है ताकि जो गूढ़ बात अब यहाँ बताई जाने वाली है उस बात का प्रभाव यदि १००% नहीं तो कुछ अंश तक तो अवश्य आपके अन्दर प्रवेश कर सके.
एक शायर ने बहुत ही सटीक कहा है:
पहचान ले खुद को तो इन्सान खुदा है, जाहिर में गो खाक है मगर खाक नहीं है.
जलवों की खता क्या जो दिखाई नहीं देते, खुद देखने वालों की नजर पाक नहीं है.
जब हम इस संसार में सारी उम्र संघर्ष करने के बाद भी अपने आप को पूरी तरह से नहीं जान पाते तब खुदा को पाने या संसार का समस्त ज्ञान पाने का हमारा दावा खोखला ही माना जायगा. अपने आपको या दूसरों को जानने की इच्छा कभी-न-कभी हर इन्सान के मन में आती है; यह बात दूसरी है कि हममें से अधिकतर लोग इस जिज्ञासा का गला ही घोंट देते हैं. वास्तव में यह एक जटिल प्रश्न है और शायद इसीलिए हम इसको हल करना नहीं चाहते. या इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि वर्तमान आधुनिकीकरण एवं अर्थवाद की गला-काट-प्रतिस्पर्धा के चलते ऐसे प्रश्नों को हल करने का कोई लाभ प्रतीत नहीं होता.
हम बाहरी तौर पर जो दिखाई देते हैं या वर्तमान में जो हमारी वाह्य पहचान बन गई है इसे नाकारा नहीं जा सकता परन्तु यही सब कुछ है; ऐसा भी नहीं है. हमारे इस भौतिक शरीर का सम्बन्ध ईश्वर के विराट स्वरूप से है. इस भौतिक शरीर में एक सूक्ष्म शरीर भी है जिसके अन्दर बहुत कुछ छिपा है जैसे- मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, इच्छा, आशा, वासना, काम, क्रोध, लोभ, ईर्षा, द्वेष, घ्रणा, कल्पना, संतोष, सय्यम आदि. इस सूक्ष्म शरीर का सम्बन्ध ईश्वर के अव्याकृत रूप से है.
इसके अतिरिक्त इस शरीर का सम्बन्ध ईश्वर के हिरण्यगर्भ रूप से भी है जिसका प्रतिनिधि हमारी आत्मा है. यहाँ तक का ज्ञान तो आम आदमी पुस्तकों से पढ़ कर अथवा दूसरों से सुनकर प्राप्त कर सकता है यद्यपि ऐसा ज्ञान वाचक ज्ञान कहलाता है और यह हमें अधिक दूर तक नहीं ले जाता; तथापि इस ज्ञान से ही सत्य की खोज की चाह पैदा होती है-इसी में से सत्य जानने का अंकुर पैदा होता है.
इस हर-मंदिर में (गुरु नानक देव जी ने इस शरीर को हर-मंदिर कहा है क्योंकि इसमें हरी निवास करता है/ इस शरीर में ईश्वर रहता है) इन सबका साक्षी भी रहता है जिसे विशुद्ध आत्मा या सुरत कहते हैं जो ईश्वर का ही रूप होता है. इस रूप को ईश्वर का अंश कहना भी गलत होगा क्योंकि अंश का तात्पर्य सामान्य रूप से यह लगाया जाता है कि यह पूर्ण का टुकड़ा है जबकि वह ईश्वर या मालिक तो अविभाज्य है.
इस प्रकार एक अमूर्त भाव को मूर्तरूप में व्यक्त करने का प्रयास किया गया है जिसमे कहने और सुनने या लिखने और पढने वाले के अनुभवज्ञान के स्तर में भिन्नता होने पर अर्थ का अनर्थ होने कि सम्भावना बनी रहती है क्योंकि सामान्य लोग शब्दों का सामान्य अर्थ लगा कर बात को समझने का प्रयास करते हैं और इसी में गलती कर जाते हैं. इसका मूल कारण यह है कि:
यह करनी का भेद है नहीं बुद्धि विचार,
कथनी तज करनी करे तब पावे कुछ सार.
संक्षिप्त में कहने का तात्पर्य यह है कि हम कोई नश्वर शरीर मात्र ही नहीं हैं; न ही हम इस भौतिक संसार में केवल खाने-पीने और मौज उड़ाने आये हैं बल्कि हम तो ईश्वर के अंश हैं और पूर्ण हैं और इस संसार में ईश्वर को ढूंढने आये हैं क्योंकि इस सृष्ठी के आदि में उसने हमें अपने से दूर भेज दिया था और दूर भी इसलिए भेज दिया था ताकि हम उससे दूर होकर उसके विरह में व्यथित हों और उसे पाने का प्रयास करें. और यह प्रयास भी वही हमसे करवाता है; हम अपनी शक्ति के बल पर उसे ढूंढने का प्रयास भी नहीं कर सकते. अपने से दूर भेजने का एक कारण यह भी हो सकता है कि वह ईश्वर हमेशा लीला करता रहता है जैसे बच्चे लुका-छिपी का खेल खेलते हैं और उसी खेल-खेल में उसने हमें अपने से दूर भेज दिया ताकि हम उसे ढूंढे लेकिन हम उसे ढूंढ़ नहीं पाते. इसलिए वह अपने जीवों को निज धाम ले जाने के लिए संतो/सतगुरु के रूप में प्रगट होकर लेने आता है क्योंकि वह हर जीव से बेहद प्यार करता है. परन्तु फिर भी हम इस संसार के मेले में इतने मोहित हो जाते हैं कि हम उसकी बात को ही नहीं सुनते और वह जो शब्द कि नाव लेकर आता है उस पर बैठ नहीं पाते और वह निराश होकर चला जाता है.
मालिक सब का कल्याण करे
एक शायर ने बहुत ही सटीक कहा है:
पहचान ले खुद को तो इन्सान खुदा है, जाहिर में गो खाक है मगर खाक नहीं है.
जलवों की खता क्या जो दिखाई नहीं देते, खुद देखने वालों की नजर पाक नहीं है.
जब हम इस संसार में सारी उम्र संघर्ष करने के बाद भी अपने आप को पूरी तरह से नहीं जान पाते तब खुदा को पाने या संसार का समस्त ज्ञान पाने का हमारा दावा खोखला ही माना जायगा. अपने आपको या दूसरों को जानने की इच्छा कभी-न-कभी हर इन्सान के मन में आती है; यह बात दूसरी है कि हममें से अधिकतर लोग इस जिज्ञासा का गला ही घोंट देते हैं. वास्तव में यह एक जटिल प्रश्न है और शायद इसीलिए हम इसको हल करना नहीं चाहते. या इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि वर्तमान आधुनिकीकरण एवं अर्थवाद की गला-काट-प्रतिस्पर्धा के चलते ऐसे प्रश्नों को हल करने का कोई लाभ प्रतीत नहीं होता.
हम बाहरी तौर पर जो दिखाई देते हैं या वर्तमान में जो हमारी वाह्य पहचान बन गई है इसे नाकारा नहीं जा सकता परन्तु यही सब कुछ है; ऐसा भी नहीं है. हमारे इस भौतिक शरीर का सम्बन्ध ईश्वर के विराट स्वरूप से है. इस भौतिक शरीर में एक सूक्ष्म शरीर भी है जिसके अन्दर बहुत कुछ छिपा है जैसे- मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, इच्छा, आशा, वासना, काम, क्रोध, लोभ, ईर्षा, द्वेष, घ्रणा, कल्पना, संतोष, सय्यम आदि. इस सूक्ष्म शरीर का सम्बन्ध ईश्वर के अव्याकृत रूप से है.
इसके अतिरिक्त इस शरीर का सम्बन्ध ईश्वर के हिरण्यगर्भ रूप से भी है जिसका प्रतिनिधि हमारी आत्मा है. यहाँ तक का ज्ञान तो आम आदमी पुस्तकों से पढ़ कर अथवा दूसरों से सुनकर प्राप्त कर सकता है यद्यपि ऐसा ज्ञान वाचक ज्ञान कहलाता है और यह हमें अधिक दूर तक नहीं ले जाता; तथापि इस ज्ञान से ही सत्य की खोज की चाह पैदा होती है-इसी में से सत्य जानने का अंकुर पैदा होता है.
इस हर-मंदिर में (गुरु नानक देव जी ने इस शरीर को हर-मंदिर कहा है क्योंकि इसमें हरी निवास करता है/ इस शरीर में ईश्वर रहता है) इन सबका साक्षी भी रहता है जिसे विशुद्ध आत्मा या सुरत कहते हैं जो ईश्वर का ही रूप होता है. इस रूप को ईश्वर का अंश कहना भी गलत होगा क्योंकि अंश का तात्पर्य सामान्य रूप से यह लगाया जाता है कि यह पूर्ण का टुकड़ा है जबकि वह ईश्वर या मालिक तो अविभाज्य है.
इस प्रकार एक अमूर्त भाव को मूर्तरूप में व्यक्त करने का प्रयास किया गया है जिसमे कहने और सुनने या लिखने और पढने वाले के अनुभवज्ञान के स्तर में भिन्नता होने पर अर्थ का अनर्थ होने कि सम्भावना बनी रहती है क्योंकि सामान्य लोग शब्दों का सामान्य अर्थ लगा कर बात को समझने का प्रयास करते हैं और इसी में गलती कर जाते हैं. इसका मूल कारण यह है कि:
यह करनी का भेद है नहीं बुद्धि विचार,
कथनी तज करनी करे तब पावे कुछ सार.
संक्षिप्त में कहने का तात्पर्य यह है कि हम कोई नश्वर शरीर मात्र ही नहीं हैं; न ही हम इस भौतिक संसार में केवल खाने-पीने और मौज उड़ाने आये हैं बल्कि हम तो ईश्वर के अंश हैं और पूर्ण हैं और इस संसार में ईश्वर को ढूंढने आये हैं क्योंकि इस सृष्ठी के आदि में उसने हमें अपने से दूर भेज दिया था और दूर भी इसलिए भेज दिया था ताकि हम उससे दूर होकर उसके विरह में व्यथित हों और उसे पाने का प्रयास करें. और यह प्रयास भी वही हमसे करवाता है; हम अपनी शक्ति के बल पर उसे ढूंढने का प्रयास भी नहीं कर सकते. अपने से दूर भेजने का एक कारण यह भी हो सकता है कि वह ईश्वर हमेशा लीला करता रहता है जैसे बच्चे लुका-छिपी का खेल खेलते हैं और उसी खेल-खेल में उसने हमें अपने से दूर भेज दिया ताकि हम उसे ढूंढे लेकिन हम उसे ढूंढ़ नहीं पाते. इसलिए वह अपने जीवों को निज धाम ले जाने के लिए संतो/सतगुरु के रूप में प्रगट होकर लेने आता है क्योंकि वह हर जीव से बेहद प्यार करता है. परन्तु फिर भी हम इस संसार के मेले में इतने मोहित हो जाते हैं कि हम उसकी बात को ही नहीं सुनते और वह जो शब्द कि नाव लेकर आता है उस पर बैठ नहीं पाते और वह निराश होकर चला जाता है.
मालिक सब का कल्याण करे
बुधवार, 5 मई 2010
शंकर - पार्वती जी के मूर्ति भेटल

लोग कहैत अछि अबक समय में धर्म - कर्म सब धीरे- धीर निप्टल जायत अछि , मुद्दा हम एखनो देखैत छिक गाम - घर में पूजा - पाठ एखनो धरी सर्बोपारित अछि , चाहे रौदिक अकाली होय या बढिक दाहर ओहिमे अपन कर्म पूजा पाठ के चलन जरी राखैत छैथि ,
देखू ने एखनो कलना (हरलाखी , मधुबनी ) नामक गांव गाम में , भिसन गरमी आ सुखार के कारने दामेस्वरी पोखैर के साफ - सुतरा आ खूनेय के कल में सोमदिन भगवान शंकर - पार्वती के आलिंगन मुद्रा में अति प्राचीन आकार्सक मूर्ति भेटल अहि मूर्ति के देखय आ पूजा करैक लेल हजारो के संख्यां में लोगक भीड़ उमैरी गेल ,
मूर्ति देखेक में अति सुन्दर लागैत अछि , प्रतिमा के निचला भाग में बसहा आ पार्वती मूर्ति के निचिका भाग में सिंह क मूर्ति सेहो सामिल अछि , ई पोखैर भिसन गरमी के कारने बिलकू सुखा गेल छल जहि के चलती गाम - घरक लोग सब अहि पोखैर में से मैट कैट के अपन घर अगना के भरैत छल ,
आखिर सत्य अछि ताहि दुवारे धर्म के सर्वब्याप्त रहै के लेल समय -समय पर धर्म के समाबेस होयत रहैत अछि --
देखू ने एखनो कलना (हरलाखी , मधुबनी ) नामक गांव गाम में , भिसन गरमी आ सुखार के कारने दामेस्वरी पोखैर के साफ - सुतरा आ खूनेय के कल में सोमदिन भगवान शंकर - पार्वती के आलिंगन मुद्रा में अति प्राचीन आकार्सक मूर्ति भेटल अहि मूर्ति के देखय आ पूजा करैक लेल हजारो के संख्यां में लोगक भीड़ उमैरी गेल ,
मूर्ति देखेक में अति सुन्दर लागैत अछि , प्रतिमा के निचला भाग में बसहा आ पार्वती मूर्ति के निचिका भाग में सिंह क मूर्ति सेहो सामिल अछि , ई पोखैर भिसन गरमी के कारने बिलकू सुखा गेल छल जहि के चलती गाम - घरक लोग सब अहि पोखैर में से मैट कैट के अपन घर अगना के भरैत छल ,
आखिर सत्य अछि ताहि दुवारे धर्म के सर्वब्याप्त रहै के लेल समय -समय पर धर्म के समाबेस होयत रहैत अछि --
अहि दुवारे कहल गेल अछि ---
सतेयन धारिते पृथ्वी सतेयें तपते रवि
सतेयं वती बयुस्यच सर्वम सत्यम परितिठितम
सतेयन धारिते पृथ्वी सतेयें तपते रवि
सतेयं वती बयुस्यच सर्वम सत्यम परितिठितम
शनिवार, 1 मई 2010
मई,2010 केर पाबनि-तिहार
1 मई: संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत
6 मई: कालाष्टमी व्रत, शीतलाष्टमी
9 मई: पुरुषोत्तमी कमला एकादशी व्रत
11 मई: भौम-प्रदोष व्रत (ऋणमोचन हेतु)
12 मई: मासिक शिवरात्रि व्रत
13 मई: श्राद्ध केर अमावस्या
14 मई: स्नान-दान केर अमावस्या, मलमास समाप्त
15 मई: वृष-संक्रान्ति केर पुण्यकाल प्रात: 10.11 बजे तक,गोदावरी-स्नान, नवीन चन्द्र-दर्शन
16 मई: अक्षय तृतीया
17 मई: वरदविनायक चतुर्थी व्रत, बगलामुखी जयंती
19 मई: चंदनषष्ठी
20 मई: गंगा सप्तमी-गंगा जयंती, मध्याह्न मे गंगा-पूजा
21 मई: श्रीदुर्गाष्टमी व्रत, श्रीअन्नपूर्णाष्टमी व्रत, बगलामुखी महाविद्या जयंती,
22 मई: मैथिली दिवस, सीतानवमी व्रत, जानकी जयंती महोत्सव,
24 मई: विजया एकादशी व्रत, मोहिनी एकादशी व्रत, रुक्मिणी द्वादशी,
25 मई: भौम-प्रदोष व्रत (ऋणमोचन हेतु),
26 मई: नृसिंह चतुर्दशी व्रत, नृसिंहावतार जयंती, छिन्नमस्ता महाविद्या जयंती,
27 मई: स्नान-दान-व्रत के वैशाखी पूर्णिमा, बुद्ध पूर्णिमा, गन्धेश्वरी पूजा (बंगाल), वैशाख स्नान-नियम पूर्ण
31 मई: संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत
एहि मासक राशिवार शुभ-अशुभ तिथि
मेष राशि
शुभ तिथि :- 2,4,5,7,9,10,11,23,25,29,30
अशुभ तिथि :- 6,13,15,16,18,19,20
वृषभ
शुभ तिथि :- 1,5,11,17,18,21,23,26,28,29
अशुभ तिथि :-3,12,22,24,27,30,31
मिथुन
शुभ तिथि:-1,6,11,16,19,25,27,31
अशुभ तिथि:-8,10,18,22,26,30
कर्क राशि
शुभ तिथि:- 13,21,22,25,26,29,31
अशुभ तिथि:- 6,8,10,11,14,17,18,19
सिंह राशि
शुभ तिथि:-4,5,7,9,26,27,29,30
अशुभ तिथि:-3,8,12,13,16,18,21,22
कन्या
शुभ तिथि:6,17,22,24,25,26,27
अशुभ तिथि:3,6,7,8,10,13,14,20,21
तुला
शुभ तिथि:-1,10,14,15,16,19,30
अशुभ तिथि:9,16,18,20,26,29
वृश्चिक
शुभ तिथि:-10,18,19,20,25,26,27
अशुभ तिथि:-2,3,4,11,12,16,30,31
धनु
शुभ तिथि:6,13,17,19,20,23,25,30,31
अशुभ तिथि:3,8,11,16,26,28
मकर
शुभ तिथि:-6,9,15,20,22,24,29
अशुभ तिथि:- 3,8,13,16,18,23
कुम्भ
शुभ तिथि:-1,2,5,14,15,16,27,30
अशुभ तिथि:- 6,7,8,18,21,22,23
मीन
शुभतिथि:2,8,18,24,27,28
अशुभ तिथि:-3,7,19,21,26,31
रूचिगर सूचनाक मंच पर अपनेक स्वागत अछि।
6 मई: कालाष्टमी व्रत, शीतलाष्टमी
9 मई: पुरुषोत्तमी कमला एकादशी व्रत
11 मई: भौम-प्रदोष व्रत (ऋणमोचन हेतु)
12 मई: मासिक शिवरात्रि व्रत
13 मई: श्राद्ध केर अमावस्या
14 मई: स्नान-दान केर अमावस्या, मलमास समाप्त
15 मई: वृष-संक्रान्ति केर पुण्यकाल प्रात: 10.11 बजे तक,गोदावरी-स्नान, नवीन चन्द्र-दर्शन
16 मई: अक्षय तृतीया
17 मई: वरदविनायक चतुर्थी व्रत, बगलामुखी जयंती
19 मई: चंदनषष्ठी
20 मई: गंगा सप्तमी-गंगा जयंती, मध्याह्न मे गंगा-पूजा
21 मई: श्रीदुर्गाष्टमी व्रत, श्रीअन्नपूर्णाष्टमी व्रत, बगलामुखी महाविद्या जयंती,
22 मई: मैथिली दिवस, सीतानवमी व्रत, जानकी जयंती महोत्सव,
24 मई: विजया एकादशी व्रत, मोहिनी एकादशी व्रत, रुक्मिणी द्वादशी,
25 मई: भौम-प्रदोष व्रत (ऋणमोचन हेतु),
26 मई: नृसिंह चतुर्दशी व्रत, नृसिंहावतार जयंती, छिन्नमस्ता महाविद्या जयंती,
27 मई: स्नान-दान-व्रत के वैशाखी पूर्णिमा, बुद्ध पूर्णिमा, गन्धेश्वरी पूजा (बंगाल), वैशाख स्नान-नियम पूर्ण
31 मई: संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत
एहि मासक राशिवार शुभ-अशुभ तिथि
मेष राशि
शुभ तिथि :- 2,4,5,7,9,10,11,23,25,29,30
अशुभ तिथि :- 6,13,15,16,18,19,20
वृषभ
शुभ तिथि :- 1,5,11,17,18,21,23,26,28,29
अशुभ तिथि :-3,12,22,24,27,30,31
मिथुन
शुभ तिथि:-1,6,11,16,19,25,27,31
अशुभ तिथि:-8,10,18,22,26,30
कर्क राशि
शुभ तिथि:- 13,21,22,25,26,29,31
अशुभ तिथि:- 6,8,10,11,14,17,18,19
सिंह राशि
शुभ तिथि:-4,5,7,9,26,27,29,30
अशुभ तिथि:-3,8,12,13,16,18,21,22
कन्या
शुभ तिथि:6,17,22,24,25,26,27
अशुभ तिथि:3,6,7,8,10,13,14,20,21
तुला
शुभ तिथि:-1,10,14,15,16,19,30
अशुभ तिथि:9,16,18,20,26,29
वृश्चिक
शुभ तिथि:-10,18,19,20,25,26,27
अशुभ तिथि:-2,3,4,11,12,16,30,31
धनु
शुभ तिथि:6,13,17,19,20,23,25,30,31
अशुभ तिथि:3,8,11,16,26,28
मकर
शुभ तिथि:-6,9,15,20,22,24,29
अशुभ तिथि:- 3,8,13,16,18,23
कुम्भ
शुभ तिथि:-1,2,5,14,15,16,27,30
अशुभ तिथि:- 6,7,8,18,21,22,23
मीन
शुभतिथि:2,8,18,24,27,28
अशुभ तिथि:-3,7,19,21,26,31
रूचिगर सूचनाक मंच पर अपनेक स्वागत अछि।
मंगलवार, 20 अप्रैल 2010
की हमहूँ रहबै कुमार ?
यौ पाठक गण की कहू अपन मिथिला राज्य चौपट भ' गेल ( से कोना यौ ) एक त कमला कोशीक दहार आ दोसर दहेज़ प्रथाक व्यवहार ! कमला कोशी लेलक पेटक आहार त दहेज़ प्रथा केलक आर्थिक लाचार ! कन्यादान से कतेक पिता लोकनि सेहो भेला बीमार आ कतेको बर छथि ओही बाधा सँ सेहो कुमार आ बीमार ! ओही सभ बात के लs क' हम नब युबक संघक बाधा कs ल'क' पाठक गणक समक्ष अपन गाम घर पर हाजिर छी.......
की हमहूँ रहबै कुमार ?
जय गणेश मंगल गणेश, सदिखन रटलो मंत्र उचार !
सभ बाधाक हरय बाला, कते गेलो अहाँ छोड़ि संसार !!
अपना लेल अगल - बगल मे, हमरा लेल किए दूर व्यवहार !
आब कहू यो गणपति महाराज, की हमहूँ रहबै कुमार...? !!
अपना लेल अगल - बगल मे, हमरा लेल किए दूर व्यवहार !
आब कहू यो गणपति महाराज, की हमहूँ रहबै कुमार...? !!
बरख बीत गेल देखते देखते, जन्म कुंडली मे थर्टी ! (३०)
दहेजक आस मे हम नै बैसब, हमरो उम्र भो जेत सिक्सटी !! (६०)
गाम - गाम मे जे के बाजब, बाबू हमर छथि दुराचार !
आब कहू यो बाबू - काका, की हमहूँ रहबै कुमार... ?!!
दहेजक आस मे हम नै बैसब, हमरो उम्र भो जेत सिक्सटी !! (६०)
गाम - गाम मे जे के बाजब, बाबू हमर छथि दुराचार !
आब कहू यो बाबू - काका, की हमहूँ रहबै कुमार... ?!!
ब्रह्म बाबा के सभ दिन गछ्लो, लगाबू अहि लगन मे बेरापार !
ओही खुशी मे अहाँ के देब, हम अपन गाय के दूधक धार !!
हे कुसेश्वर हे सिंघेश्वर, अहाँक महिमा अछि अपरम पार !
अहि लगन मे पार लगाबू, हम आनब दूध दही आ केराक भार !!
आब कहू यो भोले दानी, की हमहूँ रहबै कुमार ....?...
ओही खुशी मे अहाँ के देब, हम अपन गाय के दूधक धार !!
हे कुसेश्वर हे सिंघेश्वर, अहाँक महिमा अछि अपरम पार !
अहि लगन मे पार लगाबू, हम आनब दूध दही आ केराक भार !!
आब कहू यो भोले दानी, की हमहूँ रहबै कुमार ....?...
सौराठ सभा मे जे के बैसलों, सातों दिन आ सातो राति !
कियो नै पुछलक नाम आ गाम, की भेल अपनेक गोत्र मूल बिधान !!
घर मे आबी के खाट पकरलो, नै भेल आब हमर कुनू जोगार !
आब कहू यो बाबा - नाना, की हमहूँ रहबै कुमार --?!!
कियो नै पुछलक नाम आ गाम, की भेल अपनेक गोत्र मूल बिधान !!
घर मे आबी के खाट पकरलो, नै भेल आब हमर कुनू जोगार !
आब कहू यो बाबा - नाना, की हमहूँ रहबै कुमार --?!!
दौर - दौर जे पंडित पुर्हित, सभ दिन पूछी राय बिचार !
पंडित जी के मुहँ से फुटलैन ई बकार ..........
जेठ अषाढ़ त बितैते अछि, अघन से परैत अछि अतिचार !!
आब कहू यो पंडित पुर्हित, की हमहूँ रहबै कुमार ....?.
पंडित जी के मुहँ से फुटलैन ई बकार ..........
जेठ अषाढ़ त बितैते अछि, अघन से परैत अछि अतिचार !!
आब कहू यो पंडित पुर्हित, की हमहूँ रहबै कुमार ....?.
नै पढ़लो हम आइये - बीए, छी हमहूँ यो मिडिल पास !
डॉक्टर भइया - मास्टर भइया, ओहो काटलैथ एक दिन घास !!
ओही खान्दानक छी यो हमहूँ, जून करू आब हमर धिकार !
आब कहू यो बाबू - भैया, की हमहूँ रहबै कुमार ?!!
गोर - कारी सभ के सब दिन रखबै, लुल्ही - लंगरी से घर के सजेबई !
बौकी पगली के दरभंगा में देखेबाई, कन्ही कोतरी से करब जिन्दगी साकार !!
आब कहू यो संगी - साथी, की हमहूँ रहबै कुमार ..?........
डॉक्टर भइया - मास्टर भइया, ओहो काटलैथ एक दिन घास !!
ओही खान्दानक छी यो हमहूँ, जून करू आब हमर धिकार !
आब कहू यो बाबू - भैया, की हमहूँ रहबै कुमार ?!!
गोर - कारी सभ के सब दिन रखबै, लुल्ही - लंगरी से घर के सजेबई !
बौकी पगली के दरभंगा में देखेबाई, कन्ही कोतरी से करब जिन्दगी साकार !!
आब कहू यो संगी - साथी, की हमहूँ रहबै कुमार ..?........
अघन के लगन देख हम झूमी उठलो, जेना करैत अछि नाग फुफकार !
लगन बीत गेल माघ फागुन के, गुजैर रहल अछि जेठ अषाढ़ !!
अंतिम लगन ओहिना बितत, नैया डूबत हमरो बिच धार !
आब कहू यो मैथिल आर मिथिलाक पाठक गन,
की हमहू रहबै कुमार --?-!!
नब युवक के बातक रखलो मान, शादी.कॉम में लिखेलो अपन नाम !
नै कुनू भेटल कतो से मेल, लागैत अछि जे ईहो भेल फैल !!
कतेक दिन करब मेलक इंतजार........
आब कहू यो कम्पूटर महाराज, की हमहूँ रहबै कुमार --?!!
भोरे उठी गेलो खेत खलिहान, उम्हरे से केना एलो कमला स्नान
देखलो दुई चैर आदमी के, बात करैत छल कन्यादान !
पीड़ी छुई हम भगवती के, पहुँच गेलो हम अपन दालान !!
हाथ जोरी हम सबके, विनती केलो बारम् बार !
आब कहूँ यो घटक महाराज, की हमहूँ रहबै कुमार --?
मदन कुमार ठाकुर,
पट्टीटोला, कोठिया (भैरव स्थान )
झंझारपुर (मधुबनी)बिहार - ८४७४०४।
मो-९३१२४६०१५०
शनिवार, 17 अप्रैल 2010
गुरू की पहचान भाग-4
गुरु की पहचान
अब एक छोटा सा या मोटा सा प्रश्न कभी-कभी यह उठता है कि गुरु की पहचान कैसे की जाय? यह पता कैसे चले कि कोई व्यक्ति जिसे अन्य लोग गुरु समझते हैं वह गुरु है भी या नहीं इसकी पहचान कैसे हो? कहीं वह धोखेबाज तो नहीं जैसा कि आमतौर पर आजकल देखने-सुनने में आता है. यह संदेह बिलकुल सत्य है क्योंकि यदि किसी व्यक्ति के अन्दर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास नहीं है तो उसे न तो सच्चे संत महात्मा/ सच्चे सदगुरू से कुछ मिल सकता है और न ही ढोंगी बाबा से. इसके विपरीत जिसको जिस पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास है उसे उससे मनोवांछित फल मिलने कि पूरी सम्भावना रहती है. अब इसके साथ ही एक प्रश्न यह भी पैदा होता है कि आप के पास ऐसा कौन सा औजार है, कौन सा बारोमीटर है, कौन सा स्केल या पैमाना है जिससे आप यह अंदाज लगा सकते हैं कि कोई व्यक्ति सच्चा सदगुरू है या पाखंडी है. अगर आप समझते हैं कि आप औरों कि नक़ल करके गुरु कि पहचान कर सकते हैं तो भी आप गलती खा सकते हैं क्योंकि उसने अपने अनुभव या अपनी मान्यता के आधार पर किसी को गुरु माना है जिसकी तुलना आप नहीं कर सकते और यदि आप अपनी बल बुद्धि के आधार पर कोई निर्णय लेते हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप गुरु कि परीक्षा लेने के काबिल हैं अर्थात आप गुरु से ज्यादा समझ रखते हैं . क्योंकि एक एम० ए० के विद्यार्थी कि कापी उससे उच्च ज्ञान रखने वाला ही जाँच सकता है कोई हाई स्कूल पास नहीं.
देखिये आदि संत कबीर साहिब गुरु के बारे में कहते हैं :
गुरु को मानुस जानते, ते नर कहिये अंध
दुखी होएँ संसार में आगे जम का फंद
गुरु किया है देह को सतगुरु चीन्हा नाहीं
कहें कबीर ता दास को तीन ताप भ्रमाहीं
गुरु नाम आदर्श का गुरु है मन का इष्ट
इष्ट आदर्श को ना लाखे समझो उसे कनिष्ट
इससे तो यह स्पष्ट होता है कि गुरु आम आदमी की तरह ही दीखता है, आम आदमी की तरह खाता-पीता है और आम आदमी की तरह ही सब जगत-व्यवहार करता है परन्तु उसमें एक खास बात होती है जो अन्य सामान्य व्यक्तियों में नहीं होती जिसके कारण गुरु अन्य व्यक्तियों से भिन्न होता है और वह खास बात यह है की गुरु के अन्दर परमतत्व पूर्ण रूप से अवतरित हुआ होता है. यूँ तो परमतत्व इस संसार/इस ब्रह्माण्ड और कोटि-कोटि ब्रह्माण्डों के एक-एक अणु और परमाणु में भी मौजूद रहता है क्योंकि सब कुछ उसी से निकला है, उसी में समाया हुआ है और उसी में विलीन हो जायगा फिर भी सभी संत- महात्मा और सभी प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ यही कहते आये हैं कि वह परमतत्व जड़ पदार्थों में सुप्त अवस्था में रहता है, वनस्पतियों में वह अचेतन, पशु -पक्षियों में अर्धचेतन, मनुष्यों में चेतन अवस्था में और संत्सत्गुरु में वह पूर्ण चेतन अवस्था में रहता है और अपने निज स्वरुप में वह चेतनघन अवस्था में रहता है. चूंकि संत्सत्गुरु में वह पूर्ण चेतन अवस्था में रहता है इसलिए संत सत्गुरुवक्त ही उस पूर्ण चेतनता को दूसरे व्यक्तियों में प्रवाहित करने में सक्षम है. इस द्रष्टिकोण से भी यही प्रमाणित होता है कि गुरु मनुष्य रूप में स्वयं परमतत्व ही होता है.
सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति, एश्वर्य और धन -धन्य की पूर्ति तो किसी भी देवी-देवता, या किसी भी वस्तु को इष्ट मान कर पूजा करने से हो सकती है, इससे लोक और परलोक भी सुधर सकते हैं परन्तु इनकी पूजा से आवागमन से छुटकारा नहीं मिल सकता. आवागमन से छुटकारा यदि कोई दिला सकता है तो वह हस्ती संत सत्गुरुवक्त ही है वह इस प्रकार की एक तो वह स्वयं निर्बंध होता है दूसरे वह आपकी शंकाओं का आपके संदेहों का निवारण मुंह-दर-मुंह फेस-टू - फेस कर सकता है जिससे आपकी प्रगति अबाधित रूप से होने लगती है जो अन्य प्रकार से संभव नहीं.
अब रही बात यह कि गुरु पर श्रद्धा और विश्वास कैसे लाया जाय? यह बिलकुल निजी मामला है और इसके लिए कोई सिद्धांत प्रतिपादित नहीं किये जा सकते क्योंकि जितना भी इस बारे में कहा जायगा वह विवादित बन जायगा. जैसे कोई किसी को रोना नहीं सिखा सकता, किसी को प्रेम करना नहीं सिखा सकता, इसी प्रकार कोई किसी को किसी पर श्रद्धा और विश्वास करना भी नहीं सिखा सकता. यह तो जब होता है तब होता है और नहीं होता तो नहीं होता. फिर भी अपनी तुच्छ बुद्धि के अनुसार और अपने अनुभव के आधार पर मैं यहाँ पर लिखना चाहता हूँ कि यदि किसी को किसी महापुरुष के पास बैठकर मानसिक शांति मिलती है, उसके काम-क्रोध में कमी आने लगती है, उसकी वासनाएँ बदलने लगती हैं, उसके विकारों में परिवर्तन आना शुरू हो जाता है, उसकी चंचलता घटने लगती है तो समझो कि वह आपका मार्गदर्शन करने में सक्षम है. यदि वह अपनी प्रशंसा नहीं करता/करवाता, अहंकारवश कोई बात नहीं कहता, वाह्य-आडम्बरों से दूर रहता है और किसी का खंडन-मंडन नहीं करता और अपने अनुभव के आधार पर आपकी समस्स्याओं का समाधान बताता है तो ऐसा महापुरुष गुरु स्वीकार करने के योग्य है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि उसके पास बैठकर आपके मन में यह भावना जाग्रत हो जाय कि जिसकी मुझे तलाश थी बस वह यही है. यदि ऐसी चिंगारी आपके मन मंदिर में जाग उठती है तो आप का काम उससे बन जायगा और आपका कल्याण हो जायगा. अब एक बात यहाँ पर और स्पष्ट करने योग्य है कि क्या गुरु कि खोज हम करते हैं? मेरी धारणा है कि गुरु कि खोज तो स्वयं गुरु कि प्रेरणा से ही होती है. वही हमारे अन्दर यह भावना पैदा करता है कि हम-एक-दूजे के लिए हैं.
अब एक छोटा सा या मोटा सा प्रश्न कभी-कभी यह उठता है कि गुरु की पहचान कैसे की जाय? यह पता कैसे चले कि कोई व्यक्ति जिसे अन्य लोग गुरु समझते हैं वह गुरु है भी या नहीं इसकी पहचान कैसे हो? कहीं वह धोखेबाज तो नहीं जैसा कि आमतौर पर आजकल देखने-सुनने में आता है. यह संदेह बिलकुल सत्य है क्योंकि यदि किसी व्यक्ति के अन्दर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास नहीं है तो उसे न तो सच्चे संत महात्मा/ सच्चे सदगुरू से कुछ मिल सकता है और न ही ढोंगी बाबा से. इसके विपरीत जिसको जिस पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास है उसे उससे मनोवांछित फल मिलने कि पूरी सम्भावना रहती है. अब इसके साथ ही एक प्रश्न यह भी पैदा होता है कि आप के पास ऐसा कौन सा औजार है, कौन सा बारोमीटर है, कौन सा स्केल या पैमाना है जिससे आप यह अंदाज लगा सकते हैं कि कोई व्यक्ति सच्चा सदगुरू है या पाखंडी है. अगर आप समझते हैं कि आप औरों कि नक़ल करके गुरु कि पहचान कर सकते हैं तो भी आप गलती खा सकते हैं क्योंकि उसने अपने अनुभव या अपनी मान्यता के आधार पर किसी को गुरु माना है जिसकी तुलना आप नहीं कर सकते और यदि आप अपनी बल बुद्धि के आधार पर कोई निर्णय लेते हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप गुरु कि परीक्षा लेने के काबिल हैं अर्थात आप गुरु से ज्यादा समझ रखते हैं . क्योंकि एक एम० ए० के विद्यार्थी कि कापी उससे उच्च ज्ञान रखने वाला ही जाँच सकता है कोई हाई स्कूल पास नहीं.
देखिये आदि संत कबीर साहिब गुरु के बारे में कहते हैं :
गुरु को मानुस जानते, ते नर कहिये अंध
दुखी होएँ संसार में आगे जम का फंद
गुरु किया है देह को सतगुरु चीन्हा नाहीं
कहें कबीर ता दास को तीन ताप भ्रमाहीं
गुरु नाम आदर्श का गुरु है मन का इष्ट
इष्ट आदर्श को ना लाखे समझो उसे कनिष्ट
इससे तो यह स्पष्ट होता है कि गुरु आम आदमी की तरह ही दीखता है, आम आदमी की तरह खाता-पीता है और आम आदमी की तरह ही सब जगत-व्यवहार करता है परन्तु उसमें एक खास बात होती है जो अन्य सामान्य व्यक्तियों में नहीं होती जिसके कारण गुरु अन्य व्यक्तियों से भिन्न होता है और वह खास बात यह है की गुरु के अन्दर परमतत्व पूर्ण रूप से अवतरित हुआ होता है. यूँ तो परमतत्व इस संसार/इस ब्रह्माण्ड और कोटि-कोटि ब्रह्माण्डों के एक-एक अणु और परमाणु में भी मौजूद रहता है क्योंकि सब कुछ उसी से निकला है, उसी में समाया हुआ है और उसी में विलीन हो जायगा फिर भी सभी संत- महात्मा और सभी प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ यही कहते आये हैं कि वह परमतत्व जड़ पदार्थों में सुप्त अवस्था में रहता है, वनस्पतियों में वह अचेतन, पशु -पक्षियों में अर्धचेतन, मनुष्यों में चेतन अवस्था में और संत्सत्गुरु में वह पूर्ण चेतन अवस्था में रहता है और अपने निज स्वरुप में वह चेतनघन अवस्था में रहता है. चूंकि संत्सत्गुरु में वह पूर्ण चेतन अवस्था में रहता है इसलिए संत सत्गुरुवक्त ही उस पूर्ण चेतनता को दूसरे व्यक्तियों में प्रवाहित करने में सक्षम है. इस द्रष्टिकोण से भी यही प्रमाणित होता है कि गुरु मनुष्य रूप में स्वयं परमतत्व ही होता है.
सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति, एश्वर्य और धन -धन्य की पूर्ति तो किसी भी देवी-देवता, या किसी भी वस्तु को इष्ट मान कर पूजा करने से हो सकती है, इससे लोक और परलोक भी सुधर सकते हैं परन्तु इनकी पूजा से आवागमन से छुटकारा नहीं मिल सकता. आवागमन से छुटकारा यदि कोई दिला सकता है तो वह हस्ती संत सत्गुरुवक्त ही है वह इस प्रकार की एक तो वह स्वयं निर्बंध होता है दूसरे वह आपकी शंकाओं का आपके संदेहों का निवारण मुंह-दर-मुंह फेस-टू - फेस कर सकता है जिससे आपकी प्रगति अबाधित रूप से होने लगती है जो अन्य प्रकार से संभव नहीं.
अब रही बात यह कि गुरु पर श्रद्धा और विश्वास कैसे लाया जाय? यह बिलकुल निजी मामला है और इसके लिए कोई सिद्धांत प्रतिपादित नहीं किये जा सकते क्योंकि जितना भी इस बारे में कहा जायगा वह विवादित बन जायगा. जैसे कोई किसी को रोना नहीं सिखा सकता, किसी को प्रेम करना नहीं सिखा सकता, इसी प्रकार कोई किसी को किसी पर श्रद्धा और विश्वास करना भी नहीं सिखा सकता. यह तो जब होता है तब होता है और नहीं होता तो नहीं होता. फिर भी अपनी तुच्छ बुद्धि के अनुसार और अपने अनुभव के आधार पर मैं यहाँ पर लिखना चाहता हूँ कि यदि किसी को किसी महापुरुष के पास बैठकर मानसिक शांति मिलती है, उसके काम-क्रोध में कमी आने लगती है, उसकी वासनाएँ बदलने लगती हैं, उसके विकारों में परिवर्तन आना शुरू हो जाता है, उसकी चंचलता घटने लगती है तो समझो कि वह आपका मार्गदर्शन करने में सक्षम है. यदि वह अपनी प्रशंसा नहीं करता/करवाता, अहंकारवश कोई बात नहीं कहता, वाह्य-आडम्बरों से दूर रहता है और किसी का खंडन-मंडन नहीं करता और अपने अनुभव के आधार पर आपकी समस्स्याओं का समाधान बताता है तो ऐसा महापुरुष गुरु स्वीकार करने के योग्य है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि उसके पास बैठकर आपके मन में यह भावना जाग्रत हो जाय कि जिसकी मुझे तलाश थी बस वह यही है. यदि ऐसी चिंगारी आपके मन मंदिर में जाग उठती है तो आप का काम उससे बन जायगा और आपका कल्याण हो जायगा. अब एक बात यहाँ पर और स्पष्ट करने योग्य है कि क्या गुरु कि खोज हम करते हैं? मेरी धारणा है कि गुरु कि खोज तो स्वयं गुरु कि प्रेरणा से ही होती है. वही हमारे अन्दर यह भावना पैदा करता है कि हम-एक-दूजे के लिए हैं.
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